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नैतिक जीवटता का तारीखी कद हेमवतीनंदन बहुगुणा

1977 में लोकसभा चुनावों की घोषणा हुई तो बहुगुणा ने कांग्रेस से बगावत की खुली राह पकड़ ली। उन्होंने पूर्व रक्षा मंत्री जगजीवन राम के साथ मिलकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी पार्टी बनाई। उस चुनाव में इस दल को 28 सीटें मिलीं, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया।

हेमवती नंदन बहुगुणा।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जिस तरह देश की राजनीति या सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और शुचिता का ऐतिहासिक शील रचा, उसकी चमक देश की स्वाधीनता के बाद बढ़ने के बजाय घटती चली गई। आजादी के एक-डेढ़ दशक बीतते-बीतते सत्ता के लिए निजी खटास और सांगठनिक नैतिकता के दरकने के प्रसंग एक के बाद सामने आते गए। इन प्रसंगों में अहम है उन प्रतिबद्ध नेताओं का तारीखी उल्लेख जिन्होंने अपनी नैतिकता और स्वाभिमान को बहाल रखने के लिए लंबा संघर्ष किया। ऐसा ही एक बड़ा नाम है हेमवतीनंदन बहुगुणा का। बहुगुणा को एक दौर में ‘कांग्रेस का चाणक्य‘ तक कहा जाता था। पर उसी कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते ऐसे उलझे कि वे उत्तरोत्तर इस दल के प्रति मोहभंग की स्थिति तक पहुंच गए।

25 अप्रैल, 1919 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन पौड़ी जिले के बुधाणी गांव में हेमवतीनंदन का जन्म हुआ था। वो दौर था आर्य समाज के प्रभाव और प्रसार का, जो भारतीय परंपरा और संस्कृति को पुनर्जागरण की ऊंचाई तक ले जाना चाह रहा था। उसी दौरान महात्मा गांधी का भी प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। गांधीजी भारत की राजनीति के केंद्र में जनसाधारण को लाना चाह रहे थे। इन प्रयोगों का बहुगुणा के जीवन पर खासा असर पड़ा। 1936 से 1942 तक वे छात्र आंदोलनों में शामिल रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने बहुगुणा को रातोंरात पूरे देश में मशहूर कर दिया। फिरंगी हुकूमत ने उनको जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर पांच हजार का इनाम रखा था। एक फरवरी 1943 को दिल्ली के जामा मस्जिद के पास बहुगुणा गिरफ्तार हुए थे। पर 1945 में जेल से छूटते ही वे फिर से स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय हो गए।

1952 से वो लगातार यूपी कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। 1958 में वे केंद्र सरकार में श्रम और उद्योग विभाग के उपमंत्री बने। फिर 1963 से 1969 तक यूपी कांग्रेस महासचिव के पद पर रहे। 1967 में आम चुनाव के बाद बहुगुणा को अखिल भारतीय कांग्रेस का महामंत्री चुना गया। इसी साल कांग्रेस में समस्या पैदा हो गई। चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी। फिर 1969 में इंदिरा गांधी को लेकर ही विरोध शुरू हो गया। कांग्रेस दो हिस्सों में टूट गई।

इस दौरान वे लगातार इंदिरा गांधी के समर्थन में खड़े रहे। पर उनकी इस प्रतिबद्धता के बदले न तो संगठन में और न ही सरकार में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दी गई। 1975 आते-आते और आपातकाल की घोषणा होते ही कांग्रेस से उनके संबंध और खराब हो गए। बहुगुणा का इंदिरा गांधी से मनमुटाव बढ़ा और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

जब 1977 में लोकसभा चुनावों की घोषणा हुई तो बहुगुणा ने कांग्रेस से बगावत की खुली राह पकड़ ली। उन्होंने पूर्व रक्षा मंत्री जगजीवन राम के साथ मिलकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी पार्टी बनाई। उस चुनाव में इस दल को 28 सीटें मिलीं, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया। हालांकि जनता पार्टी के बिखराव के बाद बहुगुणा 1980 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में दोबारा शामिल हो गए। चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई। पर उनको कैबिनेट में जगह नहीं मिली।

1984 में अमिताभ बच्चन के हाथों इलाहाबाद लोकसभा सीट से मिली हार ने भारतीय राजनीति के इस बड़े धज को हाशिए पर ला खड़ा किया। अलबत्ता अनवरत संघर्ष और नैतिक जीवटता के साथ उन्होंने जिस तरह का राजनीतिक जीवन जिया, वो अपनी मिसाल आप है।

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