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शख्सियतः मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद का जन्म बनारस के लमही में हुआ था। विकट परिस्थितियों के बावजूद प्रेमचंद ने अपनी रुचियों को मरने नहीं दिया।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म बनारस के लमही में हुआ था। विकट परिस्थितियों के बावजूद प्रेमचंद ने अपनी रुचियों को मरने नहीं दिया। उन्होंने कहानी और उपन्यास के माध्यम से हिंदी साहित्य में यथार्थवादी परंपरा का विकास किया। उनका मूल नाम धनपतराय था।

शिक्षा

प्रेमचंद को पढ़ने-लिखने का शौक बचपन से था। जब वे मात्र तेरह साल के थे तब उन्होंने ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पढ़ लिया था। उन्होंने उस जमाने में उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ ‘शरसार’, मिर्जा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों को भी पढ़ा। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत न होने की वजह से 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद ही उन्होंने एक स्थानीय विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया। नौकरी के साथ उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी। 1910 में उन्होंने इंटर पास किया और 1919 में बीए पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए।

धनपतराय से प्रेमचंद

प्रेमचंद उस दौर में रूढ़िवाद के खिलाफ लिख रहे थे। उन्होंने 1910 में ‘सोजे-वतन’ (राष्ट्र का विलाप) रचना लिखी। इस रचना के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया और हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, अगर लिखा तो जेल भेज दिए जाएंगे। उस समय तक प्रेमचंद धनपतराय नाम से लिखते थे। तब उनके एक दोस्त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचंद नाम से लिखने लगे।

साहित्यिक अवदान

जिस समय में प्रेमचंद लिख रहे थे, वह देश में आजादी की अलख का दौर था। सब तरफ राष्ट्रवाद की भावना बलवती थी। इसी भावना के चलते प्रेमचंद ने 1921 में अपनी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने ‘मर्यादा’ नामक पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद छह साल तक ‘माधुरी’ का संपादन किया। बाद में उन्होंने अपनी खुद की मासिक पत्रिका ‘हंस’ और ‘जागरण’ निकाली। उन्होंने साहित्यिक लेखन करने के अलावा फिल्मों के लिए भी पटकथाएं लिखीं। उनकी पहली कहानी ‘सौत’ 1925 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू किया। इसी कड़ी में उनका पहला उपन्यास था ‘सेवासदन’। उन्होंने करीब पंद्रह उपन्यास, तीन सौ से अधिक कहानियां, तीन नाटक, दस अनुवाद, सात बाल पुस्तकें और हजारों पृष्ठ के लेख और संपादकीय लिखे।

प्रमुख रचनाएं

उपन्यास : असरारे मआबिद उर्फ देवस्थान रहस्य, सेवासदन (1918), प्रेमाश्रम (1922), रंगभूमि (1925), निर्मला (1925), कायाकल्प (1927), गबन (1928), कर्मभूमि (1932), गोदान (1936), मंगलसूत्र (अपूर्ण)।

कहानियां : उनके जीवन काल में कुल नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए- सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेमपूर्णिमा, प्रेम-पचीसी, प्रेम-प्रतिमा, प्रेम-द्वादशी, समरयात्रा, मानसरोवर : भाग एक और दो तथा कफन। उनकी मृत्यु के बाद उनकी कहानियां ‘मानसरोवर’ शीर्षक से आठ भागों में प्रकाशित हुर्इं।

नाटक : संग्राम (1923), कर्बला (1924) और प्रेम की वेदी (1933)।

वैचारिक लेखन : उन्होंने हंस, माधुरी, जागरण आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करते हुए और तत्कालीन अन्य पत्रिकाओं चांद, मर्यार्दा, स्वदेश आदि में अपनी साहित्यिक और सामाजिक चिंताओं को लेखों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। अमृतराय द्वारा संपादित ‘प्रेमचंद : विविध प्रसंग’ (तीन भाग) प्रेमचंद के लेखों का ही संकलन है।

अनुवाद : टॉलस्टॉय की कहानियां (1923), गाल्सवर्दी के तीन नाटक-हड़ताल (1930), चांदी की डिबिया (1931) और न्याय (1931) और रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्यास फसान-ए-आजाद का हिंदी अनुवाद आजाद कथा।

निधन : प्रेमचंद का 8 अक्तूबर, 1936 को बीमारी के कारण निधन हो गया।

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