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अवसर: संस्कृत साहित्य के भगीरथ

मोनियर के संस्कृत प्रेम की कहानी रोचक है। कहा जाता है कि मुंबई में बचपन के दिनों में उनका संपर्क संस्कृत के एक शिक्षक से हुआ। वेद और उपनिषद की बातें मोनियर को सुहाने लगीं, लेकिन उन्होंने उनसे विधिवत संस्कृत नहीं सीखी।

Author Published on: November 10, 2019 5:48 AM
मोनियर विलियम्स

शास्त्री कोसलेंद्रदास

जब संस्कृत पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं, उसकी प्रासंगिकता को बार-बार नकारा जा रहा है, ऐसे में मोनियर विलियम्स की जन्म-द्विशती का आना संस्कृत की अमर चेतना को जागृत करने का अवसर है। आधुनिक भोग-विलासी संस्कृति, जिसे ‘वैज्ञानिक संस्कृति’ भी कहा जाता है, उसे भी मोनियर विलियम्स की अनिवार्यता लगेगी कि उन्होंने संस्कृत को क्यों चुना और वे उसे क्यों बढ़ाना चाहते थे!

उन्होंने भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंध पर किए अध्ययन में पाया कि कोई भी भारतीय भाषा संस्कृत से शब्द उधार लिए बिना धर्म और विज्ञान के विचारों को व्यक्त करने में असमर्थ है। चाहे वह तमिल हो, तेलुगु हो या बांग्ला। समूचा साहित्य संसार बारह नवंबर को जिस अप्रतिम प्रतिभा से संपन्न विद्वान की दूसरी जन्म शताब्दी मना रहा है, वे हैं मोनियर विलियम्स। उन जैसा बहुमुखी साहित्य रचने वाला बहुश्रुत व्यक्ति संस्कृत में अब शायद ही आए। 12 नवंबर, 1819 को मुंबई में जन्मे मोनियर विलियम्स जिस अपूर्व कार्य के लिए जाने जाते हैं, वह है उनके द्वारा संकलित ‘अंग्रेजी और संस्कृत शब्दकोश’।

संस्कृत साहित्य के मौजूदा इतिहास में मोनियर विलियम्स का बनाया संस्कृत शब्द-संग्रह अभूतपूर्व है। पर उनके साहित्य का विस्तार बहुआयामी है। शोध, अनुवाद और रचनात्मक साहित्य की दृष्टि से वे आधुनिक संस्कृत में अनुपम हैं। सिर्फ संस्कृत नहीं, बल्कि विश्व-स्तर पर पुरातन साहित्य और वैदिक संस्कृति की जब बात होती है तो निस्संदेह मोनियर विलियम्स की लिखी पुस्तकें उपहार के तौर पर स्वीकार की जाती हैं। मोनियर विलियम्स ने महाकवि कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ का 1849 में और ‘अभिज्ञान-शाकुंतलम्’ का 1853 में अंग्रेजी अनुवाद किया। मोनियर ने हिंदी व्याकरण पर भी कार्य किया। तीन पुस्तकें हिंदी भाषा पर लिखीं।

मोनियर विलियम्स ने न केवल मन लगा कर संस्कृत सीखी, बल्कि संस्कृत को पूरे जीवन साथ रखा। संस्कृत की साधना की। इसी साधना के परिणाम स्वरूप वे ग्रंथ आए, जो आज भी उनकी अमर कीर्ति के रूप में हमारे बीच हैं। उन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों और शब्दों को अनुवाद में ढाला। कितने सुखद आश्चर्य की बात है कि संस्कृत को आधुनिक जगत से जोड़ने के लिए मोनियर ने डेढ़ शताब्दी पहले अंग्रेजी और संस्कृत के विशाल शब्दकोश का संपादन किया। हालांकि इससे पहले दो जर्मन विद्वान, रॉथ और बॉथलिंग संस्कृत और जर्मन भाषा के शब्दों का संकलन पांच खंडों में कर चुके थे। रूस के शासकों के आर्थिक अवदान से मुद्रित होने के नाते वह शब्दकोश ‘सेंट पीटर्सबर्ग डिक्शनरी’ कहा जाता है। इसे मोनियर विलियम्स ने भी देखा, जिसे पढ़ कर उन्होंने सोचा कि इस विस्तृत शब्दकोश के स्थान पर एक नया संपूर्ण शब्दकोश होना चाहिए, जिसमें संस्कृत का संबंध जर्मन के बजाय अंग्रेजी से हो। वे पूरे मन से इस काम में जुट गए।

लंबी मेहनत के बाद उनका शब्दकोश सामने आया। इसका पहले-पहल प्रकाशन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 5 नवंबर, 1851 को किया। इस कोश में एक लाख अस्सी हजार शब्द हैं। इसकी खासियत है कि इसमें संस्कृत के दोनों प्रकार, वैदिक और लौकिक के शब्द संकलित हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। ‘अमरकोश’ जैसे पुराने शब्दकोशों में लौकिक संस्कृत के शब्द हैं। पिछली शताब्दी के वामन शिवराम आप्टे ने भी प्राय: वैदिक शब्दों को अपने शब्द-संग्रह में शामिल नहीं किया। इस नाते कहा जा सकता है कि संस्कृत का पहला और अंतिम शब्दकोश मोनियर विलियम्स ने ही तैयार किया। इतना ही नहीं, मोनियर ने संस्कृत के शब्दों के साथ उनका संदर्भ भी जोड़ा। बाद में 1899 के आसपास संस्कृत से अंग्रेजी शब्दकोश का प्रकाशन भी उनके नाम से हुआ, जो अनूठा है।

मोनियर के संस्कृत प्रेम की कहानी रोचक है। कहा जाता है कि मुंबई में बचपन के दिनों में उनका संपर्क संस्कृत के एक शिक्षक से हुआ। वेद और उपनिषद की बातें मोनियर को सुहाने लगीं, लेकिन उन्होंने उनसे विधिवत संस्कृत नहीं सीखी। इसी दौरान मोनियर दस साल की उम्र में मुंबई से इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने संस्कृत समेत दूसरी एशियाई भाषाएं सीखीं। वे पढ़ाई पूरी करने के बाद 1844 में ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज, कोलकाता में एशियाई भाषा विभाग में शिक्षक बन गए। उन्होंने एशियाई भाषाओं संस्कृत, फारसी और हिंदुस्तानी का अध्ययन और अध्यापन किया। 1857 के विद्रोह के बाद भारत में कंपनी शासन समाप्त होने के बाद वे आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में स्थापित संस्कृत अध्ययन पीठ पर बोडेन प्रोफेसर बने।

मोनियर विलियम्स के आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में बोडेन प्रोफेसर बनने का किस्सा बहुत मजेदार है। लेफ्टिनेंट कर्नल जोसेफ बोडेन ने 1832 में भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवानिवृत्त होने के बाद अपना सारा धन आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को दे दिया। इससे एक संस्कृत अध्ययन पीठ की स्थापना हुई। शुरुआती दो प्रोफेसर चुनाव से नियुक्त हुए। पहले होरेस हेमैन विल्सन और दूसरे थे मोनियर विलियम्स।

होरेस हेमैन विल्सन के निधन के बाद मोनियर विलियम्स ने बॉडेन प्रोफेसरशिप चुनाव के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने ब्रिटिश-शासित भारत में संस्कृत पढ़ाने में चौदह साल बिताए थे। उनका सामना उस दौर के जर्मन में जन्मे विख्यात भाषाविज्ञानी मैक्समूलर से था, जिन्होंने ऋग्वेद पर गहरा अनुसंधान करके अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की थी। विश्वव्यापी प्रतिष्ठा के दोनों विद्वानों ने यह प्रोफेसरशिप पाने के लिए भरपूर चुनावी प्रयास किया। दोनों के अपने-अपने चुनावी दावे थे। मैक्समूलर अपने काम को ऐतिहासिक बता रहे थे, वहीं मोनियर ने अपने शब्दकोश सहित दूसरे अकादमिक कार्यों को भारत को जानने का साधन बताया। यह अप्रिय सत्य है कि मोनियर ने अपने चुनावी प्रचार में यह दावा भी किया था कि भारत में ईसाई धर्म के विकास के लिए संस्कृत पढ़ना और समझना बेहद जरूरी है। उनके कार्य से मिशनरियों को फायदा होगा और वे उनके अनुवाद की सहायता से भारतीयों का धर्मांतरण आसानी से कर सकेंगे। 30 नवंबर, 1860 को मोनियर ने अपने पक्ष में चुनावी पत्र बंटवाया। इस पत्र में लिखा था, ‘प्रोफेसरशिप केवल आॅक्सफोर्ड के लिए नहीं है। यह भारत के लिए है। यह ईसाई धर्म के कल्याण के लिए है।’

7 दिसंबर, 1860 को हुए चुनाव में सैंतीस सौ स्नातक मतदाता थे, जिसमें 1443 शामिल हुए। 223 वोटों से मैक्समूलर को हरा कर मोनियर ने चुनाव जीता और बोडेन प्रोफेसर पद पा लिया। नियुक्ति के बाद विलियम्स ने कहा, ‘भारत में ईसाई धर्म का प्रचार यहां के विद्वानों के उद्देश्यों में से एक होना चाहिए।’ 1883 में मोनियर विलियम्स ने आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय धर्म अध्ययन केंद्र की स्थापना की। इस परियोजना के वित्तपोषण के लिए उन्होंने 1875, 1876 और 1883 में भारत की यात्राएं की। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद यह केंद्र बंद हो गया।

मोनियर विलियम्स ने अपने लंबे जीवन में बहुत कुछ लिखा है। सर्वत्र और सभी कुछ से सहमत होना असंभव है। उनके लेखन का विपुल अंश आवेग और धर्म-प्रचार से आविष्ट रहा है। ऐसी बातें तात्कालिक उपयोग की हो सकती हैं। पर बदलते संदर्भों के परिवर्तित घटनाक्रमों में अब उनकी कही सारी बातें सार्थक नहीं रह गई हैं। पक्षधर और प्रतिबद्ध लेखन में ये सामयिक दोष आ ही जाते हैं। पर इसके बावजूद जो बहुत कुछ बच जाता ह,ै जो अत्यंत महार्घ, अमूल्य और अतुलनीय है।
लंबे शोध के बाद मोनियर विलियम्स ने एक निष्कर्ष निकाला। उन्होंने लिखा, ‘हिंदू धर्म की अच्छाइयों का वर्णन कभी पूरा नहीं हो सकता, यह बहुरंगी धर्म हर धार्मिक और दार्शनिक विचार का स्पर्श करता है, जिसे दुनिया जानती ही नहीं है।’ मोनियर विलियम्स सनातन भारतीय धारा के अभिनव ऋषि हैं, संस्कृत साहित्य के भगीरथ हैं। कदाचित मोनियर विलियम्स ही हैं, जो प्राय: गहरी निद्रा में सोए संस्कृत के मौजूदा वातावरण में आधुनिकता की अलख जगा सकते हैं। जब संस्कृत पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं, उसकी प्रासंगिकता को बार-बार नकारा जा रहा है, ऐसे में मोनियर विलियम्स की जन्म-द्विशती का आना संस्कृत की अमर चेतना को जागृत करने का अवसर है। आधुनिक भोग-विलासी संस्कृति, जिसे ‘वैज्ञानिक संस्कृति’ भी कहा जाता है, उसे भी मोनियर विलियम्स की अनिवार्यता लगेगी कि उन्होंने संस्कृत को क्यों चुना और वे उसे क्यों बढ़ाना चाहते थे!

 

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