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‘अपनी गंध नहीं बेचूंगा’- बालकवि बैरागी

एक संवेदनशील कवि के तौर पर ‘अपनी गंध नहीं बेचूंगा’, ‘गन्ने मेरे भाई’ और ‘दीवट पर दीप’ जैसी कविताओं में उनका लोक जीवन और प्रकृति से गहरा प्रेम झलकता है। आजादी के बाद के दौर में जिन लोगों ने हिंदी साहित्य की गरिमा और उसकी जनप्रियता को एक साथ बहाल रखने में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें बैरागी जी का नाम सर्वप्रमुख है।

साहित्य, सिनेमा और राजनीति के क्षेत्र के महान शख्सियत बाल कवि बैरागी।

जीवन और कर्म के क्षेत्र में साधारण की असाधारण यात्रा हमेशा ही सबको प्रभावित करती है। एक निहायत सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले बालकवि बैरागी ने साहित्य और सिनेमा से लेकर राजनीति तक जिस तरह का सघन और सार्थक जीवन जिया, वह अपने आप में एक मिसाल है। नाम की ही भांति बालमन, सरल व्यक्तित्व और सादगी पसंद बैरागी जी जन्म दस फरवरी, 1931 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था। एक साधनहीन परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने अभाव को सफलता के सुलेख में बदला। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। हिंदी के प्रति उनका प्रेम अनूठा इसलिए भी था क्योंकि यह उनकी पहचान और व्यक्तित्व का हिस्सा बना।

बैरागी जी का जीवन कई राहों और पड़ावों से गुजरा पर उनकी ज्यादा बड़ी और सार्थक पहचान एक कवि और गीतकार की है। सत्तर-अस्सी के दशक में वे तकरीबन 25 फिल्मों के गीतकार रहे। ‘तू चंदा मैं चांदनी’, ‘मुझको भी राधा बना ले नंदलाल’ और ‘फिजाओं से जरा कह दो हमें इतना सताए ना’ जैसे उनके गीत खासे लोकप्रिय हुए। एक संवेदनशील कवि के तौर पर ‘अपनी गंध नहीं बेचूंगा’, ‘गन्ने मेरे भाई’ और ‘दीवट पर दीप’ जैसी कविताओं में उनका लोक जीवन और प्रकृति से गहरा प्रेम झलकता है। आजादी के बाद के दौर में जिन लोगों ने हिंदी साहित्य की गरिमा और उसकी जनप्रियता को एक साथ बहाल रखने में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें बैरागी जी का नाम सर्वप्रमुख है।

वे मालवा की लोक पृष्ठभूमि से आते थे। इस परिवेश का सांस्कृतिक गठन और लोक रचाव उनके साहित्य की निर्मिति को एक अलग ही रंग देता है। ‘मां’ पर लिखी हुई उनकी कविता को स्कूली पाठ्यक्रम में स्थान मिला। इस कविता में मां के बारे में वे लिखते हैं- ‘मैं, वात्सल्य और ममता से छलछलाती/ उसकी कल्याणी आंखों में/ खुद को देखता रह जाता/ फिर अपने अमृत भरे वक्ष को/ आंचल से ढ़कती हुई मुझे/ ममता-वात्सल्य और आंचल का अर्थ समझाती।’ कवि सम्मेलनों को लोकप्रिय बनाने में उनका बड़ा योगदान है।

वे लंबे समय तक छोटे-बड़े तमाम काव्य मंचों से जुड़े रहे। गोपालदास नीरज और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा पीढ़ी के कवियों के साथ उन्होंने काव्य मंच साझा किया। बैरागी जी के साहित्य सृजन पर विश्वविद्यालयों में कई शोध हुए हैं। उन्हें देशप्रेम, प्रकृति प्रेम और जनमानस का कवि माना जाता है। अलबत्ता ओजस्वी तेवर की कविताओं के लिए भी वे काफी प्रसिद्ध रहे। उन्होंने 1962 और 1971 के युद्ध में सीमाओं पर जाकर देशभक्तिकी कविताओं के जरिए सैनिकों का मनोबल बढ़ाया।

पुस्तक रूप में आया उनका जीवनानुभव ‘मंगते से मिनिस्टर’ की काफी सराहना हुई। उनकी कविताओं में एक खास तरह की संप्रेषणीयता दिखाई पड़ती है। यही कारण है कि बच्चों और नौजवानों को संबोधित करते हुए उन्होंने जो गीत लिखे, वे आज भी लोकप्रिय हैं। हिंदी में शैलेंद्र की तरह कई लोकप्रिय समूह या जनगीतों की रचना उन्होंने की है। मूल्यों पर आधारित अकलंकित लंबे राजनीतिक सफर में वे लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। वे दो बार मध्यप्रदेश में मंत्री भी रहे तथा लंबे समय तक संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य रहे। परिवार नियोजन पर ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा बैरागी जी ने ही लिखा था। आज हिंदी के काव्य मंचों पर वाचिक विधा का जो जोर दिखलाई पड़ता है, इस विधा के वे पुरोधा कवि थे। साहित्य, सेवा और शुचिता का यह अक्षर त्रिवेणी 13 मई, 2018 को पंच तत्वों में विलीन हो गया।

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