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सामाजिक न्याय के योद्धा ज्योतिबा फुले

24 सितंबर 1873 को दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली।

Jansatta personalityसामाजिक न्याय के योद्धा ज्योतिबा फूले।

जाति, वर्ण, लिंग और परंपरा के आधार पर सामाजिक विभेद की तल्ख सच्चाई मनुष्य की सभ्यता और उसकी पूरी विकास यात्रा पर सवाल उठाती रही है। ये सवाल मानवीय अस्मिता के लिहाज से तो अहम हैं ही, इसके लिए संघर्ष को जानने-समझने के लिए भी जरूरी है। दुनियाभर में औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की जड़ें लंबे समय तक इसलिए जमीं रहीं कि सामाजिक समरसता के खिलाफ विभेद की रणनीति कारगर रही। अलबत्ता इस असमानता के खिलाफ संघर्ष भी काफी पहले शुरू हो गया था। भारत में इस संघर्ष के एक बड़े नायक थे ज्योतिबा फुले।

ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में हुआ था। उनका पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। वे 19वीं सदी के एक बड़े समाज सुधारक और विचारक थे। ज्योतिबा फुले ने भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन और लैंगिक भेदभाव की पुरजोर मुखालफत की।देश से छुआछूत को खत्म करने और समाज के वंचित तबके को सशक्त बनाने में अहम किरदार निभाने वाले ज्योतिबा फुले ने खासतौर पर महिला शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य किया। महिलाओं की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1854 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए शिक्षिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बनाया।

उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की कोशिश की, किंतु जब ज्योतिबा आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाव डालकर पति-पत्नी को घर से निकलवा दिया गया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका जरूर, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए। महिलाओं को लेकर उनकी प्रगतिशील सोच का दायरा कितना खुला और व्यापक था इसका अंदाजा इस बात से भी लगाा जा सकता है कि वे वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के न सिर्फ समर्थक थे बल्कि इसके लिए उन्होंने तब कई क्रांतिकारी प्रयास किए जब इस दिशा में लोगों ने तार्किक ढंग से सोचना-समझना भी शुरू नहीं किया था।

24 सितंबर 1873 को दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। अछूतोद्धार के लिए ज्योतिबा ने उनके अछूत बच्चों को अपने घर पर पाला और अपने घर की पानी की टंकी उनके लिए खोल दी। नतीजतन उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। समाज सेवा के कार्यों से उनकी बढ़ती ख्याति देखकर प्रतिक्रियावादियों ने उन्हें मारने का भी षड्यंत्र रचा। पर हत्यारे ज्योतिबा की समाजसेवा देखकर उनके शिष्य बन गए।

समाज के दबे-कुचले वर्ग के लिए ज्योतिबा ने ब्रितानी शासन से भी टकराने में हिचकिचाहट महसूस नहीं की। इसके एकाधिक प्रमाण उनके जीवन में मिलते हैं। भारत में समाज सुधार आंदोलन के एक बड़े प्रणेता के तौर पर आज भी ज्योतिबा फुले का आदर इसलिए है क्योंकि उनके संघर्ष के रास्ते और मूल्यों के बूते ही देश में सामाजिक न्याय का आंदोलन आज भी आगे बढ़ रहा है और अपने आगे की हर तरह की चुनौतियों से निपट रहा है।

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