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शख्सियत: युवा तुर्क मोहन धारिया

यह नाम उस जोश और ताजगी का सहचर है, जिसे कभी कांग्रेस के भीतर तो कभी बाहर समाजवादी धारा के तौर पर शिनाख्त मिली। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन का उन्होंने जिस ऊर्जा और निर्भयता के साथ निर्वाह किया, वह एक आपवादिक उदाहरण है।

Jansatta personalityभारतीय राजनीति के जोशीले और ऊर्जावान समाजवादी राजनेता रहे मोहन धारिया।

भारतीय राजनीति में नैतिकता और सिद्धांत के साझे को आचरण का संबल देने वाले शख्सियतों की जब भी चर्चा होगी तो उनमें खासतौर पर स्वाधीनता के बाद के दौर में मोहन धारिया का नाम जरूर शामिल होगा। यह नाम उस जोश और ताजगी का भी सहचर है, जिसे कभी कांग्रेस के भीतर तो कभी बाहर समाजवादी धारा के तौर पर शिनाख्त मिली। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन का उन्होंने जिस ऊर्जा और निर्भयता के साथ निर्वाह किया, वह एक आपवादिक उदाहरण है।

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड शहर में 14 फरवरी 1925 को जन्मे धारिया ने पुणे जाने से पहले वहीं अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। उन्होंने आगे कानूनी पढ़ाई पूरी की। यहां यह दिलचस्प है कि अध्ययन के दौरान ही वे स्वाधीनता संघर्ष में भी कूद पड़े थे। इस संघर्ष में उनकी शिरकत तरुणाई के जोश से किस तरह भरी रही होगी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 17 साल की उम्र में वे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता बन चुके थे। इसके बाद तो यह सिलसिला देश की आजादी तक कायम रहा।

इस दौरान उल्लेखनीय तौर पर उन्होंने महाड तहसील पर कब्जे के लिए युवाओं के मार्च का नेतृत्व किया। कुछ समय तक भूमिगत रहने के बाद भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। संघर्ष के इसी दौर में कुछ जोशीले स्वतंत्रता सेनानियों के साथ युवा मोहन धारिया ने एक जनसेना गठित की और 1948 में जंजीरा रियासत को मुक्त करा लिया, जहां वे अस्थायी सरकार में विदेश मंत्री थे। बाद में धारिया ने डाककर्मियों, राज्य परिवहन, बैंकों की ट्रेड यूनियनों तथा अन्य कर्मियोंं का नेतृत्व किया। वे भारतीय राष्ट्रीय श्रम केंद्र के संस्थापक थे।

धारिया लोकसभा और राज्यसभा के दो बार सदस्य रहे। दिल से समाजवादी धारिया इंदिरा गांधी की सरकार में योजना, आवास एवं शहरी विकास राज्य मंत्री रहे। 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने के कारण केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले धारिया पहले मंत्री थे। उस दौर में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पूर्व उपराषट्रपति कृष्णकांत के साथ मोहन धारिया को कांग्रेस में उनके जोशीले तेवरों की वजह से ‘युवा तुर्क’ की संज्ञा दी गई थी। कांग्रेस छोड़ने के बाद धारिया जयप्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन में शामिल हो गए। 1977 में कांग्रेस की करारी हार के बाद केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी सरकार में वे वाणिज्य मंत्री भी रहे। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने।

राजनीति में पांच दशक की सफल पारी के बाद 1982 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इस संन्यास के बावजूद देश के लोगों और देश की मिट्टी के प्रति उनके अटूट प्रेम का सातत्य बना रहा। राजनीति से दूर रहते हुए धारिया एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर सामने आए और किसानों के अधिकारों के लिए कई कार्य किए।

उनकी बनाई संस्था ’वनराई’ ने ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। वन को बचाने, बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने और जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने के अलवा इस संस्था ने ग्रामीणों के शहर की ओर पलायन रोकने में भी बड़ी कामयाबी हासिल की है। कई अन्य सम्मानों के साथ धारिया को 2005 में उनके किए सामाजिक कार्यों के लिए देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था।

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