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प्रसंगवश: सौ साल पुराना सवाल

जुलाई, 1907 में उन्होंने करारा व्यंग्य करते हुए ‘कवि और कविता’ शीर्षक से एक लंबा लेख ‘सरस्वती’ में लिखा। उसमें बाबू श्यामसुंदर दास पर आक्षेप करते हुए लिखा : ‘हमने कविता के लक्ष्य-लक्षण संबंधी अनेक ग्रंथ छान डाले पर ‘भद्दी कविता’ का हमें न कहीं लक्षण मिला और न उदाहरण ही। सभा यदि ‘भद्दी कविता’ का सोदाहरण लक्षण भी बतला देती तो बड़ी कृपा होती।

Author Published on: March 11, 2018 2:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पंकज पराशर

जब हिंदी में ‘गंभीर’ और कथित ‘लोकप्रिय’ कविता के कवियों के बीच की खाई निरंतर बढ़ती हुई संवादहीनता के शिखर तक पहुंच गई हो और साहित्य के इतिहास में उल्लिखित होने की अर्हता प्राप्त कविताएं छंदमुक्तता को ही समकालीनता का स्थानापन्न समझने लगी हो, तब अपने प्रकाशन से लगभग एक सौ दस वर्ष बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा परिभाषित यह प्रश्न एक बार फिर से एक नई व्याख्या की मांग करता है कि आखिरकार ‘कविता क्या है?’ ऐसा नहीं कि इस प्रश्न ने केवल आचार्य रामचंद्र शुक्ल को परेशान किया था। उनके पूर्ववर्ती विद्वानों को भी इस प्रश्न ने इतना उद्वेलित किया था कि भारतेंदुकालीन लेखकों से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक कविता को परिभाषित करने की बहस लगातार चलती रही, जिसमें तर्क-वितर्क के अलावा व्यक्तिगत आक्षेप और व्यंग्य-वाण भी खूब चले। भारतेंदु युग के एक प्रमुख लेखक बाबू बालमुकुंद गुप्त ने सन 1903 में मुंबई से प्रकाशित ‘बालबोध’ पत्रिका में इसी शीर्षक से एक लेख लिखा और बाबू श्यामसुंदर दास ने नागरी प्रचारिणी सभा की पत्रिका के सात जुलाई, 1906 के अंक में कविता को लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका को लेकर यह मारक टिप्पणी की : ‘जैसे अच्छे ‘सरस्वती’ के लेख होते हैं, वैसी ही भद्दी इसकी कविताएं होती हैं।’ इस पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का तिलमिलाना स्वाभाविक था।

जुलाई, 1907 में उन्होंने करारा व्यंग्य करते हुए ‘कवि और कविता’ शीर्षक से एक लंबा लेख ‘सरस्वती’ में लिखा। उसमें बाबू श्यामसुंदर दास पर आक्षेप करते हुए लिखा : ‘हमने कविता के लक्ष्य-लक्षण संबंधी अनेक ग्रंथ छान डाले पर ‘भद्दी कविता’ का हमें न कहीं लक्षण मिला और न उदाहरण ही। सभा यदि ‘भद्दी कविता’ का सोदाहरण लक्षण भी बतला देती तो बड़ी कृपा होती। इससे लोग ‘भद्दी कविता’ लिखने और प्रकाशित करने से बाज आते।’ इसके बावजूद न ‘सरस्वती’ समर्थित कवि बाज आए और न कविता को परिभाषित करने की बहस थमी। हिंदी की आरंभिक आलोचना के सशक्त आलोचक, ‘हिंदी प्रदीप’ के संपादक और भारतेंदु युग के प्रमुख लेखक बालकृष्ण भट्ट ने दिसंबर, 1910 के ‘मर्यादा’ में ‘कविता क्या है?’ लिख कर कविता-संबंधी बहस में अपने तर्कों को प्रस्तुत किया। उनके समकालीन राधाचरण गोस्वामी ने ‘कवि-कल्पना’ तथा चतुर्भुज औदिच्य ने ‘कवित्व’ शीर्षक से 1907 की ‘सरस्वती’ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के आधुनिक हिंदी कविता को लेकर प्रस्तुत तर्कों को आगे बढ़ाया। बाद में इस बहस में गंगाप्रसाद अग्निहोत्री और मैथिलीशरण गुप्त भी शामिल हुए और 1914 में ‘हिंदी कविता किस ढंग की हो?’ शीर्षक से कविता को परिभाषित करने के अभियान को आगे बढ़ाया। अंतत: इसमें शामिल होने का लोभ संवरण वैयाकरण कामता प्रसाद गुरु भी नहीं कर सके और उन्होंने ‘आधुनिक हिंदी कविता’ शीर्षक निबंध लिखा। यानी आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पहले ‘कविता क्या है?’ संबंधी बहस लगभग डेढ़ दशक तक चलती रही और उन बहसों से जो बातें निकल कर सामने आर्इं, उससे रामचंद्र शुक्ल सहमत होकर शांत बैठ जाने की जगह और बेचैन होते चले गए। इस संदर्भ में बाद के दशकों में भी वे किसी विद्वान के तर्क-वितर्क से सहमत नहीं हो पाए और उनकी चिंतन प्रक्रिया निरंतर चलती रही। इस प्रश्न के माकूल और संतोषजनक उत्तर को लेकर आचार्य शुक्ल जितने वर्षों तक परेशान रहे, उतने ही अपने उत्तर के ‘परफेक्शन’ को लेकर संदेही और दुविधाग्रस्त भी बने रहे।

गौरतलब है कि ‘कविता क्या है?’ के संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसा संदेह और चिंतन उनके पूर्ववर्ती या परवर्ती किसी अन्य विद्वान के यहां नहीं दिखता। इसे इससे समझा जा सकता है कि ‘कविता क्या है?’ निबंध पहली बार ‘सरस्वती’ के अप्रैल 1909 के अंक में प्रकाशित हुआ था। हालांकि इस निबंध का एक कच्चा प्रारूप उन्होंने 1908 में ही बना लिया था, लेकिन इसमें ‘परफेक्शन’ लाने के लिए 1922, 1927, 1930 और 1939 तक वे इसमें प्रयुक्त शब्दों और पंक्तियों को बार-बार संशोधित और परिवर्धित करते रहे। एक-एक शब्द, बिंब, वाक्य-विन्यास पर उन्होंने बारहा सोचा, तब जाकर कुछ हद तक उन्हें संतोष हुआ। सवाल है कि वे बार-बार इस निबंध में क्यों परिवर्तन कर रहे थे? वे इसलिए ऐसा नहीं कर रहे थे कि इन परिवर्तनों द्वारा शब्दों के विन्यास में कोई चमत्कार दिखा सकें या निबंधात्मक कलाओं से उसे जोड़ सकें। उनका असल उद्देश्य था कि वे समय के परिवर्तन के साथ-साथ ‘शिक्षित जनता’ की परिवर्तित चित्तवृत्तियों को अपने निबंध में मूर्त कर सकें। क्योंकि शिक्षित जनता की जिन ‘संचित’ मनोवृत्ति को वे साहित्य के इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण कसौटी मानते थे, उस शिक्षित जनता की परिवर्तित चित्तवृत्तियों की कविता-संबंधी परिभाषा में भला कैसे अनदेखी कर सकते थे? आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस निबंध के एक सौ दस वर्ष बाद अगर हम आज के काव्य-परिदृश्य पर विचार करें, तो देखेंगे कि आज कितने प्रतिशत काव्य-आलोचक हैं, जो समर्पित भाव से हिंदी की काव्य-आलोचना में लगे हुए हैं और जिन्हें आज के पल-पल परिवर्तित परिवेश को ध्यान में रखते हुए अपनी काव्य-संबंधी मान्यताओं में परिवर्तन की आवश्यकता निरंतर महसूस होती हो। विचारणीय तथ्य यह है कि लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही और नामवर सिंह के बाद कितने ऐसे काव्य-आलोचक याद आते हैं, जिन्होंने अपनी ही काव्य-संबंधी मान्यताओं में बार-बार संशोधन और परिवर्धन किया हो? या जिन्होंने समकालीन सत्ता के कथित विकासवादी अवधारणा के आलोक में सभ्यता के विकास के साथ-साथ कवि-कर्म के कठिन होते चले जाने की प्रक्रिया को माकूल तरीके से समझने का प्रयास किया हो? हिंदी काव्य-आलोचना की जिस परंपरा में कविता को परिभाषित करने को लेकर इतनी लंबी बहस चली हो, उस काव्य-आलोचना की परंपरा में इस प्रश्न की शायद माकूल पड़ताल नहीं हो रही है कि आधुनिकता के आवरण में आज जिस मध्ययुगीनता और सामंती मानसिकता के बीज का अंकुरण/ पल्लवन हो रहा है, क्या उसे मूल्यांकन संबंधी कसौटी को बरतते समय ध्यान में रखा जा रहा है? मनुष्य-विरोधी सत्ता के उत्स और शिक्षित जनता की परिवर्तित चित्तवृत्ति के आलोक में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह समकालीन हिंदी कविता पर विचार करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं होती है? जिस हिंदी कविता में सत्ता का विरोध, हाशिए के समाज और हाशिए के मनुष्य की चिंता व्यक्त की जाती है, उसके समाज का वास्तविकता के धरातल पर संवाद और सहकार का रिश्ता शायद उतना नहीं है, जितनी आकांक्षा कविता में प्रकट की जाती है। जनता से संवाद और सहकार का जैसा रिश्ता मंचीय कवि’ बना रहे हैं, वैसा रिश्ता हिंदी कविता के अतीत को देखें तो कथित गंभीर कविता का रहा है। तर्क और तथ्य पेश करने के साथ ही श्रेष्ठत्व को लेकर भी दोनों धड़े के अपने-अपने दावे हैं, लेकिन इस पर एक बार फिर से तभी सार्थक बहस हो सकती है जब यह तय हो जाए कि आज के परिदृश्य में आखिरकार ‘कविता क्या है?’

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