चिंताः कारीगरों की दुर्दशा

राजस्थान में गुलाबी नगर जयपुर अपनी अनूठी वैभवशाली पारंपरिक विशेषताओं के लिए मशहूर है। यहां का हाथी दांत का शिल्प भी ऐसा ही है, जिसका कोई सानी नहीं है।

राजस्थान में गुलाबी नगर जयपुर अपनी अनूठी वैभवशाली पारंपरिक विशेषताओं के लिए मशहूर है। यहां का हाथी दांत का शिल्प भी ऐसा ही है, जिसका कोई सानी नहीं है। लेकिन अब उस कार्य के शिल्पी प्रोत्साहन के अभाव में उपेक्षित हो रहे हैं। इस समय जयपुर में लगभग डेढ़-दो हजार शिल्पी हैं जो हाथी दांत पर कारीगरी मांड रहे हैं। ये लोग मुख्यरूप से हाथी ,गणेश, बुद्ध और सुंदर चिड़िया बनाते हैं। यह काम ज्यादातर कुमावत जाति के लोगों के हाथों में है।

हाथी दांत की कला के कार्य में लगे हुए ये शिल्पकार ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। उनके घरों में काम की न तो समुचित सुविधा है और न ही स्थान। अगर राज्य सरकार इन्हें सही साधन उपलब्ध कराए तो ये लोग जहां अपने कार्य का विस्तार कर सकते हैं, वहीं काफी दूसरे लोग भी इससे जुड़ सकते हैं। सरकारी उपेक्षा ने यह धंधा इतना ठप कर रखा है कि शिल्पी इसके विस्तार के बारे में सोच भी नहीं पाते।
जिन शिल्पियों के पास थोड़ी बहुत पूंजी है, वे लोग अपने यहां ठेके पर मजदूर रख कर उनसे अपना काम कराते हैं। घंटों मेहनत करने के बाद मजदूरों को बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता है।

नगर में करीब एक सौ शोरूम हैं, जहां विदेशी पर्यटक ही सबसे बड़े ग्राहक होते हैं। अनुमान है कि प्रतिदिन इन शोरूमों में तीस-पैंतीस हजार रुपए की हाथी दांत की प्लेटें बिक जाती हैं। यानी हाथी दांत से हर महीने लाखों रुपए की विदेशी मुद्रा अकेला जयपुर प्राप्त करता है।
जयपुर की हाथी दांत की खासियत है इसकी विश्वसनीयता। हाथी दांत की प्लेट में धोखे की आशंका कम ही रहती है। यह अलग बात है कि रंग वाले चित्र ज्यादा बिक रहे हैं। विदेशों में राम के बजाय कृष्ण लोकप्रिय हैं।

इसके अलावा श्रीगणेश की चित्रकारी भी इन दिनों काफी बिक रही है। दूसरे चित्रों में गांव की गुवाड़ में बढ़ई, भीख मांगती हुई स्त्रियां, घास का गट्ठर लिए ग्रामीण महिलाएं और किशनगढ़ की नायिका वाले चित्र ज्यादा बिकते हैं। यानी बढ़िया और बड़े आकार के सुंदर कलात्मक दांत पर माड़ लेने वाला शिल्पी को दो चित्र बनाने में करीब महीने भर लगते हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें हजार रुपए ही मिल पाते हैं। रंग के काम में आंखों की एकाग्रता, बारीक नजर, कारीगरी पहली शर्त है। गिलहरी की पूंछवाले ब्रश से बहुत ही शांत मन से ये शिल्पी चित्रों में रंग भरते हैं।

जो पुश्तैनी कलाकार हैं, वे बचपन से ही अपने बच्चों को यह सिखाना शुरू कर देते हैं। गरीबी और अभाव के कारण उनकी शिक्षा-दीक्षा नहीं हो पाती। इसीलिए, ज्यादातर कारीगर अनपढ़ रह जाते हैं। और पूरी जिंदगी बिचौलिए और कारोबारी उनका शोषण करते रहते हैं। उन्हें श्रम कानून वगैरह के बारे में भी कुछ जानकारी नहीं है। न ही वे अपनी लड़ाई लड़ पाते हैं।
इस समय हाथी दांत हजार से लेकर पंद्रह सौ रुपए प्रति किलोग्राम के बीच मिलता है। यही हाथी दांत किसी जमाने में पच्चीस रुपए प्रति किलोग्राम था। इसलिए अब हाथी दांत की चीजों के दाम भी बढ़ गए हैं। चर्चा है कि अब सरकार हाथी दांत पर भी पांबदी लगाने जा रही है, क्योंकि वन्य जीव रक्षकों का मानना है कि हाथी दांत के लिए लोग हाथियों को मार रहे हैं। इसलिए इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा कर हाथियों को मारने से बचाया जा सकता है।

लघु उद्योग निगम हाथी दांत की बिक्री करता है। निगम का सारा तरीका पुरातनपंथी है। उसे अपने बिक्री केंद्रों को आधुनिकतम बनाना चाहिए। तभी इस व्यवसाय का विस्तार हो सकेगा। व्यापारियों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए और इस शिल्प को बढ़ावा देने के लिए शिल्पियों का मेहनताना बढ़ाना चाहिए। यह कारीगरी दुनिया में और बेहतर जगह बना सकती है। शिल्पियों की जो उपेक्षा हो रही है, वह चिंताजनक है। १

Next Stories
1 घर-परिवारः यह कैसा अलगाव
2 व्यंग्य : सैर वार्ता
3 कहानी : अपने लोग
यह पढ़ा क्या?
X