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दुर्गा प्रसाद सिंह का लेख : दूर गांव में चटनी की महक

उपनिवेश काल में भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों से गन्ने के खेतों में काम करने के लिए कैरेबियाई देशों- फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद आदि में ले जाए गए मजदूरों के वंशजों ने आज भी अपनी संस्कृति को बचा कर रखा है। पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव पड़ने के बावजूद उनके गीत-संगीत में भोजपुरी का प्रभाव बना हुआ है। इसका जीवंत उदाहरण वहां प्रचलित चटनी संगीत है। कैरेबियाई देशों में भारतीय संस्कृति के विस्तार और चटनी संगीत के उदय के बारे में बता रहे हैं- दुर्गा प्रसाद सिंह।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 12:57 AM
1970 में चटनी संगीत में बड़ा बदलाव तब आया, जब कैरेबियाई गायक सुंदर पापो ने ‘नानी-नाना’ गीत गाया। यह गीत त्रिनिदाद ही नहीं, गयाना, जमैका, सूरीनाम और अन्य कैरेबियन देशों में बेहद लोकप्रिय हुआ।

किसी देश या समाज की संस्कृति उसमें रहने वाले लोगों के दिल और दिमाग में बसती है।’ सात समंदर पार कैरेबियन ईस्ट इंडियन समुदाय का इतिहास गांधी के इस कथन को बखूबी चरितार्थ करता है। गुलामी प्रथा के अंत ने दुनिया के उपनिवेशों में गिरमिटिया प्रथा की नई शुरुआत की। 1845 में कलकत्ता से जो समुद्री जहाज फतेह-उल-रज्जाक कैरेबियाई देश त्रिनिदाद के लिए रवाना हुआ, उसने ईस्ट-इंडियन समुदाय के अनुबंधित मजदूरों के प्रवास का नया सिलसिला शुरू किया। ये अनुबंधित मजदूर अपने साथ लाई गठरी में ऐसा कुछ नहीं लाए थे, जिससे वे अपनी संस्कृति को जिंदा रखते। अगर कुछ साथ था तो अपनी ‘संस्कृति की स्मृतियां’। आज लगभग दो सौ साल बाद भी कैरेबियाई भारतीय डायस्पोरा ने अपनी संस्कृति को जिस जज्बे से जिंदा रखा, वह इस बात का गवाह है कि स्मृतियां दुनिया की तमाम भौतिक चीजों से ज्यादा गहरी और स्थायी होती हैं।

ऐतिहासिक नजरिए से दुनिया में भारतीय डायस्पोरा के प्रवासन की दो धाराएं हैं। एक धारा, जो औपनिवेशिक प्रक्रिया के दौरान कैरेबियन, फिजी, मॉरीशस और अफ्रीका जैसे सुदूर देशों में बसी। दूसरी धारा बीसवीं शताब्दी के उन प्रवासी भारतीयों की है, जो आर्थिक बेहतरी की आकांक्षा लेकर यूरोप और अमेरिका में बसे। दोनों धाराओं में भिन्नता के बावजूद कई समानताएं भी हैं। समानता की सबसे अहम जमीन है ‘अस्मिता’। आज भारतीय डायस्पोरा की आर्थिक समृद्धि के साथ ‘अस्मिता’ का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो गया है।

कैरेबियाई देशों में त्रिनिदाद-टोबैगो, सूरीनाम और गयाना में आज भी भारतीय डायस्पोरा ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को किसी न किसी रूप में कायम रखा है। यह देश अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के कारण बेहद दिलचस्प है। यहां भारतीय, अफ्रीकी और चीनी, इंडोनेशियाई समुदाय के साथ सभी महाद्वीप के लोग रहते हैं। इनके मेल से एक खास तरह की कैरेबियाई संस्कृति बनी है। यह जानना दिलचस्प है कि कैरेबियाई संस्कृति में अफ्रीकी संस्कृति की परंपराओं ने अपनी पहचान कैसे खो दी, जबकि भारतीय संस्कृति की तमाम परंपराएं न सिर्फ कायम रहीं, बल्कि उन्होंने नए सांस्कृतिक प्रतीक भी निर्मित किए।

कैरेबियाई देशों में भारतीय संस्कृति की निरंतरता का इतिहास बेहद दिलचस्प है। कैरेबियाई देशों में भारतीय डायस्पोरा की सांस्कृतिक एकरूपता इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि अफ्रीकी डायस्पोरा से अलग भारतीय अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को बचा और सहेज पाए। इस सांस्कृतिक निरंतरता का एक पक्ष यह है कि कैरेबियाई देशों में भारत के विभिन्न प्रदेशों से आए अलग-अलग भाषा बोलने वाले बहुसंख्यक भोजपुरी भाषा में समाहित हो गए। भारतीय मजदूरों (गिरमिटिया) और उससे पहले के अफ्रीकी गुलामों के बीच सबसे बड़ा फर्क था अपनी भाषा और परिवार के साथ रहने की आजादी। औपनिवेशिक युग के गुलाम प्रथा के दौर में समान भाषा और संस्कृति वाले अफ्रीकियों को साथ नहीं रखा जाता था। इसका कारण था कि समान भाषा और संस्कृति वाले अफ्रीकी सामुदायिक एकता से अपने मालिक के लिए खतरा बन सकते थे। औपनिवेशिक काल के भारतीय मजदूर अपनी भाषा (भोजपुरी) बोलते हुए साथ रहते थे। यही कारण है कि कैरेबियन ईस्ट इंडियन समुदाय में भाषा और संस्कृति की निरंतरता कायम रही।

आरंभिक भारतीय मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरीभाषी क्षेत्रों से आए और उन्हें साथ काम करने का मौका मिला, परिणामस्वरूप उनके संवाद की भाषा भोजपुरी ही रही। बाद के दिनों में जब ब्रिटिश भारत के दूसरे क्षेत्रों जैसे बंगाल और तमिलनाडु से अनुबंधित मजदूर लाने लगे तब तक भोजपुरी ग्रेट-ट्रेडिशन बन चुकी थी। बाद में आने वाली बांग्ला और तमिल की लिटिल ट्रेडिशन ने भोजपुरी में अपनी पहचान खो दी।

वहां पहुंचे ज्यादातर अनुबंधित मजदूर ग्रामीण थे। समान सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण वे शुगर-स्टेट के बैरक में भी अपनी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और त्योहारों को जारी रख सके। इस निरंतरता का सबसे बड़ा कारण था भाषा। 1845 के बाद शुगर-स्टेट में अफ्रीकी मूल के लोगों की संख्या नगण्य हो चुकी थी। इसलिए किसी अन्य संस्कृति के प्रभाव की संभावना कम होती गई। 1890 के बाद गन्ना उगाने की व्यावसायिक संभावनाओं के कम होने और अनुबंध की समाप्ति के कारण भारतीय मजदूर वहां से निकल कर दक्षिण त्रिनिदाद में बसने लगे। गंगा के मैदान से आने वाले मजदूरों ने शुगर-स्टेट के पास के मैदानी इलाकों में बसना पसंद किया। इन बस्तियों ने बाद में कैरोनी, फैजाबाद, बरकपुर जैसे भारतीय गावों का रूप ले लिया। ये नाम उन्हें भारत की स्मृतियों को संजोने का काम करते थे। भारतीय गांव की याद ताजा होने के कारण उनकी बसावट भी भारतीय गांवों जैसी हुई। यही हाल सूरीनाम का भी था, लेकिन अंतर केवल इतना था कि वह ब्रिटिश नहीं, बल्कि एक डच उपनिवेश था।

बोन्हम एच रिचर्डसन ने 1890 से 1910 के बीच बसने वाले दो गांवों देबे और बेजुकल के अध्ययन में बताया कि 1920 तक इन गावों की सौ फीसद आबादी भारतीय थी। यहां आकर भारतीय वही खेती करने लगे, जो उनका सदियों पुराना कौशल था। चूंकि ग्रामीण समुदाय में संस्कृति के साझेपन की परंपरा होती है, इसलिए त्रिनिदाद के ईस्ट इंडियन गांव इसके अपवाद नहीं थे। शादी-विवाह, त्योहार से लेकर पारिवारिक मूल्य भी भारतीय बने रहे। इस दिलचस्प मोह के कारण त्रिनिदाद में शादी-विवाह, जन्म के भारतीय कर्मकांड और परंपराएं कायम रहीं, जिसकी अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा इन अवसरों पर गाए जाने वाले गीत और गानों में दिखाई पड़ती है।

कैरेबियाई देशों- फिजी, सूरीनाम की तरह त्रिनिदाद में भोजपुरी का प्रभाव सिर्फ भाषा के स्तर पर नहीं, बल्कि यहां के सांस्कृतिक विस्तार में भी दिखाई देता है। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के कारण ईस्ट इंडियन समुदाय में परिवार की मजबूत बुनियाद आगे चल कर उनके शैक्षिक विकास का आधार भी बनी, लेकिन सामाजिक विकास में होने वाले परिवर्तनों का गहरा प्रभाव कैरेबियाई देशों की भोजपुरी संस्कृति और भाषा पर भी पड़ा।

लेकिन भोजपुरी के लोकगीत, कहानियां, परंपरा और संगीत ने जिन भारतवंशियों की सामुदायिक अस्मिता को आधार दिया, वही भाषा आगे चल कर उन्हें अपनी शैक्षिक उन्नति में बाधा लगने लगी। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में ईसाई मिशनरियों ने औपचारिक शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए अंगरेजी भाषा को माध्यम बनाया। गुलाम प्रथा के खत्म होने के कारण अफ्रीकी मूल के लोग शहरों में बसने लगे थे। नतीजतन उन्हें शिक्षित होने का अवसर भी पहले मिला। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक गन्ने की खेती खत्म होने लगी, लेकिन भारतीय मूल के लोग गन्ने के खेतों से निकल कर दक्षिणी त्रिनिदाद के ग्रामीण परिवेश में बस गए। यही समय था, जब उन्होंने वैकल्पिक आजीविका की तलाश में शिक्षा पर ध्यान देना शुरू किया। इसी क्रम में उन्होंने अंगरेजी भाषा के महत्त्व को महसूस किया, क्योंकि ब्रिटिश उपनिवेश के कारण शिक्षा का माध्यम अंगरेजी ही थी। अंगरेजी सीखने की जल्दी में उन्होंने अगली पीढ़ी से भोजपुरी में संवाद बंद कर दिया। भोजपुरी ‘संवाद से गोपनीय जीवन की भाषा’ बन गई, जिसमें माता-पिता आपस में संवाद किया करते थे। नतीजतन, भोजपुरी बोलने-समझने वालों की संख्या तेजी से कम होती गई। अगले दो दशकों में भोजपुरी लोक परिदृश्य से लुप्त हो चुकी थी और जो बचा रह गया वे थे धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन के पारिभाषिक शब्द, जो आज भी कायम हैं।

कैरेबियन में भारतीय संस्कृति की निरंतरता का दायरा लंबा है, इसीलिए यहां भोजपुरी के प्राचीन कलेवर सोहर, गारी से लेकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत तक या बॉलीवुड से लेकर चटनी का नया प्रचलन साथ-साथ देखा जा सकता है। चाहे कोई त्योहार हो या उत्सव, पूजा हो या कार्निवल, सभी पर भारतीय संस्कृति के किसी न किसी आयाम की झलक मिल जाती है। ‘चटनी संगीत’ उन्हीं में से एक है।

द क्षिणी कैरेबियाई देशों में ‘चटनी’ एक व्यंजन नहीं, बल्कि यहां का लोकप्रिय संगीत है। कैरेबियाई भारतीय समुदाय में अपनी भाषा खत्म होने की प्रक्रिया में सांस्कृतिक अभाव तो बढ़ा, पर इसी पृष्ठभूमि में ‘चटनी’ जैसे सांस्कृतिक प्रतीक की उत्पत्ति भी हुई। त्रिनिदाद का यह विरोधाभास कई मायनों में दिलचस्प है, क्योंकि यहां भोजपुरी ‘संवाद’ से कल्चरल डोमेन कि भाषा हो गई है। यह सब इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि त्रिनिदाद के भारतवंशी समुदाय को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से लगाव था।

ईस्ट इंडियन समुदाय में ‘चटनी’ के विकास की कहानी बेहद दिलचस्प है। 1962 तक भारतीय समुदाय के लोग खेतों के पास सामूहिक रूप से रहा करते थे। भोजपुरीभाषी होने और अन्य समुदायों से अलग रहने के कारण कैरेबियाई ईस्ट इंडियन समुदाय में पारंपरिक भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा प्रचलित थी। शादी-विवाह, जन्म और धार्मिक अवसरों पर भोजपुरी कजरी, सोहर, गारी, चैती और झूला जैसे खास अवसरों पर ये लोकगीत गाए जाते थे। त्रिनिदाद, सूरीनाम, गयाना के लोक परिदृश्य में भी संगीत के नाम पर प्राय: धार्मिक और रामचरितमानस का गायन हुआ करता था। त्रिनिदाद या कैरेबियन में ‘चटनी’ के लोकप्रिय होने का समय वही है जब ईस्ट इंडियन समुदाय मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश कर रहा था। इन कोशिशों में अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित करने, अंगरेजी सिखाने की कोशिश शामिल थी। इन सभी के साथ भारतीय परंपरा को जारी रखने की चाह से जो विरोधाभास उभरा उसकी अभिव्यक्ति ‘चटनी’ संगीत है। पारंपरिक भोजपुरी लोकगीतों की धीमी लय और ताल की जगह ‘चटनी’ संगीत में लय और बीट तेज होते थे।

चटनी संगीत में जब नयापन आया तो सभी के साथ इस नए किस्म के संगीत में वाद्य भी नए थे। ढोलक, हारमोनियम, करताल, धनताल, मजीरा आदि के नए सुर लोगों को भाने लगे। आरंभिक दिनों में ‘चटनी’ के बोल में हिंदी और अंगरेजी क्रियोल का मिश्रण होता था। भोजपुरी लोकगीतों से अलग ‘चटनी’ की धुन तेज हुआ करती थी। जैसे-जैसे ‘चटनी’ लोकप्रिय होकर भारतीय डायस्पोरा के दायरे से बाहर निकली वैसे-वैसे इसमें नए प्रयोग होने लगे। इसमें भारतीय वाद्यों के साथ गिटार, सिंथेसाइजर, स्टील पैन और ड्रम का प्रयोग होने लगा। शुरू के गीतों में भोजपुरी वाक्यों में अंगरेजी के शब्द होते थे, लेकिन धीरे-धीरे अंगरेजी के शब्द बढ़ते गए और वाक्य का ढांचा अंगरेजी का हो गया और उसमें शब्द हिंदी के। दरअसल, ‘चटनी’ की तेज धुन पूर्वी-पश्चिमी वाद्यों के मिश्रण के साथ चटखारे बोल के कारण इसकी तुलना ‘चटनी’ से होने लगी और यही नाम भी हो गया।

कैरेबियाई भारतीय समुदाय की स्त्रियों की महफिलों में पुरुषों का जाना वर्जित था। यही वजह है कि ‘चटनी’ संगीत का कैरेबियाई देशों की मुख्यधारा में प्रचलन भारतीय समुदाय के आने के सवा सौ साल बाद हुआ। इसके अलावा विश्व संगीत के इतिहास में उन दिनों कैरेबियन-कैलिप्सो लोकप्रियता के चरम पर पहुंच चुका था और लोग कैलिप्सो से ऊबने लगे थे। ऐसे में ‘चटनी’ संगीत ने उस खाली जगह को भरा। ‘चटनी’ न सिर्फ भारतीय समुदाय के लोगों में लोकप्रिय हुई, बल्कि इसने कैलिप्सो को भी प्रभावित किया। कैलिप्सो पर ‘चटनी’ के प्रभाव से ‘चटनी-सोका’ की नई परंपरा शुरू हुई।

1970 में चटनी संगीत में बड़ा बदलाव तब आया, जब कैरेबियाई गायक सुंदर पापो ने ‘नानी-नाना’ गीत गाया। यह गीत त्रिनिदाद ही नहीं, गयाना, जमैका, सूरीनाम और अन्य कैरेबियन देशों में बेहद लोकप्रिय हुआ। सुंदर पापो वही शख्स हैं, जिनके गाने ‘फुलौरी बिना चटनी कईसे बनी’ को बबला ने भारत में गाकर लोकप्रियता हासिल की थी। 1970 में पापो का गीत ‘नाना ड्रिंकिंग वाइट रम नानी ड्रिंकिंग वाइन’ शादी, पार्टी, कार्निवाल या पब में बजते-बजते सभी की जुबान पर चढ़ गया। सुंदर पापो ने इसके बाद हिंदी गायन को अपना कैरियर बना लिया।

कैरेबियाई देशों में सूरीनाम ही ऐसा देश है, जहां आज भी भोजपुरी पटवा आम बोलचाल की भाषा है। कहा जाता है कि त्रिनिदाद से अलग सूरीनाम एक डच उपनिवेश था और डच भाषा का सांस्कृतिक वर्चस्व अंगरेजी से अलग था। इसके अलावा वहां कनाडाई चर्च स्कूलों की अंगरेजी की अपरिहार्यता वाले कारण मौजूद नहीं थे। 1958 में सूरीनाम के रामदेव चैतू ने ‘किंग आॅफ सूरीनाम’ नाम का एलबम निकाला, जिसमें उनका बेहद लोकप्रिय गीत ‘रात के सपना’ भी था।

1968 में सूरीनाम की ही द्रुपदी का ‘एलबम शादी के गीत’ आया था। इसके दो गाने गौरी पूजा और लावा लोकप्रिय हुए थे। लेकिन ये धार्मिक गीत थे और इसकी लोकप्रियता सीमित थी। रामदेव और द्रुपदी के अनेक एलबम कैरेबियन से लेकर उत्तरी अमेरिका और यूरोप में लोकप्रिय हुए। बाद के दिनों में सूरीनाम के संगीत परिदृश्य में क्रिस रामखेलावन एक लोकप्रिय कलाकार के रूप में उभरे। अपने आरंभिक दिनों में रामखेलावन पारंपरिक लोक-स्मृति के लोकगीतों के अलावा धार्मिक गीत गाते थे, लेकिन बाद में उन्होंने कुछ अनूठे प्रयोग किए। उन्होंने पारंपरिक भारतीय वाद्यों की बीट को तेज करने के अलावा पश्चिमी पॉप-संगीत वाद्यों का रचनात्मक इस्तेमाल किया। इस तरह चटनी में एक नई ताजगी आई और वे कैरेबियन के बेहद लोकप्रिय कलाकार बन गए।

चटनी सिर्फ कैरेबियन तक सीमित नहीं रहा। 1996 में ‘कलकत्ता वुमन’ अमेरिका और यूरोप के ‘पॉप चार्ट’ में रिलीज होते ही जबर्दस्त हिट हुआ और पश्चिम में इस नए किस्म के संगीत के लिए उत्सुकता बढ़ी। इसे ‘चटनी’ के इतिहास की बड़ी घटना माना जाता है। इसी समय त्रिनिदाद के संगीत परिदृश्य में तेजी से बदलाव आ रहा था। ‘कैलिप्सो’ की लोकप्रियता कम हो रही थी और ‘सोका’ संगीत तेजी से उभर रहा था। अमेरिकी लय और ब्लू के प्रभाव से ‘चटनी’ भी अछूता नहीं रहा और कैरेबियाई संगीत की एक नई धारा चल निकली, जिसे ‘चटनी’ सोका के नाम से जाना गया।

कैरेबियाई चटनी हिंदी सिनेमा में भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा है। ‘फुलौरी बिना चटनी’ के पारंपरिक चटनी कलेवर से लेकर हाल ही में आई फिल्म ‘गैंग आॅफ वासेपुर’ का गाना ‘आई एम अ हंटर’ चटनी सोका का नया रूप भारत में भी लोकप्रिय है।

दरअसल ‘चटनी’ ने एक ओर जहां भारतीय संगीत परंपरा और मूल्यों को शानदार अभिव्यक्ति दी, वहीं पुराने मूल्यों के प्रति विद्रोह भी व्यक्त किया। ‘चटनी’ संगीत में बीट, भाषा और वाद्य का ही नयापन नहीं था, बल्कि जिन मुद्दों कि अभिव्यक्ति हुई, वे भी नए थे।

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