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रविवारी शख्सियत: उषा मेहता

14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ‘खुफिया कांग्रेस रेडियो’ की स्थापना की। इस खुफिया रेडियो सेवा का पहला प्रसारण 27 अगस्त 1942 को हुआ। इस रेडियो से पहला प्रसारण भी उनकी आवाज में ही हुआ था।

Author Published on: March 22, 2020 1:15 AM
रविवारी शख्सियत: उषा मेहता।

उषा मेहता एक गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उषा मेहता को ‘कांग्रेस रेडियो’ के आरंभ और संचालन के लिए याद किया जाता है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने खुफिया तरीके से ‘कांग्रेस रेडियो’ शुरू किया था और खासी ख्याति बटोरी थी।

आजादी का पाठ
उषा मेहता का जन्म सूरत के सरस गांव में हुआ था। महज पांच वर्ष की उम्र में ही उनका परिचय महात्मा गांधी से हुआ। एक बार जब बापू ने सरस गांव के समीप शिविर का आयोजन किया तब उन्होंने इसमें भाग लिया। खिलौने से खेलने की उम्र में उषा आजादी का पाठ पढ़ने लगी थीं। मात्र आठ साल की उम्र में उन्होंने ‘साइमन गो बैक’ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की। हालांकि ब्रिटिश शासन के दौरान जज रहे उनके पिता ने स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा बनने से उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वे नहीं मानीं। 1930 में पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद यह बाधा भी दूर हो गई। पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद उनका पूरा परिवार बंबई आ गया, तब वह बारह साल की थीं। इसके बाद ही उन्होंने खादी पहनने और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का प्रण किया।

शिक्षा
उनकी प्रारंभिक शिक्षा खेड़ा, भरूच और फिर चंदारामजी हाई स्कूल, बंबई में हुई। उन्होंने बंबई के ही विल्सन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की। कानून की पढ़ाई भी शुरू की, लेकिन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ दी। 22 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन में उतर आईं।

खुफिया रेडियो का संचालन
14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ‘खुफिया कांग्रेस रेडियो’ की स्थापना की। इस खुफिया रेडियो सेवा का पहला प्रसारण 27 अगस्त 1942 को हुआ। इस रेडियो से पहला प्रसारण भी उनकी आवाज में ही हुआ था। पहले प्रसारण में उषा मेहता ने धीमी आवाज में रेडियो पर घोषणा की- ये कांग्रेस रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है। आजादी के आंदोलन को आवाज देने के लिए कांग्रेस रेडियो शुरू हो चुका था। कांग्रेस रेडियो के साथ डॉ राममनोहर लोहिया, अच्युतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम जैसे वरिष्ठ नेता भी जुड़ चुके थे। कांग्रेस रेडियो पर महात्मा गांधी और कांग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं के संदेश बजाए जाते थे। ब्रिटिश हुकूमत की नजरों से बचाने के लिए इस खुफिया रेडियो सेवा के स्टेशन करीब-करीब रोज बदले जाते थे।

तमाम कोशिशों के बावजूद खुफिया कांग्रेस रेडियो सेवा को ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सका और तीन माह के प्रसारण के बाद 12 नवंबर, 1942 को ब्रिटिश हुकूमत ने उषा मेहता और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया। खुफिया रेडियो चलाने के कारण उन्हें चार वर्ष की जेल हुई। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में 1946 में उन्हें रिहा किया गया।

मुंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने गांधी के सामाजिक एवं राजनीतिक विचार पर पीएचडी की और मुंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन आरंभ किया। वे मुंबई विश्वविद्यालय के साथ लंबे समय तक जुड़ी रहीं, कभी विद्यार्थी के रूप में तो कभी शोध सहायक के रूप में तो कभी व्याख्याता तो कभी प्रोफेसर के रूप में। बाद में वे नागरिक शास्त्र एवं राजनीति विभाग की प्रमुख भी बनीं। 1980 में मुंबई विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुईं। गांधीवादी विचार और दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने में भी उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इसके लिए उन्होंने अंग्रेजी, गुजराती और अपनी मातृभाषा में कई लेख, निबंध और किताबें लिखीं। उन्हें गांधी स्मारक निधि का अध्यक्ष चुना गया। वे गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष भी रहीं।

सम्मान
उन्हें 2008 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

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