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कविताएं: गड़रिए और भेड़ें बीहड़ में, कब गोली सीने में? और एक दिन मिल गए वे

चुका नहीं है जीवन, चुका नहीं हूं मैं भी अभी, फिर भी भिनभिना रही हैं मक्खियां

Author Published on: May 13, 2018 3:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजकुमार कुंभज

गड़रिए और भेड़ें बीहड़ में

गड़रिए और भेड़ें बीहड़ में
क्यों गहरी हरी-सुनहरी घास के लिए
चलते चले जाते हैं धीरे धीरे नंगे पांव
हौले-हौले हो रहे सूर्यास्त तक?

मैं पूछना चाहता हूं आग से
कि वह जीवन के अंधेरों में छुपी है कहां?
मैं पूछना चाहता हूं आसमान से
कि वह जीवन के तनाव में तना है तो क्यों?
मैं पूछना चाहता हूं समुद्र से
कि वह जीवन के विस्मय में लापता कब तक?
क्यों नहीं जरूरी, क्यों नहीं
बस्ती की तरफ खुला जलाशय?
क्यों नहीं जरूरी, क्यों नहीं
बस्ती की तरफ खुले, खुले जल का आशय?
क्यों नहीं जरूरी, क्यों नहीं
बस्ती की तरफ खुले आशय का खुला जल?
कि आखिर कब तक, कब तक
सिर्फ ओस चाट कर खुश होते रहेंगे हिरण?
कि आखिर कब तक, कब तक
सिर्फ जूठन चाट कर खुश होते रहेंगे भूखे?
कि आखिर कब तक, कब तक
सिर्फ मृत्यु चाट कर खुश होते रहेंगे गरीब?

कोई भी असामयिकता
कोई भी आकस्मिकता
कोई भी अस्वाभाविकता
आती है, तो आती है अचानक ही।
अचानक ही जैसे कि आसमान से बिजली
और अचानक ही आ गिर रही बिजली से वह
वह सब, जो हर किसी सोच से बाहर
बाहर बारिश हौले-हौले और भीतर अग्निकांड।
लापता जीवन पूछ रहा है पता फिर-फिर
क्यों गहरी हरी-सुनहरी घास के लिए
गड़रिए और भेडेंÞ बीहड़ में?

एक दिन मिल गए वे

एक दिन मिल गए वे
जो हार रहे थे अपनी लड़ाइयां निरंतर
और बिता रहे थे दुखभरा जीवन एकांत में
एकांत में किंतु वे अकेले
या उनके अकेले का ही जीवन नहीं था
वहां कुछ-कुछ फूल भी खिल ही रहे थे भांति-भांति
और भांति-भांति के संघर्षों के प्रति समर्पित
समर्पित तो वे अबोध लड़कियां भी थीं
जो अनायास ही हो चुकी थीं गर्भवती
गर्भवती होना पाप-पुण्य का मामला नहीं है
यह एक प्रेम-प्रक्रिया और दैहिक-क्रिया है
जिसकी आजादी होनी चाहिए सभी को
जब वह सिद्धांतत: मवेशियों में है
तो मनुष्यों में क्यों नहीं?

अकेला जीवन या कि अकेले का जीवन
सामाजिकता के खिलाफ एक साजिश है
जैसे कि मेरे होने में उसके न होने
या उसके होने में मेरे न होने की कल्पना
एक कुटिल रंजिश है
कुटिल रंजिश में हार रहा था मैं
और हार रहे थे वे भी,
जो दूसरों की लड़ाइयों में खुद को
भूलते हुए लड़ाइयां खुद अपनी निरंतर
जो हार रहे थे अपनी लड़ाइयां निरंतर
एक दिन मिल गए वे।

कब गोली सीने में?

चुका नहीं है जीवन
चुका नहीं हूं मैं भी अभी
फिर भी भिनभिना रही हैं मक्खियां
जबकि मेरी काबिलियत युद्ध-विरोधी
वे बना रहे हैं हथियार
जबकि मैं, मेरा व्यापार सिर्फ प्यार
दिल धड़कता है चुपचाप-चुपचाप
कब गोली सीने में?

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