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शख्सियत: बलराज साहनी, अभिनय से बनी पहचान

बलराज साहनी अभिनय के शौकीन थे। उन्होंने अभिनय की शुरुआत इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से की। उन्होंने 1946 में आई फिल्म ‘इंसाफ’ से अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की।

Author Published on: May 13, 2018 4:07 AM
अपने करियर के शुरुआती दिनों में बलराज ने साहित्य लेखन से जीवन यापन किया।

जन्म : 1 मई, 1913
निधन : 13 अप्रैल, 1973

वे एक ऐसे अभिनेता थे, जिनके अभिनय के लोग आज भी कायल हैं। वे केवल अभिनेता नहीं, समाज सेवक और लेखक भी थे। पंजाब के रावलपिंडी में जन्मे बलराज साहनी मानवाधिकारों के हितैषी थे। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने समय में मानवाधिकारों के हनन पर आवाज उठाई। उनके पिता हरवंशलाल साहनी एक व्यापारी थे।

शिक्षा
पंजाब विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नाकोत्तर करने के बाद बलराज ने अपने पिता के काम में सहयोग करना शुरू कर दिया। उन्होंने हिंदी में भी स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। 1930 में बलराज अपनी पत्नी दमयंती के साथ रावलपिंडी छोड़ कर रवींद्रनाथ ठाकुर के विश्व भारती विश्वविद्यालय चले गए। वहां वे शिक्षक बन गए। शांतिनिकेतन में ही बलराज साहनी की पत्नी को एक बेटा हुआ। यही वह समय था जब साहनी को गांधी का सान्निध्य मिला और वे बीबीसी लंदन के रेडियो उद्घोषक के रूप में इंग्लैंड चले गए। वहां से 1943 में भारत लौटे।

साहित्य लेखन से किया जीवन यापन
अपने करियर के शुरुआती दिनों में बलराज ने साहित्य लेखन से जीवन यापन किया। वे कोलकाता से निकलने वाले अखबारों में नियमित लिखने लगे। उनकी अनेक कृतियां प्रकाशित हुर्इं। बलराज साहनी का एक कविता संग्रह ‘कुंगपोश’ प्रकाशित हुआ। उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत हिंदी और अंग्रेजी में की, लेकिन रवींद्रनाथ ठाकुर से प्रेरणा पाकर उन्होंने पंजाबी में भी लिखना शुरू किया।

अभिनय से बनी पहचान
बलराज साहनी अभिनय के शौकीन थे। उन्होंने अभिनय की शुरुआत इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से की। उन्होंने 1946 में आई फिल्म ‘इंसाफ’ से अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने ‘धरती के लाल’, ‘दूर चलें’ जैसी फिल्में कीं। लेकिन ‘दो बीघा जमीन’ में साहनी को बतौर अभिनेता पहचान मिली। इस फिल्म को कान्स फिल्म फेस्टिवल में अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1961 में रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी पर बनी फिल्म ‘काबुलीवाला’ में साहनी ने अभिनय किया। इसमें उनके अभिनय की खूब सराहना हुई। उनकी पत्नी दमयंती ने बलराज साहनी के साथ 1947 में आई फिल्म ‘गुड़िया’ में काम किया। इस फिल्म के बाद दमयंती का देहांत हो गया। और दो साल बाद बलराज साहनी ने संतोष चंधोक के साथ दूसरा विवाह कर लिया।

साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्में
बलराज साहनी को साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्में करना पसंद था। यही कारण था कि प्रेमचंद की कहानी पर बनी फिल्म ‘हीरा-मोती’ (दो बैलों की कहानी), रवींद्रनाथ की कहानी ‘काबुलीवाला’ और पंजाब के उपन्यासकार नानक सिंह की कृति ‘पवित्र पापी’ पर बनी फिल्मों में उन्होंने बेहतरीन काम किया। बलराज साहनी ने खुद भी कई फिल्मों की पटकथा लिखी। उन्होंने कविताएं भी लिखीं। उससे उनका साहित्य प्रेम झलकता है।

गर्म हवा अंतिम पड़ाव
साहनी की अंतिम फिल्म ‘गर्म हवा’ को समीक्षकों और दर्शकों ने खूब सराहा। लेकिन दुर्भाग्य से वे अपनी अंतिम फिल्म को देख नहीं पाए। इस फिल्म के डबिंग का काम जिस दिन उन्होंने खत्म किया उसी दिन शाम को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। गर्म हवा में उनका अंतिम संवाद था- ‘इंसाफ कब तक अकेला जी सकता है।’

सम्मान
बलराज साहनी को 1969 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। 1971 में पंजाब सरकार ने साहित्य और कला के लिए उन्हें ‘शिरोमणि पुरस्कार’ प्रदान किया। जीवंत और मार्मिक अभिनय तथा कला और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के कारण बलराज साहनी को हमेशा याद किया जाएगा।

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