ताज़ा खबर
 

नन्ही दुनिया: कहानी, कविता और शब्द-भेद

कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

Author December 9, 2018 1:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कहानी: पुल

राधेश्याम ‘भारतीय’

हाड़ी के ऊपर एक गांव था। उसकी ढलान पर एक स्कूल था। गांव के सभी बच्चे वहां पढ़ने जाते थे। उनमें से कई ऐसे थे जो एक साथ स्कूल जाते। वे खेलते-कूदते हुए अपनी मस्ती में कभी झरने के गीत गाते, तो कभी हरी-भरी वादियों के।
मगर उनके सामने एक समस्या थी कि बीच रास्ते में एक बड़ा पत्थर पड़ा था। वह पत्थर एक ऐसे स्थान पर पड़ा था, जिसकी वजह से उन्हें लंबा रास्ता तय करना और एक नाला भी पार करना पड़ता था। उस पत्थर को देखते ही बच्चे नाक-भौं सिकोड़ लेते।
आज भी उनके साथ ऐसा ही हुआ। उन्होंने पत्थर के पास आते ही गीत गाना बंद कर दिया।
‘बच्चो! सुनाओ न गीत… बड़ा अच्छा लग रहा है। आज मेरा दिल बहुत खुश है।’
‘दिल भी है तेरे पास? अरे, हम तो समझे थे, तुम निरा पत्थर हो।’
‘ऐसा मत बोलो मेरे बच्चो। मैं भी क्या करूं… मेरी मजबूरी समझा करो।’
‘क्या मजबूरी है, बताओ तो जरा? दूसरे पत्थर भी तो लुढ़क-लुढ़क कर नीचे चले जाते हंै… तुम क्यों नहीं चले जाते?’
‘नहीं जा सकता भई। मैं बहुत भारी हूं। अच्छा, अब गुस्सा छोड़ो, बच्चों के चेहरे पर गुस्सा अच्छा नहीं लगता। सुना दो न वही गीत।’ पत्थर के स्वर में आग्रह था।
‘कितना मनभावन होता है झरना। सबके मन को मोह लेता है। तुम क्या जानो झरने के गुण। चलो भाई, स्कूल जाने में देर हो रही है।’ इतना कह कर वे सब अपनी राह हो लिए और फिर से झरने का गीत गुनगुनाने लगे।
ओ झरने… ओ झरने…
तू कभी गगन से बात करे,
तू कभी धरा से प्यार करे
ओ झरने… ओ झरने…

‘झरना… झरने का क्या? कुदरत का वरदान मिला है उसे तो। उससे मधुर स्वर निकलता है, तो मैं क्या करूं?’ पत्थर ने अपने मन को तसल्ली देनी चाही।
उसके बाद झरने का त्याग उसके दिमाग में चकरघिन्नी-सा घूमने लगा। पहाड़ियों से गिरने पर कितना दर्द सहना पड़ता होगा… आह! कभी-कभी तो चट्टानों से टकराना पड़ता है। पर झरना आगे ही आगे बढ़ता है… आगे चल कर कितने ही प्राण्यिों की प्यास बुझाता है। क्या मैं भी किसी के काम आ सकता हूं। पत्थर मन ही मन सोच रहा था।
बच्चे हर रोज वहां से गुजरते।
पत्थर पड़ा-पड़ा सोचता रहता, और वही सोच उसके अंदर बेचैनी पैदा कर देती। क्या मैं भी हिल सकता हूं? उसने अपने आप से प्रश्न किया। ‘नहीं, ऐसे कैसे हो सकता है। मैं तो पत्थर हंू। निर्जीव, भारी।’
‘हो क्यों नहीं सकता, करके तो देखो।’ जैसे कोई आकाशवाणी हुई हो।
‘हां, अगर मैं बार-बार जोर लगाऊं, तो मैं भी हिल सकूंगा। ऐसा सोचते हुए उसने हिलने का प्रयास किया।
एक दिन उसने निश्चय कर लिया कि आज तो वह अपने स्थान से आगे बढ़ कर ही रहेगा और उसने फिर से अपना पूरा जोर लगाना शुरू दिया। वह खुद को हिलाने के लिए जोर लगा रहा था कि तभी हवा का एक झोंका आया। तेज हवा चलने लगी। वह अपने स्थान से हिला और फिर हवा के जोर से धीरे-धीरे लुढ़कने लगा।
उसे लुढ़कते देख दूसरे पत्थर घबरा उठे और चिल्लाने लगे- ‘अरे भाई, कहां जा रहे हो हमें छोड़ कर?’
‘बस, अब इस जगह एक पल भी नहीं रहना।’
‘पर क्यों?’
‘एक जगह पड़े रहने से दुनिया के ताने सुनने पड़ते हैं। अब दूसरी जगह ही जाना पड़ेगा। फिर परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है।’
‘ज्यादा उपदेश मत झाड़। टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा…।’
‘हो जाने दो। अब तुम्हारी हतोत्साहित करने वाली बातों का मेरे ऊपर कोई असर नहीं पड़ने वाला।’
‘जब अपना यह रूप खोकर टुकड़े में आओगे तब पता चलेगा।’
‘अरे जब टुकड़े बन जाऊंगा तो सड़क बिछाने में काम आऊंगा। दुनिया चलेगी उस पर।’ यह पत्थर नहीं उसका दृढ़ विश्वास बोल रहा था।
पत्थर के लुढ़कने की गति तेज होने लगी। एक बार तो उसे डर लगा। पर मन को दृढ़ कर भगवान से प्रार्थना करने लगा, ‘हे भगवान! मेरी रक्षा करना। मैंने तेरे भरोसे ही अपना स्थायी ठिकाना छोड़ा है। अब तो तुम्ही मेरे रक्षक हो।
फिर वह सोचने लगा कि काश, ऐसा हो कि सामने वाले नाले के बीच में मैं फिट हो जाऊं तो पुल बन जाऊंगा। उन बच्चों का फायदा हो जाएगा, जिन्हें काफी लंबा रास्ता तय करके स्कूल जाना पड़ता है। बच्चों को जहां आने-जाने में सुविधा होगी, वहीं उन्हें सुबह घर से भी जल्दी नहीं निकलना पड़ेगा। मैं एक पत्थर से पुल बन जाऊंगा। आने-जाने वालों को आपस में मिलाऊंगा।
और हैरानी की बात कि पत्थर लुढ़कता-लुढ़कता उस नाले के बीचों-बीच फिट हो गया।
आने-जाने वालों के लिए एक नया रास्ता बन गया। अब उन्हें चक्कर लगा कर नहीं जाना पड़ता। इस खुशी में लोगों ने लड््डू बांटे। बच्चे उस पत्थर के गीत गाने लगे।

पत्थर तुम हो कितने महान,
औरों के लिए लुटा दी जान।
दुनिया गाएगी गुण तेरे,
मिली जो तुमको इक पहचान।
बच्चों के हैं प्यारे पत्थर,
जग के राजदुलारे पत्थर।
सबके हित की सोचने वाले
दयामयी, परोपकारी पत्थर।
‘बस, बस बच्चो। अब रुलाओगे क्या।’
‘कभी-कभी रोने में भी मजा है पत्थर महाराज।’
‘महाराज! मैं महाराज! और ऐसा कहते-कहते उसकी आंखों से आंसू की एक बूंद बह गई।
बच्चे पत्थर के गीत गाते हुए अपनी राह हो लिए।
अब वे गीत पूरी घाटी में गूंज रहे थे।

कविता: आ जाती हो

जियाउर रहमान जाफरी

बिल्ली बोली म्याऊं म्याऊं
मैं चूहिया के घर पर जाऊं
चूहिया बोली आओ बिल्ली
बना है जो कुछ खाओ बिल्ली

बिल्ली बोली प्यारी बहना
हमें तुम्हें इक बात है कहना
जरा-सा अपना कान तो लाओ
मुझसे बिल्कुल ना घबराओ

चुहिया बोली सबको पता है
राज ये तेरा जबसे खुला है
दोस्त बन कर आ जाती हो
फिर झटके से खा जाती हो।

शब्द-भेद

समाधि / समधी: ईश्वर के ध्यान में मग्न होना। योग-साधना का चरम फल, जिसमें व्यक्ति अनेक शक्तियां प्राप्त करता है, उस अवस्था को समाधि कहते हैं। जबकि शादी के बाद लड़की और लड़के के पिता आपस में समधी कहलाते हैं।

सुखी / सूखी: आनंदित, प्रसन्न, जिसे हर तरह का सुख प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति को सुखी कहते हैं। जबकि सूखी सूखा शब्द का स्त्रीलिंग है। जैसे सूखी लकड़ी, सूखी पत्तियां वगैरह। सूखी यानी जिसका सारा रस सूख गया हो, समाप्त हो गया हो।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App