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विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम

नजरुल को प्रमिला नाम की हिंदू लड़की से प्रेम था। दोनों धर्मों के कट्टर लोगों के भारी विरोध के बावजूद उन्होंने यह शादी की। दिलचस्प है कि नजरुल ने भक्ति साहित्य को जहां कई इस्लामिक मान्यताओं वाली रचनाएं दीं, वहीं देवी दुर्गा की भक्तिमें गाया जाने वाला श्यामा संगीत और कृष्ण गीत-भजन की दुनिया को भी उन्होंने समृद्ध किया।

विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम।

भक्ति और विद्रोह को एक ही स्वर में साधना बड़ी सफलता तो है ही, रचनात्मक तौर पर विलक्षण भी है। इस लिहाज से काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ा और निर्विवादित नाम है। दिलचस्प यह कि उनका दौर बहुत पीछे का नहीं है। ऐसे लोग आज भी हमारे बीच हैं, जो नजरुल से मिले हैं, उनसे बात की है। नजरुल भक्त कवि थे। पर यह भक्ति तब मुखर विरोध और हस्तक्षेप में बदल गई, जब उन्हें लगा कि सांप्रदायिक कट्टरता से देश-समाज को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। दो सितंबर, 1922 को छपे एक आलेख में वे कहते हैं- ‘मैं हिंदुओं और मुसलमानों को बर्दाश्त कर सकता हूं, लेकिन चोटी वालों और दाढ़ी वालों को नहीं। चोटी हिंदुत्व नहीं है। दाढ़ी इस्लाम नहीं है।’ साफ है कि नजरुल ऐसे भक्त कवि नहीं थे जो अपने देशकाल से सीधे जुड़ने से गुरेज करता है।

नजरुल का जन्म 25 मई, 1899 को बंगाल के आसनसोल के पास चुरुलिया गांव में एक मुसलिम तालुकदार घराने में हुआ। घर का माहौल पूरी तरह मजहबी था। उनके पिता काजी फकीर अहमद इमाम थे। नजरुल बचपन में सामान्य बच्चों से थोड़े अलग थे। वे हमेशा कुछ खोए-खोए रहते थे। इस कारण लोग उन्हें ‘दुक्खू मियां’ तक पुकारने लगे थे। उनकी शुरुआती तालीम मदरसे में हुई। जब वे महज दस साल के थे तो उनके पिता की मौत हो गई। इसके बाद नजरुल पिता की जगह मस्जिद की देखभाल का काम करने लगे।

ये वो दौर था जब उनकी जिंदगी का हर सिरा इस्लामी परिवेश से जुड़ा था। पर इसी दौरान ईमान की तालीम के बाद बारी आई संगीत और साहित्य की। उनके चाचा फजले करीम की संगीत मंडली थी। यह मंडली पूरे बंगाल में अपने कार्यक्रमों के सिलसिले में घूमती रहती थी। नजरूल ने मंडली के लिए गाने लिखे। इस दौरान बांग्ला भाषा लिखनी सीखी, संस्कृत भी सीखी। उसके बाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे। इसका असर भी हुआ। उन्होंने कई नाटक लिखे जो हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित थे।

कुछ ही सालों में उनकी जिंदगी ने एक और करवट ली। 1917 में वे ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए। इसका कारण था तत्कालीन सैन्य-राजनीतिक हालात में दिलचस्पी। कराची कैंट में उनकी तैनाती थी। वहां उनके पास ज्यादा काम नहीं था। लिहाजा पढ़ना-लिखा जारी रहा। जहां रवींद्रनाथ और शरत को उन्होंने बांग्ला में पढ़ा, वहीं रूमी और खय्याम को फारसी में पढ़ा। 1919 में उनकी पहली किताब आई- ‘एक आवारा की जिंदगी’। इसके कुछ ही माह बाद पहली कविता ‘मुक्ति’ छपी। 1922 में उनकी एक कविता ने उन्हें रातोंरात लोकप्रिय बना दिया। कविता थी-‘विद्रोही’। जाहिर है इसमें उनके तेवर बागी थे। देखते-देखते यह कविता अंग्रेजी राज का विरोध कर रहे क्रांतिकारियों का प्रेरक गीत बन गई और नजरुल ‘विद्रोही कवि’ के नाम से मशहूर हो गए।

नजरुल को प्रमिला नाम की हिंदू लड़की से प्रेम था। दोनों धर्मों के कट्टर लोगों के भारी विरोध के बावजूद उन्होंने यह शादी की। दिलचस्प है कि नजरुल ने भक्ति साहित्य को जहां कई इस्लामिक मान्यताओं वाली रचनाएं दीं, वहीं देवी दुर्गा की भक्तिमें गाया जाने वाला श्यामा संगीत और कृष्ण गीत-भजन की दुनिया को भी उन्होंने समृद्ध किया। आजादी के बाद के उनके दिन काफी तकलीफ में बीते। उनकी सेहत खराब रहने लगी। 1962 में पत्नी का निधन हो गया। दिसंबर, 1971 में बांग्लादेश आजाद हुआ। 1972 में उन्हें बांग्लादेश ने अपना ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया। भारत सरकार की मर्जी से उन्हें ढाका ले जाया गया। चार साल बाद उनकी ढाका में ही मौत हो गई। रवींद्र संगीत की तरह नजरूल संगीत की ख्याति उन्हें लोगों की श्रद्धा और स्मृति से आज भी जोड़े हुए है।

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