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महिला लेखन: स्त्री-अस्मिता का साहित्य

पिछले कुछ दशक में हिंदी साहित्य में स्त्री लेखन का व्यापक प्रस्फुटन एक अनूठी और ऐतिहासिक घटना है। यहां स्त्री लेखन एक सामाजिक सच्चाई और अस्मिता के संघर्ष की चुनौती के रूप में सामने आता है। यह स्त्री के अपने नजरिए से स्त्री लेखन का नया पाठ है।

Author Published on: March 11, 2018 2:52 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मीना बुद्धिराजा

पिछले कुछ दशक में हिंदी साहित्य में स्त्री लेखन का व्यापक प्रस्फुटन एक अनूठी और ऐतिहासिक घटना है। यहां स्त्री लेखन एक सामाजिक सच्चाई और अस्मिता के संघर्ष की चुनौती के रूप में सामने आता है। यह स्त्री के अपने नजरिए से स्त्री लेखन का नया पाठ है। इस साहित्य में स्त्री विमर्श अस्मिता का वह आंदोलन है, जो हाशिए पर छोड़ दिए गए नारी अस्तित्व को फिर से केंद्र में लाने और उसकी मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करने का अभियान है। यह साहित्य स्त्री को सामाजिक संरचना में दूसरे दर्जे पर रखने का मुखर विरोध और स्त्री को एक जीवंत मानवीय ईकाई के रूप में स्वीकार करने का प्रयास है। दुनिया के सभी समुदायों, सभ्यता, धर्म, वर्ग और जाति में पितृसत्ता किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था और मूल्यों ,मर्यादाओं, आदर्शों और संस्कारों के विभिन्न रूपों के जरिए बड़े बारीक ढंग से इसे समाज की संरचना में बुना गया है। इसके माध्यम से पुरुष को स्त्री की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का जो षड्यंत्र रचा गया उसमें स्त्री शोषण को सहज और स्वाभाविक मान्यता के रूप में समाज के मन-मस्तिष्क में बैठाने की निरंतर कोशिश की गई। समय-समय पर विभिन्न शक्तियों से गठजोड़ करके इसने अपना रूप भी बदला, पर इसकी मौजूदगी सामंतवादी व्यवस्था से लेकर पूंजीवादी और अब बाजारवादी व्यवस्था की आतंरिक संरचना में भी अनेक स्तरों पर बनी हुई है। इसका उद्देश्य स्त्री के वास्तविक अस्तित्व और स्वप्नों का सदा के लिए दमन करना और पौरुषपूर्ण वर्चस्ववादी समाज में स्त्री के लिए समानता और न्याय की संभावनाओं को समाप्त करना रहा है।

इन सभी रूढ़िवादी व्यवस्थाओं और सदियों से चल रहे सुनियोजित शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध विश्व भर के वैचारिक चिंतन में नारीवादी विमर्श ने एक नया आयाम और परिप्रेक्ष्य निर्मित किया। पश्चिम में स्त्री विमर्श शुरू करने का श्रेय सीमोन द बोउवार को जाता है, जिन्होंने ‘ द सेकेंड सेक्स’ लिख कर पितृसतात्मक समाज में तहलका मचा दिया और परंपरागत सामाजिक संरचना को चुनौती दे डाली। उन्होंने माना कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, उसे बना दिया जाता है।’ स्त्री-अस्तित्व और समाज के दमन चक्र में उसकी उपेक्षा, शोषण, उसकी स्वतंत्र मानसिकता पर पुरुष का अधिकार जिन नियमों और मान्यताओं के रूप में आरोपित किए गए, यह चिंतन उसके प्रति विद्रोह और मुक्ति का विमर्श और आंदोलन बन कर सामने आया। 1975 अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित हुआ। भारत के संदर्भ में भी इसे ऐतिहासिक काल कहा जा सकता है। स्त्री शिक्षा का सभी क्षेत्रों में विकास हुआ, अधिकारों की मांग बढ़ी और आत्माभिव्यक्ति के लिए क्षुब्ध और छटपटाते हृदय ने साहित्य को माध्यम बनाया। राजनीति और समाज के सभी क्षेत्रों में जब महिला सशक्तीकरण का दौर शुरू हुआ तो साहित्य की दुनिया में भी यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। महिला-लेखन के केंद्र में स्त्री अस्मिता का संघर्ष, अदम्य जिजीविषा, स्त्री स्वातंत्र्य, देह और यौन उत्पीड़न के प्रति विद्रोह और स्वयं की पहचान के प्रति जागरूकता के साथ सामाजिक पहलुओं से जुड़े यथार्थ को भी देखा गया। मानवीय संवेदना की गहरी पड़ताल करते हुए सभी वर्ग, वर्ण और जाति की स्त्रियों की अंतरात्मा का अवलोकन करके ये स्त्री रचनाएं पाठकों को स्तब्ध और उद्वेलित कर देती हैं। यह स्त्री-लेखन नारी-शोषण के विरुद्ध परिवर्तन और क्रांति के साथ समकालीन साहित्य में सशक्त हस्तक्षेप भी करता है।

वर्तमान स्त्री लेखन में स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत और सक्रिय स्त्री रचनाकार स्त्री-हितों की चर्चा स्वयं करने लगी है और अपनी अस्मिता को पहचान रही है। प्रभा खेतान का कहना है- ‘यह इतिहास में पहली बार घट रहा है कि स्त्री पितृसत्ता को नकार रही है, उस सत्ता द्वारा आरोपित भूमिकाओं के प्रति सवाल उठा रही है, वह वस्तु से व्यक्ति बनने की प्रक्रिया में है।’ स्त्री को हीन और भोग्या बना कर तथा पुरुष को अधिक वर्चस्ववादी शक्तियां देकर लैंगिक विभाजन की व्यवस्था समाज में हमेशा से चलती रही है। स्त्री साहित्य अपनी मूल चेतना में उसे पराधीन बनाने वाली इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित विवाह संस्था, धर्म, जाति, वर्ग आदि की स्त्री-विरोधी भूमिका को प्रकाश में लाता है। स्त्री को शक्तिहीन करने की यह प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म, जटिल और संश्लिष्ट है, जिसमें स्त्री को कभी किसी संवाद या विवाद का अवसर नहीं दिया गया। स्त्री लेखन इन्हीं प्रश्नों से सीधी मुठभेड़ करके समाज की संकीर्ण मानसिकता से टकराने का जोखिम उठाता है। वह पुरुष को बेहतर सत्ता का मनुष्य मानने वाले समाज से प्रश्न करता है कि स्त्री आधी आबादी है, तो फिर उसे मानवीय गरिमा से वंचित क्यों रखा गया है। आज हिंदी में स्त्री लेखन का साहित्य समृद्ध और पहले की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है। स्त्री रचनाकार एक बड़े बदलाव के साथ आत्मविश्वास से अपने सुख-दुख, आक्रोश और असहमति को व्यक्त कर रही है। वह समान नागरिक के रूप में पुरुष से किसी अतिरिक्त दया या सहानुभूति की अपेक्षा नहीं रखती। मात्र देह मुक्ति को विमर्श न मान कर वह बौद्धिक रूप से अधिक सक्षम, सामाजिक रूप से ज्यादा सचेत और परिपक्व है। इस लेखन के अनुभवों का दायरा वृहद है और इनकी अभिव्यक्ति में स्त्री मन की व्यथा, आकांक्षा और त्रासदी का जीवंत चित्रण है, क्योंकि इनका यथार्थ हमारे समय का भोगा हुआ यथार्थ है। स्त्री साहित्य में आज की स्त्री के जीवन की वास्तविकताएं, संभावनाएं और दासता की दारुण स्थितियों से मुक्ति की दिशाओं का उद्घाटन हुआ है। स्त्री की अपनी पहचान को स्थापित करते हुए इन रचनाकारों ने यह सिद्ध किया कि समाज मे हर तरह के शोषण और अत्याचार का उपभोक्ता प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अधिकतर स्त्री ही होती है, चाहे वह धार्मिक कुरीतियां हों, यौन हिंसा या आर्थिक पराधीनता, युद्ध हो या जातिगत दंगे- विवाद, इन सभी का सबसे बुरा प्रभाव स्त्री पर ही पड़ा है। लेखिकाओं ने बंधनों को तोड़ कर स्त्री पर नैतिकता, सहनशीलता और त्याग जैसे थोपे हुए मूल्यों को नकार दिया और उसकी स्वतंत्र अस्मिता को समाज की एक संपूर्ण ईकाई मान कर स्त्री मुक्ति का मुख्य मुद्दा बनाया।

स्त्रीवाद की वैचारिकी साहित्य में अत्यंत विश्वसनीय रूप से एक सतत संघर्ष यात्रा और आंदोलन के रूप में निरतंर समृद्ध हो रही है। स्त्री-लेखन सामाजिकता और दैहिकता के प्रश्नों को समांतर लेकर चलते हुए पितृसत्ता पर ठीक उन्ही तर्कों से प्रहार कर रहा है, जो उसके लिए भी अपनी पहचान के सवाल हैं। भूमंडलीकरण और बाजारवादी व्यवस्था के अतंर्विरोधों के उपस्थित रहते उसका संघर्ष और चुनौती बहुकोणीय और ज्यादा जटिल हो जाती है। इसलिए तमाम विरोधी स्थितियों के बीच खड़े होना और अपनी जगह बनाना आज स्त्री के लिए दोहरी लड़ाई है। इन दोनो स्तरों पर सतर्कता से तैनात रहने के लिए ज्यादा तर्कसंगत दृष्टिकोण, ज्यादा सुलझा हुआ व्यक्तित्व और गंभीर मानसिकता, दृढ़ व्यक्तित्व जैसी क्षमताएं अपेक्षित हैं। स्त्री चेतना को केवल भावनात्मक कसौटी पर नहीं, बल्कि बौद्धिकता के मानदंड पर स्त्री साहित्य परखता है। यह बौद्धिकता विद्रोह के रूप में और स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक मानसिकता की संकीर्ण और क्षुद्र सोच के प्रखर विरोध पर आधारित है। समकालीन परिदृश्य में असंख्य स्त्री रचनाकार स्त्री के सच और स्वप्न को जिस यथार्थवादी दृष्टिकोण, गहराई, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता से लिख रही हैं, वह हिंदी में अभूतपूर्व है। इनके लेखन के केंद्र में स्त्री जीवन की ज्वलंत और भयावह समस्याएं हैं, उन मर्यादाओं की तीक्ष्ण आलोचना है, जिन्होंने हमेशा स्त्री समाज का खुला दमन और शोषण किया। वर्जीनिया वुल्फ ने कहा है- ‘स्त्री का लेखन स्त्री का लेखन होता है, स्त्रीवादी होने से बच नहीं सकता। अपने सर्वोत्तम में यह स्त्रीवादी ही होगा।’ इस अर्थ में हिंदी का स्त्रीवादी साहित्य स्त्री को व्यवस्था की गुलामी से मुक्त करके उसे एक आत्मनिर्णायक स्वतंत्र व्यक्ति की अस्मिता के रूप मे स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण और सार्थक प्रयास है।

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