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संदर्भ: स्मृतिहीनता के दौर में

स्मृतिविहीन रचना को जब कोई आलोचक रचना के नैरंतर्य के इतिहास में ले जाकर सोचने पर विवश करे या सीधी और खरी-खरी आलोचना कर दे, तो उसे उसी क्षण शत्रुता से जोड़ दिया जाता है। जबकि ऐसा सोचते हुए इस तथ्य की अनदेखी कर दी जाती है कि हमारी परंपरा में ही पंडितराज जगन्नाथ हुए, जिन्होंने आचार्य मम्मट की बहुत तीखी आलोचना की है।

पंकज पराशर

आलोचना ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में जब इतिहासबोध क्षरित होता है, तो चहुंओर स्मृतिहीनता बढ़ जाती है। उसके बाद सब कुछ मौलिक और पहली बार जैसा दिखाई देने लगता है! इन दिनों रचनाकारों के एक बड़े समूह को यह गर्वोक्ति करते हुए सहजता से देखा-पढ़ा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में वही ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने पहली बार अपनी कहानी या उपन्यास में ऐसा नया प्रयोग किया है! यही हाल आलोचकों का है, जो इतनी एकाग्रता से ‘सर्जनात्मक आलोचना’ लिखते हैं कि इतिहास में दर्ज रचना और आलोचना की पूरी परंपरा को परे धकेल कर अतिशय आत्मविश्वास से कहते हैं, ‘यह हिंदी की ऐसी पहली रचना है, जिसमें अमुक चीज है!’ ऐसे प्रशस्तिपरक वाक्यों के सहारे अनेक सर्जनात्मक आलोचक सतत क्रियाशील और प्रशस्त बने रहते हैं! ऐसे में भला उन स्मृतियों का क्या कीजै, जो स्मृतिहीन आलोचना को बार-बार याद दिलाई गई हों, इसके बावजूद वे तालाब के पानी पर जमी काई की तरह आच्छादित कर लेती हैं! मसलन, बहुत पहले यह मामला तय हो चुका था कि प्रेमचंद के नाम के पहले ‘मुंशी’ लगाना अनुचित है। दरअसल, मुंशी का संदर्भ गुजराती के उपन्यासकार और राजनीतिज्ञ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी से जुड़ता है। लेकिन अदालतों और कचहरियों में हिसाब-किताब का काम देखने वाले कायस्थ जाति के लोगों को सदियों से मुंशी का काम करते हुए देखती आई जातिवादी आंखों को प्रेमचंद के नाम में मुंशी लगा देने से आज भी गोया गलत को सही कर देने का गहरा आत्मसंतोष होता है!

परंपरा से ग्रहण और त्याग का विवेक आलोचक के स्वकर्म से संबद्ध होता है। भारतीय परंपरा से दो बहुप्रचलित और सरल सूत्रों की ओर ध्यान दिया जा सकता है, जिसे आज के समय में नजरअंदाज किया जा रहा है- ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ और ‘वादे-वादे जायते तत्वबोध:’। हम आज इसको याद नहीं रखते, जबकि बौद्धिक चर्चाओं में पश्चिम के विमर्शों की बहुत चर्चा करते हैं। कठोपनिषद में कहा गया है- ‘अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे। सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन:।’ हम वयोवृद्ध हो जाएं, तो भी यह स्मृति में रहे कि मुड़-मुड़ कर देखता हूं बार-बार नए-नए ज्ञानानुशासनों की ओर, नई-नई सूचनाओं की ओर, नई-नई तकनीकों की ओर। साहित्य, कला और संगीत की परंपरा में कुछ नया सीखने, कुछ नया सुनने और एक सच्चे सुर की कामना के निमित्त जैसी उत्सुकता और विनम्रता दिखाई देती है वह अद्भुत है। एरिक हॉब्सबॉम ने ऐसे ही नहीं कहा था, ‘सभी मनुष्यों और समाजों की जड़ें अतीत में होती हैं और सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टि से सभी इससे अपने को जोड़ कर ही अपनी अवस्थिति परिभाषित करते हैं। आज भी और पहले भी, बल्कि कहना तो यह चाहिए कि पहले की अपेक्षा आज अधिक। यही नहीं बल्कि सचेत मानवीय कर्म का अत्यंत विशाल अंश जो अध्यवसाय, स्मृति और अनुभव की पीठिका पर टिका होता है, अतीत, वर्तमान और भविष्य से आंख मिलाने के किसी विशाल यंत्र-विन्यास का निर्माण करता है। किसी न किसी रूप में अतीत के पाठन के आधार पर अनागत की भविष्यवाणी करने का लोभ संवरण नहीं कर पाते।’

स्मृतिविहीन रचना को जब कोई आलोचक रचना के नैरंतर्य के इतिहास में ले जाकर सोचने पर विवश करे या सीधी और खरी-खरी आलोचना कर दे, तो उसे उसी क्षण शत्रुता से जोड़ दिया जाता है। जबकि ऐसा सोचते हुए इस तथ्य की अनदेखी कर दी जाती है कि हमारी परंपरा में ही पंडितराज जगन्नाथ हुए, जिन्होंने आचार्य मम्मट की बहुत तीखी आलोचना की है। निराला ने पंत की काव्य-कृति ‘पल्लव’ की बड़ी तीखी आलोचना की है। एक ही विचारधारा के होने के बावजूद रामविलास शर्मा ने यशपाल और मुक्तिबोध की बड़ी तीखी आलोचना की है, वहीं नागार्जुन ने मैथिली को भाषा के बजाय बोली कहे जाने पर रामविलास शर्मा के तर्कों को उदाहरण देकर काटा था। आज की अधिकांश स्मृतिहीन आलोचना हिंदी आलोचना की इस जबरदस्त परंपरा को विस्मृत करके लेखकप्रियता के दबाव में अव्वल तो कुछ ठोस और कटु कहने से अक्सर बचती है और अगर नैतिकता के दबाव में कुछ कहना ही पड़ जाए तो ऐसी ‘संधा-भाषा’ में कहती है, जिसे वे समझें या खुदा समझे की-सी हालत होती है! नतीजतन साहित्यिक परिदृश्य में ऊपरी तौर पर भले सब कुछ शांत-शांत और भला-भला-सा दिखाई देता हो, लेकिन इस कथित शांति से न तो आलोचना का भला होता है, न आलोचना के लोकतंत्र का।

बौद्धिक और अकादमिक हलकों में आज जैसी शांति और एक प्रकार की आपसी सहमति नजर आती है, उससे यह भय होता है कि हम किस तरह के समाज की रचना कर रहे हैं? प्रो नामवर सिंह ने यों ही नहीं कहा था, ‘हालत यह है कि आजकल कटु आलोचनाएं बहुत कम सुनाई देती हैं। उपेक्षा से बेहतर तो यह है कि कोई आलोचना करने के लायक तो समझता है। हम लोग इतने सभ्य होते जा रहे हैं, ऐसे बुर्जुआ संस्कार मध्यवर्ग के लोगों से आ रहे हैं, इतने शिष्ट हो गए हैं कि हम कुछ लोगों को उपेक्षा से मार देना चाहते हैं। कोई आलोचना के लिए न तरसता रहे, इसके लिए जरूरी है कि आलोचना की दुनिया में जागरूकता और जिंदगी दिखाई दे। यह महज ‘मुर्दो का टीला’ बन कर न रह जाए। बौद्धिक उग्रता, तीव्रता और निष्ठा के अभाव के कारण भी एक खतरा हिंदी आलोचना में दिखाई दे रहा है।’

आलोचना की मुक्ति, परंपरा के अंतर्गत है। मतलब यह कि परंपरा के अंतर्गत आलोचना कुछ नए प्रश्न पैदा करती है या नहीं। परंपरा में अनुत्तरित प्रश्नों से फिर से जूझती है या नहीं और जिन प्रश्नों को विस्मृत कर दिया गया है, उसको अपने विचार के दायरे में लाती है कि नहीं। एक पाठ की जैसी व्याख्या हमारे पूर्व पुरुषों ने की, उसे बिना किसी तर्क-वितर्क, वाद-विवाद और संवाद के अक्षरश: उसी रूप में ग्रहण कर लेना किसी भी समय के आलोचना का स्वभाव नहीं होना चाहिए। आलोचना की हर पीढ़ी के लिए यह आवश्यक है कि वह स्मृतियों को बराबर ध्यान में रखे, समकालीनता पर गहरी नजर रखे और फिर उसके बाद ‘शास्त्र सुचिंतित पुनि-पुनि देखिय’ की ओर मुड़े। कोई भी वाद-विवाद और संवाद एकल दृष्टिकोण में संभव नहीं है, क्योंकि वाद एकवचन में नहीं, बहुवचन में जीवित रहता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में बहुवचन की परंपरा बहुत पुराने समय से विद्यमान है और अनेक वादों के फलने-फूलने के लिए अन्य वादों की उपस्थिति को अधिकतर प्रोत्साहित किए जाने की सूचना मिलती है। एक बात हमारे दिमाग में बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए कि सिद्धांत, शास्त्र और विमर्श आलोचना नहीं है, जिसको कि अक्सर एक मान लिया जाता है। कहना न होगा कि शास्त्र में आलोचना प्रसंगवश होती है, जबकि आलोचना में सिद्धांत-चर्चा प्रसंगवश की जाती है। ०

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