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कविताएं: चटकें चट्टानें, खुद की टक्कर से और क्या कुछ सोचते हुए?

झूला मत झुलाओ, भाषा की हदबंद में रहते हुए भी, हमउम्र बच्चे बड़े हो गए हैं, अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं, और अब मांगते हैं भाषा

Author Published on: June 23, 2019 1:15 AM
चित्र: श्रीगोपाल व्यास

राजकुमार कुम्भज

चटकें चट्टानें

झूला मत झुलाओ
भाषा की हदबंद में रहते हुए भी
हमउम्र बच्चे बड़े हो गए हैं
अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं
और अब मांगते हैं भाषा
और अब मांगते हैं भाषा का ताप
और अब मांगते हैं ताप का आकार
और अब मांगते हैं आकार का लक्ष्य
और अब मांगते हैं लक्ष्य की कार्रवाई
और अब मांगते हैं कार्रवाई
कार्रवाई वह जो सीधी
जिसकी चाल में न हों मोड़
न हों घुमाव, न हों गलबहियां
चट्टानों से टकराए जल, तो चटकें चट्टानें
झूला मत झुलाओ

कितने जन्म, कितनी मृत्यु?

मैं भूलता हूं एक नदी
कि वह जो चली आ रही थी जन्मों से
और इसलिए कि मुझे मिलती हैं
नदियां नई-नई, कई-कई
और इसलिए कि नींद से बाहर निकल कर
शायद नींद से बाहर निकल कर ही
होता है पत्थरों तक का पुनर्जन्म
कहने को तो थी उस तरफ भी जिंदगी
लेकिन वह उतनी, वही, वैसी ही नहीं
जितनी कि यह और जो कि पाई अभी-अभी
फिर पता नहीं, कितने जन्म, कितनी मृत्यु?

खुद की टक्कर से

नहीं है कोई
युग बीते मगर अकेला ही हूं मैं
भीड़ है, धधकती आग है, सूना है
और युद्धरत सपना फिर भी
और कायम ताप में तपना फिर भी
जाता हूं खेतों की तरफ जाता हूं
चट्टानों से टकराता हूं
जल-गीत गाता हूं
खेलता हूं द्वार-पार-झंकार सब
छोड़ता हूं, दूर छोड़ता हूं
हाहाकार सनी टूटी तलवार
भूलते हुए खुद को, हंसी खुद की
मिलेगी वह मुझको है तलाश जिसकी
और कि अंतत: पैदा होती है जो चमक
खुद की टक्कर से, सबके लिए।

क्या कुछ सोचते हुए?

क्या कुछ सोचते हुए
कितना कुछ दूर निकल जाता हूं मैं
कल तक जिस घर के आंगन में
तुलसी का एक पौधा लगा था
जो बच्चों जैसा ही सगा था
आज खिड़की से झांकता हूं जब वहीं
तो पाता हूं कुछ और कुछ और
कि वह नहीं, मैं नहीं, घर नहीं, आंगन नहीं
टेलीविजन पर चल रही कोई फिल्म है एक
जिसमें कपड़े बदल रही है तुलसी
और हंस रही हैं टेलीफोन में फंसी आवाजें
क्या कुछ सोचते हुए?

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