ताज़ा खबर
 

ललित प्रसंगः सही जवाब की शिनाख्त

हम जो कुछ भी देख रहे हैं, देख पा रहे हैं, वह वास्तविकता नहीं है। वास्तविक नहीं है है। वह सब किसी की महत्त्वाकांक्षा है।

हमारी सभ्यता अभूतपूर्व संकट से आहत हो रही है।

सड़कों पर दूध बह रहा है। नहीं, दूध नहीं बह रहा है। फिर? आक्रोश बह रहा है। उफान बह रहा है। उबाल बह रहा है। ग्लानि बह रही है। हमारे देश में कुछ इलाकों में गर्व की बाढ़ है। कुछ इलाकों में ग्लानि की बाढ़। सारा देश बाढ़ग्रस्त हो रहा है। बहुत से लोग हैं, जो गर्व की बाढ़ में डूब रहे हैं। डूब-उतरा रहे हैं। बहुत-से लोग हैं, जो ग्लानि की बाढ़ में ऊभ-चूभ हो रहे हैं। अफना रहे हैं। अकुला रहे हैं। नाक में, आंख में, कान में पानी भरा आ रहा है। उबरने की सारी तरकीबों को आजमाते हुए डूबते जा रहे हैं। पानी गहरा है। धारा तेज है। बहाव प्रबल है।

बाढ़ तो बाढ़ है। घर के भीतर भी डूबना है। बाहर भी डूबना है। भागे तो भी डूबना है। न भागे तो भी डूबना है। बाढ़ विपदा है। सड़कों पर सब्जियां पटी हैं। फल पटे हैं। घर खाली है। पेट खाली है। जेब खाली है। गला भरा है। आवाज भरभरी है। दौड़ते-दौड़ते पांव भर गए हैं। बोलते-बोलते होंठ सूख गए हैं। जबान ऐंठ रही है। सपने जल-भुन रहे हैं। झुलस रहे हैं। झौंस रहे हैं। किसिम-किसिम के रंग, किसिम-किसिम के राग, किसिम-किसिम की रंगीनी राख होकर उड़ रही है। लाल-लाल चेहरों पर पसीने में भीगीं राख की कालिख कैसी भयावह है।

अफसोस है, हमारे समय के कैमरे सब कुछ को कैद करते हैं, कैद कर लेते हैं, मगर कालिमा को नहीं। हमारे समय की कालिख हमारे समय के कैमरों में नहीं उगती। उग भी नहीं सकती। कैमरे तो चेहरों की चमक दिखाने के लिए हैं। हमारा समय बड़ा विचित्र समय है। बड़ा विस्मयकारी समय है। वह हमें हमेशा विस्मित करता रहता है। सस्मित कभी नहीं करता। हमारे समय में कहने को तो आंख सबके पास है। मगर असल में आंख किसी के पास नहीं है। किसी की भी आंख अपनी आंख नहीं है। क्यों?

इसलिए कि आंखें जो कुछ भी देख रही हैं, वही प्राकृतिक नहीं है। सहज नहीं है। स्वतंत्र नहीं है। सारे दृश्य, सारे के सारे दृश्य प्रायोजित हैं। दूर की तो छोड़ें, हम नजदीक से नजदीक को भी अपनी आंख से देख पाने की सुविधा से वंचित हैं। हम अपने घर को, अपने आप को भी अपनी आंख से देखने के काबिल नहीं हर गए हैं। तो क्या हम आंखों के होते भी अंधे हो रहे हैं?

हां… हां… हां…। बड़ी भयानक आवाज कानों में गूंज उठती है। कलेजा कांप उठता है।

हम जो कुछ भी देख रहे हैं, देख पा रहे हैं, वह वास्तविकता नहीं है। वास्तविक नहीं है है। वह सब किसी की महत्त्वाकांक्षा है। महत्वाकांक्षा की उपज है। महत्वाकांक्षा की निर्मिति है। जो कुछ भी प्राकृतिक है, अप्राकृतिक से आच्छादित है। सचमुच कितना भयावह है। इससे भी भयावह यह है कि हम सारे भयावह को मनोरम की तरह देखकर मुग्ध हो रहे हैं। कभी-कभी लगता है, हमारी समूची उपलब्धि आधुनिकता के अभिशाप से आविष्टित उपलब्धि है।

हमारी सभ्यता अभूतपूर्व संकट से आहत हो रही है। जीवन के लिए जरूरी सारी चीजें बेहद प्रदूषित है। पानी प्रदूषित है, हर जगह प्रदूषित है, नगर में, गांव में, जंगल में। अब आदमी भला कैसे जिए? बिना पानी के जीवन कैसे संभाव है? और इधर पानी प्रदूषित है। हवा प्रदूषित है। प्यास बुझाना मुश्किल है। सांस लेना दूभर है। उधर हमारे समय का प्रदूषण हमारी सभ्यता का भूषण बन गया है। पानी को शुद्ध करने का भार कम्पनियों के कन्धे हम दे चुके हैं। पानी प्रकृति के हाथ से निकल कर कंपनियों के हाथ जा चुकी है। हवा कंपनियों के हाथ जाने को आकुल है। मनुष्य की मुकम्मल जिंदगी कंपनियों के हाथ गिरवी हो चुकी है। फिर भी हम अपनी सभ्यता के गुमान में इतरा रहे हैं। अपने दुर्भाग्य को अपनी शान समझने का ऐसा समय शायद पहले कभी नहीं था। मनुष्य को गुलाम बनाने की ऐसी आजादी इससे पहले कभी सुनने में नहीं आई थी। फिर भी…।

फिर भी हम बीस रुपए लीटर पानी और पंद्रह रुपए लीटर दूध की बाजार व्यवस्था में गर्व से जी रहे हैं। फिर भी हम कह नहीं सकते- ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।’ कैसी लाचारी है। कितनी बेबस जिंदगी है।

हमारे समय में वैद्य बीमार हंै। हवा विषैली है। पानी जहरीला है। नायक अंधा है। फिर भी हम आगे बढ़ रहे हैं। किस तरह आगे बढ़ रहे हैं? नहीं, यह प्रश्न नहीं पूछा जा सकता। किसी से नहीं। अपने से भी नहीं।

आज रात मैंने सपना देखा। इधर कई दिनों से नींद बिगड़ी हुई थी। आज वह आई थी। आई थी तभी तो सपना भी आया।

मैंने सपना देखा कि मेरे कॉलेज में मौखिकी परीक्षा हो रही है। विश्वविद्यालय से नामित परीक्षक महोदय आए हैं।

बारी-बारी से विद्यार्थी परीक्षा देने आ रहे हैं। परीक्षक महोदय ने प्रश्न पूछा है- ‘अमृत कहां रहता है?’

‘मेरे ठीक बगल में सर! अमृत उपाध्याय का मकान मेरे मकान से बिल्कुल सटा है।

‘बेवकूफ हो। मैं उस अमृत के बारे में पूछ रहा हूं, जिसे पीकर देवता अमर हैं।’

‘नहीं मालूम सर। पिछले महीने मेरे पिताजी मर गए। मालूम होता तो…।’

‘तुम जा सकते हो।’

‘जी चला जाता हूं।’

‘प्रिसिंपल साहब?’

‘जी सर!’

‘आपके कॉलेज में ठीक से पढ़ाई नहीं होती?’

‘होती है। पढ़ाई पूरी तरह से होती है। मगर बच्चे ही नहीं आते, तो…!’

‘आप सच कह रहे हैं। ज्यादातर कॉलेजों में ऐसा ही है। खैर…। बुलवाइए नेक्स्ट कैंडिडेट।’

‘जी अमृत चंद्रमा में रहता है।’ एक विद्यार्थी ने कहा

‘जी अमृत देवराज इंद्र के स्टोर हाउस में रहता है। दूसरे ने कहा।

‘जी अमृत, समुद्र में रहता है।’ तीसरे ने कहा।

‘जी, अमृत कामिनी के अधरों में रहता है।’ एक अन्य ने कहा। परीक्षार्थी आते रहे। बताते रहे। परीक्षक महोदय खीझते रहे। खीझ कर पासिंग मार्क्स देते रहे।

वह शायद अंतिम परीक्षार्थी था। आया। आकर सीधे परीक्षक महोदय के चरणों में अपना सिर धर दिया। फिर बार-बार उनके सिर सहलाने पर यत्नपूर्वक उठा।

‘जी अमृत थोड़ा-थोड़ा आपकी वाणी में और पूरा-पूरा राजा की वाणी में बसता है। वह शब्द-शब्द में झरता है सर। बूंद-बूंद। जो पी लेता है, सर! भाग्यशाली होता है। सुखी हो जाता है। सुविधा संपन्न हो जाता है। शक्ति संपन्न हो जाता है। देवता बन जाता है सर! अमर हो जाता है।’

परीक्षक महोदय का चेहरा खिल उठा। वे खिलखिला पड़े। ‘गुड… वेरी गुड…। लो, ले लो। हाइएस्ट मार्क्स लो। सुखी रहो।’

मुझे तसल्ली हुई। जाते-जाते परीक्षक महोदय को सही जवाब मिल गया।

मेरे मस्तिष्क में अचानक एक कविता की एक पंक्ति गूंज उठी- ‘सारे गलत लिखे के नीचे, निशान बने थे लाल सही के।’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App