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अमन का अलख जगाता कवि

लाहौर के पंजाबी शायर उस्ताद दामन ने, आम आदमी के बीच जो जगह बनाई थी, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। दशकों तक यह शायर अपने समकालीन परिवेश में गुनगुनाया जाता रहा।

ये दुनिया मंडी पैसे दी/ हर चीज विकदी इक भा सजना/ एथे रोंदे चेहरे, विकदे नहीं/ हंसने दी आदत पा सजना।’ (यह दुनिया पैसे की मंडी है। यहां हर चीज एक भाव पर बिकती है। यहां रोते चेहरे नहीं बिकते। तुम भी यहां हंसने की आदत डाल लो।)

लाहौर के पंजाबी शायर उस्ताद दामन ने, आम आदमी के बीच जो जगह बनाई थी, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। दशकों तक यह शायर अपने समकालीन परिवेश में गुनगुनाया जाता रहा। लगभग हर नज्म पर पुलिस थाने में पेशी या फिर जेल, यही था इस लोकप्रिय जनकवि का नसीब। अपने समय के बाद इस महान जनकवि को पाकिस्तान टाइम्स के मालिक मिया इफ्तिखार-उद्दीन, साहित्य के साथ-साथ सियासत में भी ले गए थे। हालांकि उसकी शुरुआती जिंदगी का एक मुख्य भाग ब्रिटिश साम्राज्य की जेलों में ही कटा था। मगर बाद में अपने आजाद वतन पाकिस्तान में भी जेलों से अक्सर रिश्ता बना ही रहा।

उस्ताद दामन का जन्म 4 सितंबर, 1911 में लाहौर में हुआ था। वे पेशे से दर्जी थे। मिया इफ्तिखार-उद्दीन से भी इसी पेशे की बदौलत उनकी पहली मुलाकात हुई। मिया ने दामन की जनप्रिय शायरी का जिक्र सुना हुआ था। 1930 में वहां पंडित नेहरू की एक जनसभा थी, जहां लोगों को जमाए रखने के लिए दामन को मंच दे दिया गया। पंडित नेहरू उनकी शायरी के साम्राज्यवाद विरोधी तेवर के इतने मुरीद हुए कि उन्होंने उसे ‘पोएट आॅफ फ्रीडम’ यानी ‘शायर-ए-आजादी’ घोषित कर दिया। 1947 में विभाजन के समय दंगों की आग में लाहौर के जो मुसलमान परिवार झुलसे, उनमें उस्ताद दामन का परिवार भी शामिल था। उनकी दुकान और मकान दोनों जला दिए गए। बीवी और बेटी भी दंगों में मारी गई। कहा तो यह भी जाता है कि उस्ताद दामन दंगाइयों का विरोध कर रहे थे और अपने कुछ गैर-मुसलिम दोस्तों को बचाने की मशक्कत में लगे थे। इस पर एक दंगाई भीड़ ने गुस्से में आकर उस्ताद के घर को भी आग के सुपुर्द कर दिया।

इस हादसे के तत्काल बाद कुछ गैर-मुसलिम परिवारों ने उन्हें अपने साथ भारत ले जाने की पेशकश की, मगर ‘अपनी जड़ों से बेपनाह मुहब्बत’ के चलते दामन ने लाहौर में ही बने रहने को तरजीह दी। बाद में जब तक जिए, वहां की तानाशाही हुकूमत के खिलाफ लड़ते रहे। ज्यादातर वक्त जेलों में ही बीता। हर बार तानाशाही के खिलाफ नज्में लिखने और मंचों पर बोलने के आरोप में ही कैद होते। इसी सिलसिले में एक घटना की चर्चा विशेष रूप से होती है। एक बार वहां एक सरकारी संस्थान की ओर से मुशायरा आयोजित हुआ, जिसमें एक पंक्ति दी गई थी, ‘पाकिस्तान च मौजां ही मौजां’ अर्थात पाकिस्तान में मौज ही मौज है।

उस्ताद को भी नज्म का न्योता मिला। अभी नज्म का पहला शेर ही पढ़ा था कि सादी वर्दी में तैनात पुलिस वालों ने उन्हें मंच से नीचे उतारा और सीधा थाने ले गए। शेर यों था- ‘पाकिस्तान च मौजां ई मौजां/ जिधर वेखो फौजां ई फौजां।’

उधर शुरुआती दौर में ही मौलवी-मुल्ला, उस्ताद के खिलाफ फतवे जारी करने लगे। उनकी एक नज्म पर कट्टरपंथियों ने खूब हो-हल्ला मचाया। नज्म थी–

‘मुल्लां आप शराब ते नहीं पींदा
पर खून तां किसे दा पी सकदै
पुड़ जमीं आसमान दा रहे चलदा
दाने वांग इन्सान नूं पीह सकदै
एत्थे जुल्म ही जुल्म ने हर पासे
कित्थों तक कोई लबां नूं सी सकदै।’

उस्ताद अपने समकालीनों में, पूरे उपमहाद्वीप के बीच सौहार्द के मामले में ज्यादा अग्रणी थे।

महात्मा गांधी की हत्या पर भी उन्होंने एक नज्म लिखी थी-

‘गोली मारी ए जिन्हें महात्मा नूं
ओहने जमीन दा गोला घुमा दित्ता
चीखां विच आवाज इक अमन दी सी
किसे जालिम ने गला दबा दित्ता’

उससे पहले भी स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस की हर राजनीतिक रैली में उस्ताद दामन को मंच थमा दिया जाता। यह जनकवि उन दिनों आम लोगों में जोश फंूकता। उन्हें आजादी की लहर में शामिल होने का खुला निमंत्रण देता। उसकी मौजूदगी जनसभा की सफलता की गारंटी दे देती थी। एक बार महात्मा गांधी की एक रैली में गांधी की मौजूदगी के बावजूद लोग बार-बार उस्ताद दामन को सुनने की फरमाइश करने लगे। गांधी ने स्वयं उस्ताद को खादी की माला पहनाई और नज्म पढ़ना जारी रखने का आदेश दिया। वह चर्चित नज्म थी-

‘बेहतर, मौत आजादी दी समझदे हां
असीं ऐस गुलामी दी जिंदगी तों
साडा वतन, हकूमत है गैर-वतनी
मर मिटांगे ऐस शर्मिंदगी तों’

गंभीर शायरी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने के साथ-साथ उस्ताद दामन को हास्य और व्यंग्य में भी विशेष लोकप्रियता प्राप्त थी। बदलती हुई सामाजिक संरचना पर उनका एक व्यंग्य था-

‘एह कॉलेज ए कुड़ियां ते मुंडया दा
जां फैशना दी कोई फैक्टरी ए
कुड़ी, मुंडे दे नाल पई इंज तुरदी
ज्यों अलजबरे नाल जमैट्री ए’

ऐसा ही एक संदर्भ था 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुलफिकार अली भुट्टो की बेचैनी का। उस्ताद दामन उन गंभीर लम्हों को भी अपने हास्य-व्यंग्य से एक हल्का-फुल्का रूप दे देते थे। भुट्टो से मुखातिब उनकी एक नज्म उन दिनों खूब चली थी-

‘की करी जानै
ऐवें मरी जानै
किदे शिमले जानै
किदे मरी, जानै
की करी जानै
ऐवें मरी जानै’

वे पंजाबी साहित्य के एक लोकप्रिय क्लासिक ‘हीर’ पर भी अपनी शैली में तंज से बाज नहीं आए। उस्ताद दामन की एक लोकप्रिय नज्म थी- ‘नेड़े होके रांझनां सुणी मेरी’। नज्म इस तरह थी-

‘नेड़े होके रांझना सुनीं मेरी
मेरी डोलड़ी रंगपुर ढो चल्ली वे
डोली चली नहीं, बैठ मैं खेड़ियां दीं
मैं जियोंदी जागदी जमीं च समो चल्ली वे
सैदे खेड़े दी हिक्क ते सप्प लेटन
वालां लम्मयां नूं हत्थों खोह चल्ली वे
इक सहेलियां ते इक मज्झियां नी
मैं निशानियां छड्ड के, दो चल्ली वे

अपने देश की अमेरिका परस्ती और अमेरिका पर निर्भरता के खिलाफ उस्ताद दामन का लहजा अनोखा ही रहता था।

‘जिंदाबाद अमरीका
हर मर्ज दा टीका
जिंदाबाद अमरीका’

उसके शिकवे-शिकायत अल्लाह मिया से निरंतर चलते रहे। वहां के निम्न मध्यवर्ग और सामाजिक विषमताओं पर उस्ताद दामन के व्यंग्य बेहद तीखे भी थे और आम आदमी की जुबान पर भी चढ़ जाते थे। अल्लाह से शिकवे की चार पंक्तियां देखें-

जेकर सामने होवे, तां गल्ल करिए
खौरे अर्श ते बैठा ओह की करदा
एह दुनिया बनाई, घमंड ऐडा
जित्थे डुब के मरन नूं जी करदा

एक विचित्र बात यह भी थी कि उस्ताद ने अपने जीते जी अपना कोई काव्य संकलन छपने ही नहीं दिया। उसका कहना था, ‘किताबों में कैद हो गया तो अवाम से रूबरू मुखातिब कैसे हो पाऊंगा।’ लेकिन बाद में उस्ताद पर शोध प्रबंध भी लिखे गए और कलाम भी छपे। पूरे उपमहाद्वीप में आम आदमी की भाषा में हिंदू-मुसलिम, सिख, सौहार्द को समर्पित इस जनकवि ने 3 दिसंबर, 1984 को लाहौर में अंतिम सांस ली थी।