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आधुनिक कन्नड़ साहित्य के पुरोधा मास्ति वेंकटेश अय्यंगार

सृजन और संवेदना के बीच रचनात्मकता के कई बहुमूल्य प्रयोग करने वाले मास्ति का साहित्यिक नाम ‘श्रीनिवास’ है और इसी नाम से उन्होंने अपना ज्यादातर साहित्य रचा। पर कन्नड़ लोक में वे ‘मास्ति’ के नाम से ही प्रसिद्ध रहे। उन्होंने कुल 137 पुस्तकें लिखीं। इनमें 120 कन्नड़ में और बाकी अंग्रेजी में हैं।

कन्नड़ साहित्य को समृद्ध करने वाले महान साहित्यकार मास्ति वेंकटेश अय्यंगार।

ज्ञान की अलग-अलग धारा और परंपरा के बीच साहित्य का स्थान मानवीय संवेदनाओं से जुड़ाव और उसकी अक्षुण्णता के हामीदार होने के कारण ऊंचा है। बड़ी बात यह भी कि भाषा और संस्कृति से जुड़ी तमाम निर्मितियों के बीच साहित्य यह काम लंबे समय से करता आ रहा है। आज जब भाषा भी वर्चस्व का माध्यम है तो हम यह भूल जाते हैं कि न सिर्फ भारत बल्कि दुनियाभर में सांस्कृतिक बहुलता ने जीवन और संस्कार को सबसे ज्यादा सार्थक और लोकतांत्रिक दिशा दी है। बहरहाल, बात एक ऐसे साहित्यकार की, जिसकी भाषा तो अखिल भारतीय नहीं पर जिनके साहित्यिक अवदान को मिली स्वीकृति जरूर अखिल भारतीय है। हम बात कर रहे हैं गहन मानवतावाद के पोषक और मानवीय सामर्थ्य और संवेदना में अटूट आस्था रखने वाले कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार डॉ मास्ति वेंकटेश अय्यंगार की। कन्नड़ साहित्य में कहानी लेखन को जो प्रतिष्ठा उन्होंने दिलाई, वह अन्यतम तो है ही, औपनिवेशिक दौर के भारतीय सृजन की चमकदार मिसाल भी है।

सृजन और संवेदना के बीच रचनात्मकता के कई बहुमूल्य प्रयोग करने वाले मास्ति का साहित्यिक नाम ‘श्रीनिवास’ है और इसी नाम से उन्होंने अपना ज्यादातर साहित्य रचा। पर कन्नड़ लोक में वे ‘मास्ति’ के नाम से ही प्रसिद्ध रहे। स्वयं उन्हें भी यह संबोधन प्रिय था। उन्होंने कुल 137 पुस्तकें लिखीं। इनमें 120 कन्नड़ में और बाकी अंग्रेजी में हैं। उनका लेखन सामाजिक, दार्शनिक, सौंदर्यात्मक विषयों पर आधारित है। मास्ति का जन्म छह जून, 1891 में कर्नाटक के कोलार जिला के होंगेनल्ली गांव में एक तमिल अय्यंगार परिवार में हुआ था। उनकी मातृभाषा जरूर तमिल थी पर रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने कन्नड़ को अपनाया। उन्होंने 1914 में मद्रास विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर किया। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करके उन्होंने कर्नाटक में अलग-अलग विभागों में महत्त्वपूर्ण दायित्व संभाला। 26 वर्ष लंबी सेवा के बाद जब उनको मंत्री के बराबर का पद नहीं मिला और उनके एक कनिष्ठ को पदोन्नत कर दिया गया तो प्रतिकारस्वरूप उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

मास्ति अपने गुरु बीएम श्री से बहुत प्रभावित थे। जब श्रीजी ने कन्नड़ साहित्य के पुनरुत्थान के लिए उन्हें बुलाया तो उन्होंने खुशी-खुशी इस रचनात्मक चुनौती को स्वीकार किया। यह कोशिश बाद में कन्नड़ साहित्य में ‘नवोदय’ आंदोलन के तौर पर जाना गया। मास्ति को आधुनिक कन्नड़ कहानी के जनक के रूप में याद किया जाता है। उनके 15 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। वे अपने उपन्यासों के कारण भी चर्चित रहे। खासतौर पर उनके दो ऐतिहासिक उपन्यास ‘चेन्नबसवनायक’ और ‘चिक्क वीरराजेंद्र’ काफी प्रसिद्ध हैं। कन्नड़ के बहुत कम उपन्यासों में मास्ति के इन दो उपन्यासों जैसा बहुमुखी सामाजिक संबंधों का गहन और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है।

उनका कथा साहित्य औपनिवेशिक और सामंती दौर में परविर्तन के बीज और उसके पल्लवन को संवेदनात्मक स्तर पर बहुत सावधानी से रेखांकित करता है। मास्ति की गद्यशैली की खासियत सामान्य बोलचाल की भाषा में बरता गया कथात्मक संयम है। उन्होंने अपने साहित्यिक सृजन से काफी यश और सम्मान पाया। उन्हें 1968 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। कर्नाटक विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की मानद उपधि देकर सम्मानित किया था। 1973 में साहित्य अकादेमी ने उन्हें अपना फेलो बनाया। 1983 में मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार ने मास्ति के अक्षर पुरुषार्थ से देश-दुनिया को परिचित कराया।

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