एक जिंदादिल राजनेता पीलू मोदी

जीवन के खटास में नहीं बदलती थीं। कहा जाता है कि श्रीमती गांधी संसद में उनके भाषण की कायल थीं। अक्सर वो पत्र लिखकर उनके भाषण की तारीफ करती थीं। विरोध, नैतिकता और जिंदादिली के साथ सार्वजनिक जीवन में पीलू मोदी ने जो मुकाम हासिल किया, वह काबिले तारीफ है।

लोकतंत्र आज पूरी तरह सत्ता के गणित में बदल गया है। भारत में तो यह स्थिति है ही, दुनिया के उन देशों में भी यह स्थिति है जिन पर आधुनिक लोकतंत्र की संभाल से जुड़ी काफी उम्मीदें थीं। बात अपने देश की करें तो स्वाधीनता आंदोलन की नैतिक चमक में निखरे नेताओं के साथ राजनेताओं की पूरी ऐसी एक पात रही जिनके राजनीतिक जीवन का विस्तार आजादी के बाद हुआ। भारतीय संसदीय राजनीति की विमर्शी ऊंचाई और विविधता को समझना हो तो इन नेताओं के जीवन, आदर्श और संघर्ष को देखना-समझना होगा।

तारीफ यह कि इनमें कई ऐसे नेता हुए जिनकी राजनीति की धार हमेशा सत्ता विरोधी रही लेकिन वे लोकप्रिय रहे और अपने राजनीतिक संघर्ष के प्रति काफी हद तक ईमानदार भी। ऐसे ही राजनेताओं की कतार में एक बड़ा और दिलचस्प नाम है पीलू मोदी का। बतौर सासंद उनकी हाजिर जवाबी और जिंदादिल किरदार से जुड़े किस्से आज भी संसद के गलियारे से लेकर राजनीति के पुराने जानकारों के बीच सुने जाते हैं।

जिस तरह दो अक्तूबर को महात्मा गांधी जैसी बड़ी शख्सियत जयंती होने कारण उसी दिन जन्म लेने वाले लालबहादुर शास्त्री की चर्चा थोड़ी कम होती है, वही स्थिति पीलू मोदी के भी साथ है। वे अपना जन्मदिन पंडित नेहरू के साथ साझा करते हैं। 14 नवंबर,1926 को मुंबई में उनका जन्म हुआ था। सर होमी मोदी उनके पिता थे जिनकी पारसी समाज में तो खासी इज्जत थी ही, बाकी लोगों के लिए भी वे एक बड़े कारोबारी और गांधीवादी शख्सियत थे। वे संविधान सभा के सदस्य रहे और आगे चलकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल।

पीलू मोदी की शुरुआती स्कूली पढ़ाई बंबई के कैथेड्रल ब्वायज स्कूल में हुई। यहां उनके सहपाठी थे जूनागढ़ रियासत के दीवान शाहनवाज भुट्टो के बेटे जुल्फिकार अली भुट्टो। बाद के दिनों में पीलू ने ‘जुल्फी माई फ्रेंड’ नाम से उन पर किताब भी लिखी। पिता की तरह पीलू भी खासे उद्यमशील थे। उन्होंने अमेरिका के बर्कले यूनिवर्सिटी से स्थापत्य कला में डिग्री हासिल की थी। दिल्ली के ओबेराय होटल का डिजाइन उन्होंने ही बनाया था। अलबत्ता पीलू लंबे समय तक इस क्षेत्र में नहीं रहे और देखते-देखते राजनीति के प्रति उनकी दिलचस्पी उनके जीवन की दिशा बन गई।

गुजरात का गोधरा आज भले भिन्न कारणों से जाना जाता हो पर एक दौर में इस जगह की चर्चा पीलू मोदी के नाम से जुड़ी थी। वे यहां से सांसद रहे। पीलू मोदी संसद पहुंचे भी तो उस पार्टी से जिसका जिक्र आम चर्चा में कम सामान्य ज्ञान की प्रश्नोत्तरी में ज्यादा होता है। ‘स्वतंत्र पार्टी’ का गठन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने किया था। पीलू इसके संस्थापक सदस्यों में एक थे। महारानी गायत्री देवी भी इस पार्टी से चुनाव लड़कर संसद पहुंची थीं। यह दल बाजारवाद और खुलेपन का समर्थक था। इसी पार्टी से गोधरा लोकसभा सीट से 1967 एवं 1971 में पीलू मोदी संसद पहुंचे। 1978 में वे जनता पार्टी के टिकट पर राज्यसभा सदस्य चुने गए।

तकरीबन चौदह साल लंबी संसदीय पारी में पीलू मोदी ने संसद को अपनी समझ और व्यंग्य से खूब समृद्ध किया। वे इंदिरा गांधी के धुर विरोधी माने जाते थे। आलम यह था कि व्यंग्य में वे श्रीमती गांधी को अस्थायी जबकि खुद को स्थायी पीएम (पीलू मोदी) कहते थे। पर ये बातें तब निजी जीवन के खटास में नहीं बदलती थीं। कहा जाता है कि श्रीमती गांधी संसद में उनके भाषण की कायल थीं। अक्सर वो पत्र लिखकर उनके भाषण की तारीफ करती थीं। विरोध, नैतिकता और जिंदादिली के साथ सार्वजनिक जीवन में पीलू मोदी ने जो मुकाम हासिल किया, वह काबिले तारीफ है।

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