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भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहब फालके

दादासाहब की बनाई फिल्मों में राजा हरिश्चंद्र, मोहिनी भास्मासुर, सत्यवान सावित्री, लंका दहन, कलिया मर्दन, बुद्धदेव, भक्त प्रहलाद, रुक्मिणी हरण, नल दमयंती, चंद्रहास, मालती माधव, मालविकाग्निमित्र, संत मीराबाई आदि प्रमुख हैं।

भारतीय फिल्मों में तनिक भी रुचि रखने वाला व्यक्ति दादासाहब फालके के नाम से जरूर परिचित होगा। उन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का पितामह कहा जाता है। उनका पूरा नाम धुंडिराज गोविंद फालके था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनका जीवन इस बात का अच्छा उदाहरण है कि आदमी में धुन हो तो सफलता मिलती जरूर है। उन्होंने सर जेजे स्कूल आफ आर्ट से चित्रकला का प्रशिक्षण लिया था। वे मंच के अनुभवी अभिनेता और शौकिया जादूगर थे।

कला भवन बड़ौदा से फोटोग्राफी का एक पाठ्यक्रम भी किया था। उन्होंने फोटो केमिकल प्रिंटिंग की प्रक्रिया में भी प्रयोग किए थे। वे शुरू में प्रिंटिंग के कारोबार में लगे हुए थे, मगर 1910 में उनके एक साझीदार ने अपना आर्थिक सहयोग वापस ले लिया। इस तरह कारोबार में हुए नुकसान से उनका स्वभाव चिड़िचड़ा हो गया था। उन्होंने क्रिसमस के अवसर पर ‘ईसा मसीह’ पर बनी एक फिल्म देखी। उसके बाद ही उन्होंने निर्णय कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद फिल्मकार बनना है।

उन्होंने एक सस्ता कैमरा खरीदा और शहर के सभी सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों का अध्ययन और विश्लेषण किया। अपनी कार्यकुशलता को सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक बर्तन में मटर बोई। फिर उसके बढ़ने की प्रक्रिया को एक समय में एक फे्रम खींच कर साधारण कैमरे से उतारा। इसके लिए उन्होंने टाइमैप्स फोटोग्राफी की तकनीक इस्तेमाल की।

फिर 1912 में फिल्म निर्माण सीखने के लिए वे इंग्लैंड गए और एक सप्ताह तक सेसिल हेपवर्थ के अधीन काम सीखा। उनके पास सभी तरह का हुनर था। वे नए-नए प्रयोग करते थे। इस तरह प्रशिक्षण का लाभ उठा कर और अपनी स्वभावगत प्रकृति के चलते उन्होंने पहली भारतीय फिल्म बनाई, जिसका नाम था ‘राजा हरिश्चंद्र’।

चूंकि उस दौर में सिनेमा निर्माण की सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए सब कामचलाऊ व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी पड़ी। अभिनय करना सिखाना पड़ा, दृश्य लिखने पड़े, फोटोग्राफी करनी पड़ी और फिल्म प्रोजेक्शन के काम भी करने पड़े। महिला कलाकार उपलब्ध न होने के कारण उनकी सभी नायिकाएं पुरुष कलाकार थे (वेश्या चरित्र को छोड़ कर)।

सभी शूटिंग दिन की रोशनी में की गई, क्योंकि वह एक्सपोज्ड फुटेज को रात में अपनी पत्नी की सहायता से डेवलप और प्रिंट करते थे। 21 अप्रैल, 1913 को ओलंपिया सिनेमा हाल में यह फिल्म रिलीज की गई। मगर पश्चिमी फिल्मों के दर्शकों और प्रेस ने इसकी उपेक्षा की। मगर फालके जानते थे कि वे आम जनता के लिए अपनी फिल्म बना रहे हैं। उनका विश्वास सही साबित हुआ और यह फिल्म जबर्दस्त लोकप्रिय रही।

इस फिल्म के बाद दादासाहब ने दो और पौराणिक फिल्में ‘भस्मासुर मोहिनी’ और ‘सावित्री’ बनाई। 1915 में अपनी ये तीनों फिल्मों के साथ वे विदेश चले गए। लंदन में इन फिल्मों की बहुत प्रशंसा हुई। कोल्हापुर नरेश के आग्रह पर 1937 में दादासाहब ने अपनी पहली और अंतिम बोलती फिल्म ‘गंगावतरण’ बनाई थी। दादासाहब ने छोटी-बड़ी करीब सवा सौ फिल्मों का निर्माण किया था।

दादासाहब की बनाई फिल्मों में राजा हरिश्चंद्र, मोहिनी भास्मासुर, सत्यवान सावित्री, लंका दहन, कलिया मर्दन, बुद्धदेव, भक्त प्रहलाद, रुक्मिणी हरण, नल दमयंती, चंद्रहास, मालती माधव, मालविकाग्निमित्र, संत मीराबाई आदि प्रमुख हैं। 16 फरवरी, 1944 को चौहत्तर वर्ष की अवस्था में नासिक में उनका निधन हो गया। भारत सरकार उनकी स्मृति में हर साल चलचित्र जगत के किसी विशिष्ट व्यक्ति को ‘दादा साहब फालके पुरस्कार’ प्रदान करती है।

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