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कहानी: कशमकश

बिल का चेहरा देख कर साफ महसूस किया जा सकता था कि वह कितनी जद्दोजहद से जूझ रहा है। शायद मेरा भारतीय मूल का होना उसे किसी दुविधा में डाल रहा है।

Author July 29, 2018 6:04 AM
कहानी

तेजेंद्र शर्मा

बिल के चेहरे के भाव समझ नहीं पा रहा था।…
‘मित्र, मैं बहुत परेशान हूं। समझ नहीं आ रहा कि तुम मेरी समस्या समझ पाओगे या नहीं… बात बहुत पर्सनल है।’
‘देखो बिल, मैं एक लेखक हूं… थोड़ा संवेदनशील तो जाहिर है कि हूं… तुम बताओ, हो सकता है, तुम्हारी दिक्कत का कोई हल निकल आए।’
‘मैं तय नहीं कर पा रहा कि तुम्हें अपने घर की बात बताऊं या नहीं।’
‘यह तुमको तय करना है। इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। मामला तुम्हारे परिवार की निजता का है। अगर तुम बात साझा करके जी हल्का करना चाहो या फिर अपनी समस्या का कोई हल ढूंढ़ना चाहो, तो हो सकता है कि मेरे जीवन का अनुभव तुम्हारे काम आ जाए।’

बिल का चेहरा देख कर साफ महसूस किया जा सकता था कि वह कितनी जद्दोजहद से जूझ रहा है। शायद मेरा भारतीय मूल का होना उसे किसी दुविधा में डाल रहा है। मगर वह तो मुझे अपना बहुत करीबी दोस्त मानता है। जब कभी भारतीय खाना खाने का मन होता है, तो मुझसे ही कहता है, ‘सुनो बडी, कल रात मैंने अपनी फेमिली को इनवाइट कर लिया है कि डिनर अफगानी रेस्तरां में करना है। और तुम उस डिनर के होस्ट हो।’ दरअसल, बिल सही मायने में ब्रिटिश अंग्रेज नहीं है। वह है आयरलैंड का मूल वंशज। उसके दादा कभी आकर लंदन में बस गए थे। तबसे परिवार लंदनवासी हो गया है। बिल का तो जन्म भी लंदन में हुआ और रहता भी हैरो जैसे इलाके में है। मगर नहीं भूल पाता कि मूल रूप से वह आयरिश है।

कभी सेंसबरी में काम करता था। उन दिनों की याद उसके बदन में झुरझुरी पैदा कर देती है। ‘क्या दिन थे यार। कितन बड़े बड़े कंटेनर उठाया करता था… सामान लादना और फिर स्टोर में सलीके से रखना। कंधे दर्द करने लगते थे।’ ‘फिर इतने मोटे कैसे हो गए? इतना भारी काम करने के बाद तो तुम्हारे बदन पर चर्बी बिल्कुल दिखाई नहीं देनी चाहिए।’ ‘कुछ नहीं ब्रदर, यह जो मैक्डॉनल्ड और केंटकी फ्राईड चिकन है न… यही मेरा खाना हुआ करता था। पिता की मौत के बाद मैं मां से अलग, अपने काम के नजदीक रहने लगा था। अकेली जान, कौन कम्बख्त खाना बनाएगा।’

और मैं अपने बारे में सोचने लगा। मैं भी तो अकेला रहता हूं… हां मुझमें और बिल में बीस साल की दूरी है। मगर वह मुझे बुलाता मेरे पहले नाम से ही है… उसके नरेन कहने से लगता है कि हम दोनों के बीच की सालों की दूरी अचानक सिमट-सी गई है। उसकी पत्नी जेनी भी मुझे नरेन ही कहती है।… उसका तलफ्फुज मजेदार है। उसका नरेन सुनने में नैरेन लगता है। उसके सामने के दांतों में नरगिस के दांतों की तरह थोड़ी जगह दिखाई देती है। मुस्कुराहट सच्चाई से भरी होती है। उसकी एक और विशेषता है- वह काली है और घाना की रहने वाली है। बातों ही बातों में मैंने जेनी को बताया कि जब घाना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट रालिन्स ने विद्रोह कर दिया था तो मैं आक्रा के कांटीनेंटल होटल में रुका हुआ था। मुझे वहां जबर्दस्ती नौ-दस दिन रहना पड़ा था। जब तक उड़ानें दोबारा शुरू नहीं हुर्इं, तब तक वहीं फंसा रहा।

‘ओ नरेन, फिर तो तुम मेरी मां से वहां जरूर मिले होगे। वह तो उसी होटल में काम करती थी। वह भी बेचारी एक हफ्ते तक वहां से बाहर नहीं निकल पाई थी। हर तरफ कर्फ्यू जो लगा था।’ मेरी आंखों के सामने उस समय के स्टाफ के सभी चेहरे एक फिल्म की तरह घूम गए। एक काली लड़की से तो लगभग प्यार-सा हो गया था।… हम दोनों ने उन विद्रोह वाले दिनों में प्यार का बिगुल बजा दिया था।… कहीं वही तो जेनी की मां नहीं थी।… जेनी का चेहरा देखने लगा… कहीं उसमें मेरी झलक तो नहीं। फिर अपने ही बेवकूफी वाले विचार पर हंसी आ गई। मगर जेनी अनचाहे ही कुछ बेटी जैसी लगने लगी थी।

बिल ने जब रेलवे में नौकरी शुरू की तो उसे ट्रेनिंग मैंने ही दी थी। यात्रियों से बात कैसे की जाती है… उनकी यात्रा की आईटिनिरेरी कैसे बनाई जाए… यात्रियों को सबसे सस्ती टिकट कैसे बना कर दी जाए… स्टेशन की सुरक्षा जांच कैसे की जाए… यूनिफॉर्म का महत्त्व… जूतों का पॉलिश होना… सभी कुछ मैंने सिखाया था… यात्रियों के प्रति कैसा रवैया हो। बिल भी इस मामले में मेरा अतिरिक्त सम्मान करता है। कुछ अरसा पहले जब जेनी से कुछ अनबन हो गई थी तब भी दोनों ने मुझसे ही दिल की बात की थी। दोनों का मनमुटाव मिटा भी, तो सकोनी रेस्तरां के शुद्ध शाकाहारी कचरा-पट्टी खाने से। एक प्यारी-सी बेटी भी है दोनों की- रोज, जो मुझे पोती का सुख देती है।

जिस इंसान से इतना अधिक जुड़ाव हो, भला उसका दर्द कैसे सहा जाए… चाह रहा था कि वह एक सांस में अपने दिल की बात कह दे और मैं बिना समय गंवाए उसकी समस्या का हल उसके सामने रख दूं। वैसे उसके चेहरे का तनाव देख कर मैं समझ रहा था कि मामला इतना आसान नहीं है। मगर मैं स्वयं पूछ कर उसे किसी द्वंद्व में नहीं डालना चाहता था। मुझे इंतजार करने में कोई समस्या महसूस नहीं हो रही थी।

‘नैरी…’

बिल को नरेन कहना कभी सुविधाजनक नहीं लगा… बस हो गया मेरा नामकरण- नैरी! वैसे मैंने भी तो कभी उसको विलियम कह कर नहीं पुकारा। वह हमेशा से बिल था और पूरा स्टाफ उसे बिल ही कहता था।

‘हां बिल?’

‘यार प्रॉब्लम बहुत गंभीर है।… दरअसल, मेरी मां को शराब की लत है। उसे दो-तीन बार रीहैबिलिटेशन सेंटर ले जाया गया है, मगर… हर बार वह ठीक होकर बाहर आती है… कुछ दिन ठीक रहती है और फिर वही नशे की आदत शुरू हो जाती है।… वह पीती भी स्कॉच ऑन दि रॉक्स है… और मुश्किल यह है कि ग्रांट्स की पचास प्रतिशत अल्कोहल वाली विस्की पीती है… ’

‘फिर क्या दिक्कत है। एक बार फिर रीहैबिलिटेशन सेंटर ले चलते हैं।’

‘इस बार समस्या बहुत गंभीर है मित्र। मेरी मां का पिछले बीस साल से एक बॉयफ्रेंड था। अचानक वह भी उसे छोड़ गया है।… मुझे नफरत हो गई है उस इन्सान से। मुझे कहीं मिले तो गोली मार दूं।’

‘तुम इस वक्त अपनी मां की चिंता करो। उसके बॉयफ्रेंड के बारे में बाद में सोचा जाएगा।’

‘नैरी तुम सुनोगे तो तुम भी उससे नफरत करने लगोगे।’

‘मैं नफरत बाद में करूंगा, पहले तुम्हारी मां की समस्या हल करने का प्रयास करूंगा।’

‘मैंने तुम्हें बताया न कि मां पहले भी नशाखोरी की शिकार हो चुकी है। जब-जब वह रीहैबिलिटेशन सेंटर से वापस आती तो शराब पीना छोड़ देती। फिर सात-आठ महीने जब वह शराब नहीं पीती, तो उसका बॉयफ्रेंड उसकी तारीफ करता और ईनाम के तौर पर उसे कह देता कि चलो आज एक पैग ले लो। हम तुम्हारा शराब छोड़ना सैलिब्रेट करते हैं।’

‘उसका यह तरीका तो अच्छा भी है और बुरा भी।’

‘क्या खाक अच्छा है। मां बस एक पैग पी लेती और फिर से शुरू हो जाती उसकी पीने की लत। तीन बार हम उसे डी-टॉक्स करवा चुके हैं। हर बार उस कमीने ने यही किया है। अबकी बार भी उसी के कारण मेरी मां इस मुसीबत में फंसी है।’
‘बिल, मुझे लगता है कि तुम नाहक ही अपनी मां के दोस्त के प्रति… वैसे उसका नाम क्या है? तुम्हारी मां का बॉयफ्रेंड कहना कुछ इंसल्टिंग-सा लगता है।’

‘ऐसा क्यों? जब वो मेरी मां का बॉयफ्रेंड है तो भला कहने में काहे की दिक्कत।’

‘यार तुम नहीं समझोगे। मेरी मानसिकता अभी पूरी तरह ब्रिटिश नहीं हुई है। मां शब्द के साथ मुझे बॉयफ्रेंड शब्द का इस्तेमाल बहुत अटपटा और डेरोगेटरी-सा लगता है।’

‘ओह, तो तुम पीटर कह सकते हो। उसका नाम पीटर है। दरअसल, मैं उस कुत्ते का नाम भी नहीं लेना चाहता था।’

‘जब तुम उसका नाम नहीं लेना चाहते तो फिर उसको लेकर इतना परेशान क्यों हो रहे हो?’

‘सच तो यह है नैरी कि इस वक्त मैं अपनी मां से कहीं अधिक पीटर को लेकर परेशान हूं। कल ही खबर आई है कि उसे प्रोस्टेट कैंसर हो गया है।… समझ नहीं पा रहा हूं कि मैं उसके बारे में चिंता करूं या बस गोली मार दूं।’

सच तो यह है कि मैं अपने जीवन में इतना कन्फ्यूज इससे पहले कभी नहीं हुआ। मैं बिल को राय दूं तो क्या दूं। फिर भी कह दिया, ‘यार वो अपनी बीमारी से खुद निपट लेगा। हमें उससे क्या लेना है।’

‘नैरी, मेरा उससे बीस बरस का रिश्ता रहा है… अपने पिता की तो मुझे शक्ल भी याद नहीं… पिता के नाम पर बस वही एक चेहरा मेरे पास है।… तुम बताओ उसे एडवांस स्टेज का प्रोस्टेट कैंसर है। एक तरफ तो वह मेरे पिता समान है और मरने वाला है… और दूसरी तरफ यह क्षोभ कि वह बीस साल मेरी मां का इस्तेमाल करके उसे नशे की हालत में मरने के लिए छोड़ गया है।… ’

बिल की आंखों में आंसू था… उन गीली आंखों और दर्द भरे दिल को क्या सलाह दूं… क्या मैं कभी उसकी कशमकश को समझ पाऊंगा?

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