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विभक्ति नहीं भक्ति

कृष्ण की कथा बगैर वृंदावन के पूरी नहीं हो सकती। वृंदावन का परिवेश राधा-कृष्ण की भूमिका में महज सहायक नहीं है बल्कि एक अनिवार्य घटक है। माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने द्वापर युगीन विलुप्त वृंदावन को फिर से आबाद किया।

Author Updated: February 20, 2021 11:40 PM
Devotion, middle age, special pageमध्यकाल के संत चैतन्य महाप्रभु।

रोहित कुमार

मध्यकाल के बारे में हमारी समझ पाश्चात्य इतिहास से बहुत प्रभावित है। यह प्रभाव इतना गहरा है कि इस काल में भारत में जो कुछ हुआ, उससे हम पूरी तरह आंख मूंद लेते हैं। मध्यकाल को लेकर पूरी दुनिया में जो समझ है, वह समझ दकियानूसी और वहशीपने से भरे समाज की समझ है। जबकि इस दौरान भारतीय संस्कृति के सबसे सुंदर सुलेख लिखे गए। भक्तिकाल की देन को भूलकर अगर कोई मध्यकाल के आयातित अंधेरे को अपनाना चाहता है तो न सिर्फ भारत के बारे में उसकी समझ बल्कि समय और इतिहास के बारे में सोचने-समझने की क्षमता पर भी सवाल खड़ा होता है।

भक्ति आंदोलन में ऐसे संतों की सुदीर्घ शृंखला रही है, जो कवि भी थे और सुंदर गाते भी थे। ऐसे ही एक संत हुए चैतन्य महाप्रभु। उन्हें श्रीकृष्ण का प्रेमावतार माना गया है। उनको अपना आराध्य मानने वालों की संख्या आज भी बहुत है और ये लोग सिर्फ भारतीय नहीं हैं, बल्कि दूसरे देशों के भी हैं। 15वीं सदी में फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव (अब मायापुर) में जन्मे चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन की रसधार बहाकर उस युग की पीड़ित व क्षुधित मानवता को प्रेम अगाधता से भर दिया। एक ऐसे समय में जब समाज में अस्पृश्यता और आडंबर जैसी कुरीतियां काफी बढ़ गई थीं और सामाजिक सद्भाव के सारे धागे आपस में उलझ गए थे तब चैतन्य महाप्रभु लोगों के बीच एक देवदूत की तरह आते हैं। हरि संकीर्तन की अनूठी शैली से उन्होंने समाज को जहां एक तरफ सहिष्णु बनाया, वहीं सामाजिकता को सद्भाव के बूते ठोस आधार भी दिया।

कृष्ण की कथा बगैर वृंदावन के पूरी नहीं हो सकती। वृंदावन का परिवेश राधा-कृष्ण की भूमिका में महज सहायक नहीं है बल्कि एक अनिवार्य घटक है। माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने द्वापर युगीन विलुप्त वृंदावन को फिर से आबाद किया। महाप्रभु ने अपने छह प्रमुख अनुयायियों गोपालभट्ट गोस्वामी, रघुनाथभट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी और रघुनाथदास गोस्वामी को वृंदावन भेजकर सप्त देवालयों की नींव रखवाई। ये अनुयायी षड्गोस्वामियों के नाम से विख्यात हैं। इन्होंने वृंदावन में सात वैष्णव मंदिरों की स्थापना की।

महाप्रभु का जन्म नीम के पेड़ के नीचे हुआ था, इसलिए उनका एक नाम निमाई भी है। वैसे गौर वर्ण का होने के कारण वे गौरांग, गौर हरि और गौर सुंदर भी कहलाए। उनके बचपन से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे यह पता चलता है कि उनके अंदर शुरू से अलौकिक तेज था। उनके बारे में ऐसी ही एक बहुश्रुत कथा के अनुसार एक दिन उनके घर एक ब्राह्मण अतिथि आया। जब अतिथि भोजन ग्रहण करने से पहले अपने इष्ट का स्मरण कर रहे थे तो बालक निमाई वहां आया और थाली से एक निवाला उठाकर खा लिया। यह देखकर माता-पिता को काफी क्रोध आया।

उन्होंने निमाई को कुछ देर के लिए घर से बाहर जाने को कहा और अतिथि को दोबारा भोजन परोसा। पर निमाई भी कहां मानने वाला था, उसने फिर से वही किया। जब सब लोग उसकी इस हरकत से परेशान हो गए तो आखिर में उसने माता-पिता के साथ अतिथि को गोपाल रूप का दर्शन कराया। फिर क्या था, सब यह मानने पर विवश हो गए कि निमाई कोई साधारण बालक नहीं है। निमाई 16 वर्ष के हुए तो उनका विवाह लक्ष्मी देवी के साथ हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही सर्पदंश से पत्नी की अकाल मृत्यु हो गई। निमाई का दूसरा विवाह नवद्वीप के राज पंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ।

24 साल की आयु में निमाई ने जब घर छोड़ा तो वह क्षण बंगभूमि के लिए ऐतिहासिक बन गया। कहते हैं कि युवा निमाई पिता का श्राद्ध करने बोधगया गए थे। वहीं उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक वैष्णव संत से हुई। उन्होंने निमाई के कान में कृष्ण भक्ति का मंत्र फूंक दिया और उनका पूरा जीवन ही बदल गया। बाद में उन्होंने वैष्णव संत केशव भारती से संन्यास की दीक्षा ली और चैतन्य महाप्रभु बन गए।

संन्यास लेने के बाद महाप्रभु पहली बार जब जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो भगवान की प्रतिमा देखकर भाव-विभोर होकर नृत्य करते-करते मूर्छित हो गए। आगे चलकर उन्होंने देश के कोने-कोने की पदयात्रा कर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। पुरी के अलावा वे दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतुबंध आदि स्थानों पर भी रहे। वृंदावन से लौटने के बाद जीवन के अंतिम 18 वर्ष तक चैतन्य महाप्रभु पुरी के नीलांचल धाम में ही रहे। इस दौरान उनका श्रीकृष्ण प्रेम पराकाष्ठा पर था। वे श्रीजगन्नाथ मंदिर के गरुड़ स्तंभ के सहारे खड़े-खड़े घंटों प्रभु को निहारा करते और आंखों से अश्रुधारा बहती रहती।

नाचते-गाते, झांझ-मंजीरा बजाते हुए भी प्रभु की भक्तिकी जा सकती है, चैतन्य महाप्रभु के इस अनुभव ने देखते ही देखते सामाजिक आस्था की शक्ल ले ली। ज्ञान और प्रेम के रूप में भक्ति और उससे जुड़े आचरण को देखने की दृष्टि संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में खूब रही है। महाप्रभु के जीवन और संदेश को देखें तो वे इस विभक्ति को मिटाते दिखते हैं। उनके लिए भक्ति न तो आडंबर है और न ही अलौकिकता के प्रति आस्था भर। उनकी भक्ति तो ऐसा प्रेम और सद्भाव है, जो जनमानस को एक साथ भाव विभोर करता है। भय और नफरत के बीच महाप्रभु का जीवन और भक्ति हमें कई जरूरी सीख देते हैं।

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