बांग्ला साहित्य का गौरव बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय

‘पाथेर पांचाली’ उपन्यास पर फिल्म बनाकर भारतीय सिनेमा के सर्वाधिक रचनात्मक दौर का आगाज करने वाले सत्यजीत राय मानते थे कि बिभूति बाबू को अपनी कहानी कहने के लिए बाह्य कलात्मक समर्थन की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि उनके किरदार अपने शब्दों से अपनी अंतर-संवेदना और उसकी पूरी निर्मिति को सफलतापूर्वक जाहिर करते हैं।

Jansatta Personality
शख्सियत बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की महत्ता यूनेस्को ने भी स्वीकारी है। वे विदेशी भाषाओं में सर्वाधिक अनुदित होने वाले साहित्यकारों में शुमार हैं।

भारत की आधुनिक सांस्कृतिक निर्मिति की विलक्षणता को जानने-समझने के लिए बंगाल की संस्कृति और उससे जुड़े नवजागरण के सरोकारों का अध्ययन बेहद जरूरी है। इस लिहाज से जिन कुछ नामों और उनके रचनात्मक जीवन और कार्यों का उल्लेख काफी होता है, उनमें बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का नाम अहम है। इस नाम से जुड़ी कृति, यश और लोकप्रियता का आलम यह है कि यूनेस्को तक ने उनकी महत्ता को स्वीकार किया है। वे विदेशी भाषाओं में सर्वाधिक अनूदित होने वाले साहित्यकारों में शुमार हैं।

उनके साहित्य के अध्येताओं व आलोचकों ने जो एक बात सामान्य तौर पर कही है, वह यह कि उनका लेखन एक तरह से सामान्य जीवन का उत्सव है। ऐसा उत्सव जिसमें दुख-सुख, संघर्ष और संवेदना सब एक साथ मानवीय जीवन गरिमा को रचते हैं। इस गरिमा की चमक और इसे लगने वाली खरोंच को एक साथ लाने की कोशिश में बिभूति बाबू के लेखन ने मनुष्य की संवेदना और सामाजिकता से जुड़े सवालों, सरोकारों और दरकारों की जिस तरह शिनाख्त की, वह अपूर्व है।

बिभूति बाबू का परिवार मौजूदा पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में स्थित बसीरहाट के पास पनीतार गांव का रहनेवाला था। उनके परदादा वैद्य थे। वैसे खुद उनका जन्म कल्याणी नादिया के पासमुरीतिपुर गांव में मामा के घर में हुआ था। उनके पिता महानंदा बंद्योपाध्याय संस्कृत के विद्वान और अच्छे कहानीकार थे। बिभूति बाबू महानंदा और उनकी पत्नी मृणालिनी के पांच बच्चों में सबसे बड़े थे। उन्होंने बोंगन हाई स्कूल में अध्ययन किया, जो ब्रितानी दौर के भारत में सबसे पुराने संस्थानों में से एक था।

एंट्रेंस और इंटरमीडिएट की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद उन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहास और संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई सुरेंद्रनाथ कॉलेज (तब रिपन कॉलेज) से पूरी की। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय से विधि में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करना चाहते थे पर अभावग्रस्त परिस्थिति के कारण ऐसा नहीं कर सके। लेखन के क्षेत्र में गंभीरता से उतरने से पहले उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कई तरह के कार्य किए। इस दौरान उनका संपर्क तब के बड़े संगीत प्रेमी और परोपकारी व्यक्ति खेलचंद्र घोष से हुई। वे घोष के सहायक और अत्यंत विश्वसनीय थे। उनके साथ रहते हुए बिभूति बाबू ने लोक और सामाजिक जीवन के कई रूपों और विरोधाभासों का प्रत्यक्ष अनुभव किया।

बाद के दिनों में बिभूति बाबू अपने मूल स्थान पर लौट आए। उन्होंने गोपालनगर हरिपद संस्थान में एक शिक्षक के रूप में कार्य करना शुरू किया। इसी दौरान वे साहित्यिक लेखन की तरफ स्थायी तौर पर प्रवृत्त हुए। उनकी रचनाएं ग्रामीण बांग्ला जीवन का समृद्ध कोलाज हैं। ‘पाथेर पांचाली’ उपन्यास की लोकप्रियता उनके रचनात्मक परिचय का एक तरह से पर्याय बनी। इसके अलावा बनगांव, आदर्श हिंदू होटल, बिपिनर संस्कारम और अरण्यक के लेखक के तौर पर भी उन्हें खूब ख्याति मिली।

‘पाथेर पांचाली’ उपन्यास पर फिल्म बनाकर भारतीय सिनेमा के सर्वाधिक रचनात्मक दौर का आगाज करने वाले सत्यजीत राय मानते थे कि बिभूति बाबू को अपनी कहानी कहने के लिए बाह्य कलात्मक समर्थन की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि उनके किरदार अपने शब्दों से अपनी अंतर-संवेदना और उसकी पूरी निर्मिति को सफलतापूर्वक जाहिर करते हैं। बांग्ला कथा साहित्य का यह बड़ा हस्ताक्षर आज भी न सिर्फ खासा पढ़ा जाने वाला नाम है बल्कि अपने अवदानों के कारण कई तरह के सांस्कृतिक विमर्शों और प्रस्थानों का लगातार जरूरी हिस्सा भी बना हुआ है।

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