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‘घरेलू हिंसा’ कॉलम में कुलीना कुमारी का लेख : संबंधों में समानता की बुनियाद

स्त्री-पुरुष की शारीरिक संरचना और क्षमता को जाने बिना बराबरी का जोर ठीक नहीं। महिलावादियों को और बुद्धिमान बनने और महिला की मजबूती के लिए अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने की जरूरत हैै।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:26 AM
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हर तरफ अधिकार का जोर है। समानता की बातें हैं। लोग जैसे को तैसा करने की सीख दे रहे हैं। माताएं भी अपने बच्चों की परवरिश इसी समानता की नींव पर कर रही हैं। मगर अफसोस, इस समानता की आंधी में हमारा समाज स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक असमानता, सोच और लक्ष्य आदि की भिन्नता को भूलता जा रहा है।

सोचने की बात है कि समानता किसमें होनी चाहिए? दो बराबर वालों के बीच न! जब शारीरिक ताकत में स्त्री और पुरुष बराबर नहीं हैं, तो हर बात में महिला को पुरुष से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। यह तुलना और बराबरी की सीख कई बार महिला के लिए नुकसानदेह होती है।

ठीक है कि हर बेटी को बेटे के बराबर भोजन और जरूरी सुविधाएं दी जाएं, मगर माताओं को अपनी लड़की को यह भी बताना चाहिए कि विशेष परिस्थितियों में चुप्पी भी तुम्हारी जीत होती है। खासकर लड़ाई-झगड़ा होने की स्थिति में पुरुष के बराबर जवाब देने का प्रयास महिला को नहीं करना चाहिए। स्वाभाविक है कि मारपीट में वही जीतेगा, जो ताकतवर होगा, यानी पुरुष। प्रत्येक स्त्री को अपनी शारीरिक बनावट और क्षमताओं का भान होना चाहिए और जिसमें उसकी हार की संभावना हो, उससे बचना चाहिए।

यह भी गौरतलब है कि पुरुष द्वारा चुभती बात कहने के बावजूद प्राय: लड़की हाथ उठाने की पहल नहीं करती- बेशक बदले में वह भी चुभती बात कह दे। शायद इसकी वजह है कि महिला को पुरुष की चुभती बात से इतना गुस्सा नहीं आता या फिर पुरुष की ताकत की वजह से उसका गुस्सा दब जाता हो। मगर पुरुष बर्दाश्त नहीं कर पाता। जैसे ही उसे लगता है कि कोई उसे ललकार रहा है, नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है या उसकी बात नहीं मान रहा है तो वह अपनी ताकत का स्वभाविक रूप से इस्तेमाल कर लेता है। शायद अपनी शारीरिक मजबूती पर पुरुष को अभिमान हो और यह विश्वास भी कि महिला उससे कमजोर है, इसीलिए किसी भी तरह उससे जीतना ही है। कारण जो भी हो, मगर पुरुष अपनी ताकत का इस्तेमाल महिला पर नियंत्रण करने के लिए करता है।

पिता से मां को पिटते देखना, भाई-बहन के झगड़े में बहन की पिटाई और पति या प्रेमी द्वारा पत्नी या प्रेमिका की पिटाई की खबरें, शायद इसी सोच का नतीजा हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च आॅन वुमेन’ (आइसीआरडब्ल्यू) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दस में से छह पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक थे।

इस रिपोर्ट से यह भी जाना जा सकता है कि शारीरिक मजबूती में महिला पुरुष से कहां बराबर है? अगर होती तो महिला को पुरुष की हिंसा का शिकार नहीं होना पड़ता। सिर्फ मार-पीट नहीं, आए दिन ऐसी खबरें भी सुर्खियां बनती हैं, जिनमें पति-पत्नी की लड़ाई में जिद्दी पत्नी को सबक सिखाने के लिए पति उसकी जान ले बैठा। स्त्री-पुरुष का जीवन प्रेममय और सुखमय रहे, इसके लिए उन रास्तों पर पुनिर्विचार करने की जरूरत है, जिससे दोनों एक-दूसरे के प्रति अधिकतम सुखी और संतुष्ट महसूस कर सकें। यह अच्छी बात कि हमारा आधुनिक समाज नारी सशक्तिकरण पर खूब जोर दे रहा है, महिला को सशक्त होना भी चाहिए, मगर स्त्री-पुरुष बराबर हैं और सब कुछ में बराबरी की बात आज भी पुरुषवादी समाज को पच नहीं रहा।

शारीरिक रूप से स्त्री-पुरुष में प्राकृतिक असमानता और पुरुष का मजबूत होना, उसे अपनी महिला परिचित या रिश्तेदार के प्रति मजबूत दृष्टिकोण पैदा ही नहीं होने देता और जो महिला लड़ाई होने पर बराबरी की जिद करती है, पुरुष उस पर तरह-तरह से हावी होकर उसकी औकात दिखा देता है।

तभी शायद एक तरफ महिला के मजबूत बनने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, मगर उसके खिलाफ अपराध और जोर-जबरदस्ती भी कम नहीं हो पा रही। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट से पता चला है कि करीब-करीब हर साल महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहा है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट 2014-15 भी कुछ यही बताती है। 2014 में महिला के विरुद्ध पंद्रह हजार दो सौ छत्तीस अपराध दर्ज किए गए। 2015 में यह संख्या सत्रह हजार तीस हो गई।

स्त्री-पुरुष की शारीरिक संरचना और क्षमता को जाने बिना बराबरी का जोर ठीक नहीं। महिलावादियों को और बुद्धिमान बनने और महिला की मजबूती के लिए अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने की जरूरत हैै। हालांकि यह भी सही है कि स्त्री तो सृष्टि है और उसकी वजह से संसार कायम है। सिर्फ बच्चे पैदा करना नहीं, उनकी परवरिश में भी महिला की अधिक भागीदारी होती है। इसीलिए उसे खुद को पुरुष से कमजोर समझने की जरूरत नहीं। स्त्री को इतना बुद्धिमान होना चाहिए कि पुरुष के साथ मार-पीट वाली स्थिति पैदा न हो। अगर ऐसी स्थिति आ जाए तो उसे मुद्दे को बदलना आना चाहिए। जब मार-पीट में जीतने की संभावना कम हो तो उस स्थिति को बढ़ावा हर्गिज नहीं देना चाहिए। जहां महिला को लगे कि पुरुष का व्यवहार अधिक हिंसक हो रहा, तो उसे अपने बड़े-बुजुर्ग या जानकार के माध्यम से मामले को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। जहां लगे कि पुरुष का हिंसक व्यवहार रोकना मुश्किल हो, वहां उससे अलग होना समझदारी है।

समझदारी इसमें भी है कि जब तक संभव हो, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को पूरा सम्मान दें क्योंकि जीवन मिल कर ही चलता है। बिना एक-दूसरे से तुलना किए हुए, अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से अपनी भूमिका निभाएं और प्रसन्नता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाएं। परिवार, सामाजिकता और संस्कृति तभी कायम रहेगी और पुरुष का गौरव और स्त्री का स्त्रीत्व भी बना रहेगा।

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