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विचार बोध: संभावना और संन्यास

नियति का अर्थ है, होगा ही। संभावना का अर्थ है, चाहो तो होगा; नहीं चाहो तो नहीं होगा। बीज का वृक्ष होना नियति नहीं है, संभावना है। बीज बिना वृक्ष हुए भी रह जा सकता है। सभी बीज वृक्ष नहीं होते, बहुत से बीज तो बीज ही रहकर मर जाते हैं।

Spiritual Thoughtsसंन्यास जीवन की नियति है और वह होकर रहेगा।

रोहित कुमार
अध्यात्म की चर्चा, उसका पूरा विमर्श एक परिक्रमा की तरह है। बात शुरू होती है जीवन क्या, जीवन क्यों और जीवन की अंतिम नियति क्या सरीखे सवालों से और यह चर्चा समाप्त भी इन्हीं प्रश्नों पर आकर होती है। इस चर्चा में जो बात खासतौर पर समझने की है, वह यह कि इस दौरान हम किन शब्दों या सूत्रों का इस्तेमाल करते हैं। दार्शनिक और आध्यात्मिक विमर्श में यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम शब्द और अर्थ को लेकर खासतौर पर संयत रहें, नहीं तो हम गलत दिशा में आगे बढ़ जाएंगे।

यह मुश्किल तब खासतौर पर और बढ़ जाती है जब हम किसी आंतरिक व्यग्रता की वजह से या महज जिज्ञासावश इन गूढ़ प्रश्नों को समझना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि ज्ञान की दशा प्राप्त करने के बाद एक तो ऐसे सवालों का कोई अर्थ रह ही नहीं जाता और अगर ये सवाल सामने आते भी हैं तो उनके समाधान तक पहुंचना कठिन नहीं होता है। ओशो ने इस तरह के चिंतन और सवालों पर लंबे प्रवचन दिए हैं। वे कहते हैं कि जब हम कहते हैं कि जीवन की नियति क्या है, तो हम सवाल ही गलत पूछ रहे होते हैं।

जाहिर है कि जब सवाल ही सही नहीं है, गलत आशय और अर्थ के साथ है तो फिर उसका जवाब भी वैसा ही होगा। वे कहते हैं कि ‘नियति’ शब्द जिस तरह की चिंतन की शैली का हिस्सा है, वह खासा खतरनाक हैं। उनके ही शब्दों में, ‘नियति की भाषा का उपयोग आदमी सिर्फ जीवन को स्थगित करने के लिए करता रहा है। जैसे ही तुमने कहा, नियति है तो फिर तुम्हें कुछ भी नहीं करना। होगा, अपने से होगा, जब होना है तब होगा।’

सवाल है कि हम जीवन की नियति की बात न करें तो फिर इस बारे में बात कैसे करें, हमारे शब्द क्या हों और हमारे प्रश्न का स्वरूप कैसा हो। संस्कृत से हिंदी में आया एक सुंदर शब्द है- संभावना। आमतौर पर दार्शनिक विमर्श में इस शब्द का इस्तेमाल विद्वानों के बीच भी गूढ़ प्रस्तावों के साथ नहीं होता है। यह न सिर्फ एक चूक है बल्कि जीवन और दर्शन के साझे विमर्श को दुरूह बनाए रखने की एक पांडित्यपूर्ण चालाकी भी।

इस चालाकी से बाहर निकलने के लिए जरूरी है कि हम इस विमर्श में इस शब्द के साथ दाखिला लें। ओशो दार्शनिक से ज्यादा बड़े तार्किकहैं। लिहाजा वे शब्दों के प्रयोग में पूरी सावधानी रखते हैं। वे न सिर्फ ‘संभावना’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं बल्कि इसके लिए साथ में एक और शब्द का प्रयोग करते हैं। यह शब्द है- संन्यास। भक्ति से लेकर अध्यात्म तक इस शब्द की बड़ी व्याप्ति है। ओशो जीवन के बारे में बात करते हुए कहते हैं, ‘संभावना है संन्यास, नियति नहीं।

नियति का अर्थ है, होगा ही। संभावना का अर्थ है, चाहो तो होगा; नहीं चाहो तो नहीं होगा। बीज का वृक्ष होना नियति नहीं है, संभावना है। बीज बिना वृक्ष हुए भी रह जा सकता है। सभी बीज वृक्ष नहीं होते, बहुत से बीज तो बीज ही रहकर मर जाते हैं। फिर सभी वृक्षों में फूल नहीं आते, बहुत से वृक्ष कुछ समय रहकर मर जाते हैं। नियति का अर्थ होता है, अनिवार्य। होगा ही। टलेगी नहीं बात। चाहे कुछ हो लेकिन यह घटना होकर रहेगी। जैसे मृत्यु नियति है। तुम कुछ करो, न करो, मृत्यु घटेगी। जन्म के साथ ही घट गई। देर-अबेर होने होने वाली है। इस जीवन में मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ भी नियति नहीं है।’

साफ है कि ओशो नियति में अनिवार्यता की ध्वनि को पहचान जाते हैं। इस समझ और पहचान के बाद यह कहना आसान हो जाता है कि अनिवार्यता की अगर हम बात करते हैं तो कहीं न कहीं जीवन में यांत्रिकता की बात करते हैं। जीवन की पूरी रचना गैरयांत्रिक है। यांत्रिक समझ के साथ जीवन को लेकर किसी तरह की समझ को न हम आगे बढ़ा सकते हैं और न ही जीवन से जुड़े रहस्यों या प्रश्नों के समाधानकारी गंतव्य तक पहुंच सकते हैं। इस संदर्भ में ओशो की आगे की व्याख्या न सिर्फ महत्त्वपूर्ण है बल्कि विमर्श के सौंदर्य के लिहाज से दिलचस्प भी है।

वे कहते हैं कि अनिवार्यता न सिर्फ यांत्रिकता है बल्कि यह स्वतंत्रता भी नहीं है। जीवन में न तो यांत्रिकता की गुंजाइश है और न ही उस निषेध का कोई अर्थ जो जीवन और स्वतंत्रता की स्वाभावकिता का खंडन करे। यहां ओशो एक और बात समझाते हैं कि अगर ज्ञान से दूरी या बैर न हो तो शब्दों के कारण भी परेशानी नहीं होगी। वे कहते हैं कि ‘नियति’ शब्द का प्रयोग भी प्रयोजनमूलक ही है और यह अचानक से चलन में नहीं आया है। पर ज्ञान के अभाव में इस शब्द ने खूब अनर्थ किया। वे तल्ख और सवालिया लहजे में कहते हैं, ‘अब यह भी समझ लेना कि आदमी कितना बेईमान है।

जीवन के परम सिद्धांतों का भी बड़ा दुरुपयोग कर लेता है। आदमी ऐसा है कि उसके हाथ में जो पड़ जाता है उसका गलत उपयोग करता है। देने वाले जो भी देते हैं, इसलिए देते हैं कि ठीक उपयोग हो सके। जिन्होंने नियति की भाषा बोली, परम ज्ञानी थे। उनका क्या प्रयोजन था?’

दरअसल, ज्ञानियों ने प्रयोजन की बात इसलिए कही थी कि हम यह तो समझें कि संन्यास जीवन की नियति है और वह होकर रहेगा, होने ही वाला है। पर इसका कतई यह अर्थ नहीं था कि हम नियति को मानकर जीवन में अनर्थ की तरफ बढ़ जाएं। इसलिए आगे ‘नियति’ शब्द से बचने की जरूरत पड़ी और कहा गया कि जीवन में संन्यास एक संभावना तो है पर इसे प्राप्त करने के लिए कर्मशील भी होना होगा।

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