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अजीब दास्तां है ये – हसरत जयपुरी

जब वे लगभग बीस वर्ष के थे, तब उन्होंने शायरी करनी शुरू कर दी थी। उसी समय उन्हें अपने पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से प्यार हो गया था। वह मजहब से हिंदू थी। हसरत ने उस लड़की को एक गीत के रूप में प्रेमपत्र लिखा था, मगर शायद उसे दे नहीं पाए थे। इसकी खलिस उन्हें ताउम्र रही। बाद में, एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि प्रेम कोई धर्म नहीं जानता।

फिल्म वही सफल मानी जाती है, जिसकी कहानी के साथ गाने भी लोगों के मन पर गहरा असर छोड़ते हैं। फिल्म की कहानी तो फिर भी कुछ समय बाद लोगों के दिमाग में धुंधली पड़ जाती है, मगर उसके गाने सदा जुबान पर बसे रहते हैं। लोग ताउम्र उन्हें गुनगुनाते रहते हैं। कई पीढ़ियां उन्हें गुनगुनाती हैं। गीतकार का नाम लोगों को सदा याद रहता है। ऐसे ही सदाबहार गाने रचने वाले शायर थे हसरत जयपुरी।

हसरत जयपुरी का जन्म जयपुर में हुआ था। मगर यह उनका शायरी का नाम था। उनका असली नाम था इकबाल हुसैन। उनकी स्कूली शिक्षा तो बहुत नहीं हुई थी, मगर शायरी का हुनर उन्हें बहुत कम उम्र में मिल गया था। उन्होंने शुरुआती तौर पर अंग्रेजी की पढ़ाई की थी, और फिर अपने नाना फिदा हुसैन ‘फिदा’ से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की थी।

जब वे लगभग बीस वर्ष के थे, तब उन्होंने शायरी करनी शुरू कर दी थी। उसी समय उन्हें अपने पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से प्यार हो गया था। वह मजहब से हिंदू थी। हसरत ने उस लड़की को एक गीत के रूप में प्रेमपत्र लिखा था, मगर शायद उसे दे नहीं पाए थे। इसकी खलिस उन्हें ताउम्र रही। बाद में, एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि प्रेम कोई धर्म नहीं जानता।

यह बिल्कुल जरूरी नहीं कि एक मुसलिम लड़के को किसी मुसलिम लड़की से ही प्यार हो। मेरा प्यार चुप्पा था। प्रेमपत्र के रूप में लिखे उनके उस गीत का मुखड़ा था- ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर, के तुम नाराज न होना।’ बाद में प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता राज कपूर ने इसे अपनी फिल्म ‘संगम’ में शामिल किया और यह गीत पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया।

हसरत जयपुरी 1940 में बस कंडक्टर की नौकरी के लिए मुंबई गए थे। कंडक्टरी करते हुए वे मुशायरों में भी हिस्सा लेते थे। एक मुशायरे में, पृथ्वीराज कपूर ने उनकी शायरी सुनी और इतने प्रभावित हुए कि अपने बेटे राज कपूर से उनके लिए सिफारिश की। राज कपूर उन दिनों शंकर-जयकिशन के साथ एक संगीतमय प्रेम कहानी, ‘बरसात’ (1949) की योजना बना रहे थे। उसके लिए उनसे गीत लिखने को कहा।

इस तरह जयपुरी ने फिल्म के लिए अपना पहला गीत ‘जिया बेकरार है’ लिखा। उनका दूसरा गीत ‘छोड़ गए बालम’ था। दोनों गाने खूब लोकप्रिय हुए। फिर वहीं से हसरत जयपुरी का फिल्म सफर शुरू हो गया।

जयपुरी ने 1971 तक शैलेंद्र के साथ राज कपूर की फिल्मों के लिए गीत लिखे। जयकिशन की मृत्यु और ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) तथा ‘कल आज और कल’ (1971) की विफलता के बाद, राज कपूर ने अन्य गीतकारों और संगीत निर्देशकों की ओर रुख किया। हालांकि बाद में राज कपूर ने फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ (1985) और ‘हिना’ (1991) के लिए गाने लिखने के लिए आमंत्रित किया था।

जब साथी गीतकार शैलेंद्र ने निर्माता के तौर पर फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई, तो उन्होंने जयपुरी को फिल्म के लिए गीत लिखने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने फिल्म ‘हलचल’ (1951) के लिए पटकथा भी लिखी। गीतकार के रूप में उनकी आखिरी फिल्म थी- ‘हत्या: द मर्डर’ (2004)।

उनके मशहूर गीतों में ‘जिया बेकरार है’, ‘छोड़ गए बालम’, ‘अजीब दास्तां है ये’, ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’, ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को’, ‘पंख होते तो उड़ आती रे’, ‘सायोनारा सायोनारा’, ‘आओ ट्विस्ट करें’, ‘सुन साहिबा सुन’, ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए’ आदि शुमार हैं।

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