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तुम चंदन हम पानी

रैदास का पुश्तैनी पेशा जूते बनाने का था। यह पेशा और इससे जुड़ी जाति सामाजिक तौर पर कभी भी सम्मानित नहीं मानी गई। लिहाजा आस्था से समता के संदेश तक की रैदास की यात्रा आसान नहीं थी। पर इतनी बात शायद रैदास ने नहीं सोची, उनके मन और सोच में तो सिर्फ राम और गोविंद समाए थे।

विचार बोध, मध्यकाल के संतजाति-धर्म से ऊपर उठकर मानवीय, करुणा और समता का संदेश देने वाले संत रैदास।

रोहित कुमार
भारतीय संत परंपरा ने उस दौर में समाज और संस्कृति को संवेदना, सौहार्द और आस्था जैसे मानवीय सरोकारों से जोड़ा, जब बाकी दुनिया मध्यकालीन अंधेरे में डूबी थी। इन संतों में रैदास का नाम कई कारणों से विशिष्ट है। कबीर की तरह रैदास भी जातीय और धार्मिक सामाजिक ढांचे पर न सिर्फ सवाल खड़े करते हैं बल्कि वे प्रेम और समन्वय की बात कहकर सामाजिक सद्भाव के लिए बड़ी पहल भी करते हैं। रैदास को श्रद्धा के साथ लोग संत रविदास के रूप में भी याद करते हैं।

उनका जन्म चर्मकार परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि जिस दिन उनका जन्म हुआ था उस दिन रविवार था। इसी कारण उनका नाम रविदास रखा गया। उनका जन्मस्थान काशी है। पर उनकी ख्याति और स्वीकृति ने स्थान और भाषा की दूरी को अपने समय में ही मिटा दी थी। भारत के किसी भी संत को शायद ही इतने अलग-अलग नामों से पुकारा गया होगा, जितना कि रैदास को। पंजाब के लोगों ने अपने उच्चारण की सहजता में उन्हें रविदास कहा। ‘आदि ग्रंथ’ या ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में जहां कहीं भी उनके पद संकलित हैं, वहां उनका नाम रविदास ही लिखा गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम से ज्यादा जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग उन्हें रोहिदास के नाम से पुकारते हैं। इसी तरह बंगाल के लोग उन्हें रुइदास के रूप में याद करते हैं।

श्रम, आस्था और समता की सैद्धांतिक त्रयी के साथ भारत की संत परंपरा को देखें तो पहली बात तो यही दिखेगी कि श्रम के साथ संतों की भक्ति परवान चढ़ी है। कबीर आजीवन जुलाहा रहे, संत सैन ने नाई का पेशा नहीं छोड़ा, नामदेव ने रंगरेजी जारी रखी तो दादू दयाल रुई धुनाई के अपने काम में लगे रहे। इसी तरह गुरु नानक ने अपने जीवन के आखिरी के दिनों में खेती की। वैसे श्रम की यह साध जारी रखते हुए आस्था और भक्ति में गहरे उतरना रैदास के लिए आसान नहीं था।

रैदास का पुश्तैनी पेशा जूते बनाने का था। यह पेशा और इससे जुड़ी जाति सामाजिक तौर पर कभी भी सम्मानित नहीं मानी गई। लिहाजा आस्था से समता के संदेश तक की रैदास की यात्रा आसान नहीं थी। पर इतनी बात शायद रैदास ने नहीं सोची, उनके मन और सोच में तो सिर्फ राम और गोविंद समाए थे, इन्हीं की लगन थी। इससे आगे सब व्यर्थ और गैरजरूरी। आलम यह रहा कि कबीर जैसे संत ने भी कहा- ‘साधुन में रविदास संत।’

इसे भी भारत में भक्ति परंपरा और साहित्य की विशेषता ही मानेंगे कि इसमें महावीर और बुद्ध जैसे संत रैदास के मुकाबले पीछे छूट गए। यही नहीं, जिस काशी में ब्राह्मणों ने ज्ञान और शास्त्र के आधार पर अपना वर्चस्व विकसित कर लिया था, उनके बीच रैदास अपनी धुन के साथ खड़े होने का साहस दिखाते हैं। कमाल यह कि इस साहस में सहजता इतनी है कि आगे स्वीकृति के लिए उन्हें संघर्ष नहीं करना पड़ता। कोरा पांडित्य का किला ध्वस्त हो जाता है और एक साधारण संत की प्रेमल वाणी को, उसके समन्वयी तकाजे को सब आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं।

रैदास के बारे में मीरा आगे बढ़कर कहती हैं कि मैं तो भटकती फिर रही थी, बहुतों में तलाशा, बहुतों को आजमाया, लेकिन रैदास को देखा तो झुक गई। एक साधारण चर्मकार के आगे राजरानी का झुकना असाधारण बात है। दरअसल, ऐसे उदाहरणों के साथ भक्ति और सामाजिक समता का आदर्श कैसे पूरा होता है, इसे समझना भारतीय संस्कृति की आत्मा के साथ साक्षात्कार करने जैसा है।

दिलचस्प यह भी कि रैदास खुद तो बड़े संत हैं ही, उनका नाम अन्य संतों से भी जुड़ा है। वे कबीर के गुरुभाई हैं। स्वामी रामानंद एक तरह से गंगोत्री हैं जिनसे कबीर और रैदास जैसी कई धाराएं फूटी हैं। एक तरफ रैदास के गुरु हैं रामानंद जैसे अद्भुत व्यक्ति, तो दूसरी तरफरैदास की शिष्या हैं मीरा जैसी अद्भुत नारी। इन दोनों के बीच में भक्ति और समता की चमक अनूठी है। ओशो ने एक जगह कहा है कि रैदास का अगर एक भी वचन न बचता और सिर्फ मीरा का यह कथन बचता ‘गुरु मिल्या रैदास जी’, तो काफी था। जिसको मीरा जैसी भक्तिन गुरु कहे, वह जरूर खास होगा।

रैदास के मन में अपनी जाति या पेशे को लेकर कभी कोई आत्महीनता नहीं रही। उनके काव्य को देखकर इसका अंदाजा सहज ही हो जाता है कि अपनी जाति का वर्णन वह अपनी भावप्रवणता में अपने आराध्य के प्रति भक्ति से विभोर होकर ही करते हैं, न कि किसी आत्महीनता या सामाजिक द्रोहभाव के साथ। ‘प्रभुजी, तुम चंदन हम पानी’ जैसे उनके भजनों में डूबकर ऐसा लगता है, मानो उन्हें इस तरह की उपमा ढूंढ़नी नहीं पड़ती, वे इन उपमाओं में खुद को उसी रूप में देख रहे होते हैं और उनकी वाणी में वह स्वत: व्यक्त हो जाती है।

रैदास एक ऐसे युग में हिंदू-मुसलमानों को एक साथ एक ही तत्व को ईश्वर मानने की सीख देते हैं, जब उनके बीच घनघोर वैमनस्यता थी और अपने धर्म के बारे में अपेक्षाकृत ज्यादा सतर्क मुसलमान शासक देश पर शासन कर रहे थे। रैदास की वाणी समाज और भक्ति के बीच एक ऐसे संबंध का आह्वान है, जिसमें प्रेम और उसकी प्रेरणा दोनों अखिल रूप से एक है-
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

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