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नन्ही दुनिया कॉलम में राकेश ‘चक्र’ की कहानी : हनी, मनी और सनी

इतना कह कर दोनों बहन और भाई हंसते-कूदते हनी के पास पहुंच गए। उनके पीछे-पीछे जोसफ और उनकी पत्नी भी। हनी उस समय आराम कर रही थी और उसके चारों बच्चे भी एक ओर अलसाए से आराम फरमा रहे थे।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:43 AM

मौसम बड़ा सुहाना और आसमान साफ था। वृक्षों की छाया पूरब की ओर और सूर्य पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। मई महीने की तेज गर्मी का प्रभाव मसूरी की वादियों में महसूस नहीं हो रहा था। यहां बस्ती और आसपास के जंगलों में बंदर और लंगूर बहुत थे। शाम के चार बजे थे। लंडौर के पास वाले राजकीय हाईस्कूल की छुट्टी हो गई थी। कुछ बच्चे लैंग्वेज स्कूल के पास बनी कोठियों के सर्वेंट क्वाटरों में रहते थे। सभी बच्चे खेलते-कूदते-बतियाते मस्ती में पैदल घरों की ओर लौट रहे थे। घुमावदार ऊंची-नीची पहाड़ की सड़क। पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा फ्रांसिस घर पहुंचने की जल्दी में यकायक तेज भागने लगा। वह अन्य साथियों से आगे निकल गया। उसने देखा की झाड़ियों में एक बंदर का बच्चा चीऊं-चीऊं कर मदद की गुहार लगा रहा है। उसके आसपास कोई बंदर नहीं है। वह तुरंत झाड़ियों में घुस कर बंदर के नन्हे बच्चे को निकाल लाया। तब तक उसके बाकी साथी भी पहुंच गए थे।

बंदर के बच्चे को देखने से ऐसा लग रहा था कि बंदरों का समूह उसे भूलवश छोड़ गया है। शायद एकाध दिन पहले ही वह पैदा हुआ था। उसके कोमल, मखमल से बाल, प्यारे से कान और प्यारी-सी चमकती लप-लप करती आंखें बच्चों को बहुत अच्छी लग रही थीं। बंदर के बच्चे का अपनी मां से बिछुड़ना और फ्रांसिस के हाथ लगना, कैसा अद्भुत संयोग और चमत्कार था! यह बच्चा, फ्रांसिस को न मिलता, तो शायद मर जाता।

कभी वह बच्चा फ्रांसिस के हाथों से रमेश के पास जाता, तो कभी मोहन के पास, तो कभी अब्दुला और जीत सिंह के पास। वह सभी बच्चों का खिलौना बन गया था। जहां बच्चे गप-शप कर रहे थे, उसी के पास एक विशाल और मनोरम बंगला था, जिसे बिट्रिश शासन काल में वुडशन नामक अंग्रेज ने बनवाया था और बाद में नानकचंद नामक सेठ ने उसे खरीद लिया था। नानकचंद मुंबई में व्यापार करते थे, जो मई-जून के महीने में यहां रहने के लिए आते थे। इस बंगले की देखभाल के लिए जोसफ नामक एक व्यक्ति अपने दो बच्चों और पत्नी के साथ सर्वेंट क्वाटर में रहता था। जोसफ मृदुभाषी और पशु प्रेमी था। उसके यहां पहले से ही दो कुतिया पल रही थीं। जिसमें एक का नाम मनी और दूसरी का हनी था। मनी की बेटी ही हनी है, जिसने कुछ दिन पहले चार खूबसूरत पिल्लों को जन्म दिया है।

बारह वर्ष पहले जब जोसफ सड़क पर टहल रहे थे, तब मनी शिशु अवस्था में उनके साथ-साथ घर आ गई थी। जोसफ ने तभी से मनी को अपने बच्चे की तरह पाला है। यानी मनी का बचपन, जवानी और बुढ़ापा जोसफ ने नजदीक से देखा है। मनी अपने मालिक के प्रति पूरी तरह वफादार थी। उसके रहते मजाल है कि कोई परिंदा भी पर मार सके। मनी को बच्चों से और बच्चों को मनी से बेहद प्रेम है।

जोसफ को बहुत कम वेतन मिलता, फिर भी किसी तरह घर का पालन-पोषण हो जाता। परिवार में हारी-बीमारी नहीं थी, इसलिए आर्थिक अभाव का अहसास न होता। जोसफ, उनके दोनों बच्चे और पत्नी हंसी-खुशी जीवन गुजार रहे थे। उनके दोनों बच्चे राजकीय विद्यालय में पढ़ रहे थे। आज जोसफ के घर में चाय पत्ती और चीनी समाप्त हो गई थी। वे घर से परचून की दुकान की ओर जा रहे थे कि उन्होंने देखा कि एक बंदर के बच्चे से पांच-छह बच्चे खिलौना समझ कर खेल रहे हैं। उसे कभी कोई अपने हाथ में लेकर गले लगा कर चूमता, तो कभी कोई हल्के से हवा में ‘उछालता’, बेचारा बच्चा असहज-सा चीऊं-चीऊं कर रहा था। बच्चों को तो बस मस्ती चाहिए। जोसफ को लगा कि अगर उन्होंने इस बच्चे को बच्चों से नहीं बचाया तो इसका जीवन खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि वह इतना छोटा था कि शायद उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। क्यों न मैं इसे अपने घर ले जाऊं। यही सोच कर बच्चों को दो रुपए का लालच दिया कि बच्चो तुम दो रुपया ले लो और बंदर के बच्चे को मुझे दे दो। उस समय दो रुपए के बारह केले आ जाते थे।

फ्रांसिस ने दो रुपए का प्रस्ताव सुना तो वह उत्सुकता और हड़बड़ाहट में बोला, ‘हां! अंकलजी मैं इस बंदर के बच्चे को आपको दे दूंगा। मैं ही तो इसे झाड़ियों में से निकालकर लाया हूं। मैं और मेरे साथी दो रुपए के केले खा लेंगे। कितना मजा आएगा…।’ जोसफ ने कहा, ‘शाबाश! फ्रांसिस तुम तो सचमुच बहुत अच्छे हो, तुमने यह बहुत अच्छा काम किया है, जो इस बच्चे का झाड़ियों से निकाल कर लाए और इसका जीवन बचा लिया। लो मैं तुम्हें इनाम में दो रुपए दे रहा हूं।’

फ्रांसिस दो रुपया पाकर बहुत खुश हुआ और उसके साथी भी। फ्रांसिस ने उस बंदर के बच्चे को जोसफ को सौंप दिया। जोसफ घर से तीन रुपए ही लेकर चले थे। सोचा था कि पचास पैसे की चाय पत्ती और ढाई रुपए की चीनी ले लेंगे, लेकिन उन्होंने बंदर के बच्चे का जीवन उस समय कीमती समझा, इसलिए उन्होंने चाय की पत्ती और चीनी कम ही खरीदना बेहतर समझा। वे बंदर के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए परचून की दुकान पर आए और सभी बच्चे भी चीज खाने के लालच में दुकान की ओर कूदते-भागते पहुंच गए थे।

जोसफ चीनी और चाय की पत्ती लेकर घर लौटे तो उनकी पत्नी और बच्चे बंदर का बच्चा देख कर बहुत खुश हुए। उन्होंने बच्चों और पत्नी को पूरा घटनाक्रम बताया। उनकी बेटी आयशा ने कहा, ‘पापा! आप इसे बच्चों से न लाते, तो बेचारा भूख से मर जाता। यह सचमुच बड़ा प्यारा मखमल की तरह चिकना लग रहा है।’ उसने उसे पापा की गोदी से ले लिया और दुलारने और सहलाने लगी, ‘लगता है पापा, यह बहुत भूखा है, इसे दूध कैसे पिलाएंगे?’’ यकायक जोसफ के बेटे एडविन ने कहा, ‘पापा इसे क्यों न हम हनी का दूध पिला दें, उसके भी तो चार बच्चे दूध पीते हैं…।’

इतना कह कर दोनों बहन और भाई हंसते-कूदते हनी के पास पहुंच गए। उनके पीछे-पीछे जोसफ और उनकी पत्नी भी। हनी उस समय आराम कर रही थी और उसके चारों बच्चे भी एक ओर अलसाए से आराम फरमा रहे थे। आयशा ने बंदर के बच्चे का मुंह हनी के थन से लगा दिया। वह बड़े आराम से दूध पीने लगा। हनी ने तनिक भी विरोध नहीं किया, बल्कि, वह जीभ से चाट-चाट कर उसे दुलार करने लगी। यह सब देख कर पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। आयशा ने अपने भाई से कहा, ‘एडविन हम इस बंदर के बच्चे का नाम रख लेते हैं सनी, बोल कैसा रहेगा?’

‘बहुत अच्छा।’
कुछ ही देर में सनी दूध पीकर तृप्त हो गया था। वह धीरे-धीरे चल कर हनी के बच्चों के पास पहुंच गया और उनसे दोस्ती कर ली। हनी के चारों बच्चे भी नया दोस्त पाकर बहुत खुश थे।

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