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प्रसंग: समृद्ध होती हिंदी

2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बताते हैं कि हिंदी भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या में करीब दस करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई, जो 25.19 प्रतिशत है।

hindi diwas, hindi diwas speech, hindi diwas 2019, hindi diwas speech in hindi, hindi diwas quotes, hindi diwas poem, hindi diwas kavita, hindi diwas slogans, hindi diwas bhasan14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और वर्ष 1953 से हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत हुई।

ऋतुपर्ण दवे

भाषा का आर्थिक स्थिति से सीधा संबंध होता है। जो समृद्ध देश हैं उनकी भाषा के पंख भी बड़े तेज होते हैं। इसलिए दुनिया के सारे लोग उसे सीखना चाहते हैं। इसकी वजह कारोबार में आसानी भी है। भाषा की ताकत इसी से समझी जा सकती है कि अगर कोई विदेशी आपकी भाषा में केवल नमस्ते कर ले तो उससे तत्काल गहरा जुड़ाव हो जाता है। निश्चित रूप से यह ताकत सिर्फ भाषा में ही होती है।’ प्रधानमंत्री ने यह बात आज से चार साल पहले उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान भारतीय मूल के विद्यार्थियों और निवासियों को संबोधित करते हुए कही थी। उनका इशारा साफ-साफ हिंदी भाषा को लेकर था। लेकिन क्या आजादी के तिहत्तर बरस बाद भी हम भारत में हिंदी को वह सम्मान दिला पाए हैं, जिसकी वह हकदार है? इसका उत्तर न में है, क्योंकि जहां अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है, वहीं हिंदी बोलने में हीनता महसूस करते हैं। यह भी नहीं पता कि कब हम इस मानसिकता को पूरी तरह से दूर कर पाने में सफल होंगे?

दुनिया भर में तमाम दार्शनिक, लेखक और विचारक भी मानते हैं कि जहां भाषाएं अलग हैं वहां देश भी बंटा होता है। प्रसिद्ध जर्मन विचारक और दार्शनिक योहान गॉटलिप फिटे ने भी भाषा की साझा कड़ियों पर काफी जोर दिया और माना कि जहां भाषाएं अलग होती हैं, वहां राष्ट्र भी धड़ेबाजी का शिकार होता है। उनका मानना है कि ‘एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को प्रकृति भी कई अदृश्य कड़ियों के जरिए एक-दूसरे से बांध देती है। किसी भी मानवीय कला के आने से पहले ही वे एक-दूसरे को समझते भी हैं और अधिक से अधिक स्पष्ट तरीके से समझा भी देते हैं।’ जाने-माने भाषाविज्ञानी एडवर्ड सैपिर भी मानते हैं कि ‘एक जैसी भाषा उन लोगों के बीच सामाजिक एकजुटता का खास संकेत बन जाती है, जो उस भाषा को बोलते हैं।’ इस तरह भाषा देश को जोड़ने के साथ ही सांस्कृतिक भाईचारे को विकसित करने में मदद करती है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है, जो दुनिया भर में तीसरे क्रम पर सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिंदी को वह सम्मान या रुतबा आज तक नहीं मिल पाया है जिसकी वह काफी पहले से हकदार है।

दुनिया में कितनी भाषाएं हैं इसके भी बड़े रोचक आंकड़े हैं और इन्हीं में छिपा है हिंदी का वजन। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में बोली जाने वाली भाषाओं की अनुमानित संख्या 6809 है। इसमें नब्बे फीसद भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से भी कम है। वहीं लगभग डेढ़ से दो सौ भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें दस लाख से ज्यादा लोग बोलते हैं। अंग्रेजी को लेकर एक भ्रम रहता है कि दुनिया की सबसे अधिक बोले जानी वाली भाषा है। ऐसा नहीं है, वास्तव में चीन की मंडारिन, जिसे आमतौर पर मंदारिन भी कहते हैं अकेली ऐसी भाषा है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा 1.12 अरब लोगों द्वारा बोली जाती है। इसके बाद दूसरे क्रम पर स्पेनिश तथा तीसरे क्रम पर अंग्रेजी आती है। अगर इसे एक भाषाई विविधता के रूप में देखें और उर्दू मिली हिंदी बोलने वालों को छोड़ दें, तो मंडारिन, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद हिंदी दुनिया की चौथी सबसे बोली जाने वाली पहली भाषा है, लेकिन उर्दू जुबान के साथ बोली जानी वाली उर्दू मिली हिंदी को भी जोड़ लें तो पाते हैं कि यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।

2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बताते हैं कि हिंदी भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या में करीब दस करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई, जो 25.19 प्रतिशत है। भारत में सबसे ज्यादा करीब बावन से पचपन करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं यानी हिंदी को मातृ भाषा के रूप बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अभी दुनिया में हिंदी के तीसरे और चौथे क्रम को लेकर भी भ्रम बना रहता है, जो 2021 की जनगणना के बाद निश्चित रूप से छंट जाएगा और हिंदी दुनिया में तीसरे क्रम पर बोली जाने वाली भाषा के रूप में अपनी धमक दर्ज कराएगी।

यह भी फख्र की बात है कि हमारे संविधान में बाईस आधिकारिक भाषाएं शामिल हैं, जिसमें एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले भारत में हिंदी भाषियों का प्रतिशत इकतालीस है, जो अगली जनगणना आंकड़ों में पचास या ऊपर भी जा सकता है। यही हिंदी के वजूद को समझने के लिए काफी है। ऐसे में हिंदी को देश की संपर्क भाषा बनाए जाने में हर्ज क्या? इस बात पर गर्व भी है कि हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा होने के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर में भी बोली जाती है, वहीं न्यूजीलैंड में हिंदी वहां की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली चौथी भाषा है। यह सब हिंदी का दबदबा बताने को काफी है। रोमांचित करने वाला सच है यह भी है कि दुनिया में भारत अकेला देश है, जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। विविधताओं और विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के देश भारत में चार सौ इकसठ भाषाएं बोली जाती हैं। उसमें भी हिंदी का प्रतिशत लगभग पचास है। जिस पर गर्व के बजाए हम स्वतंत्रता के तिहत्तर वर्षों के बाद भी हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पाए हैं।

हिंदी को लेकर पूरे देश में एक आम राय बनानी होगी, भले ही वह कोई भी राज्य हो। विशेषकर दक्षिण में, क्योंकि वहां जब तब हिंदी को लेकर उठती नफरत की आवाज से देश बंटा हुआ-सा दिखने लगता है। इसे बहुत ही तरीके से दुनिया भर के उदाहरणों के जरिए दूर करना होगा, ताकि हिंदी देश की आधिकारिक भाषा बने। इसको लेकर क्षेत्रीय भाषाओं की गुटबाजी से हट कर सोचना होगा। यह भी समझना और समझाना होगा कि कई दूसरे देशों के उदाहरण सामने हैं, जिनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाएं तो अलग-अलग हैं लेकिन देश की एक ही भाषा है। दूर की बात क्या, पड़ोसी देश चीन का ही उदाहरण काफी है।

तेजी से विकसित हो रही दुनिया में राज्य, भाषा और बोली को लेकर धड़ेबाजी के नफे, नुकसान को बारीकी से देखना होगा और अंग्रेजी को तरक्की का जरिया मानने की जरूरत का भ्रम भी तोड़ना होगा। इसी से हिंदी के लिए ईमानदार पहल हो पाएगी, वरना हिंदी दिवस कैलेंडर में पड़ने वाली एक तारीख से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। साथ ही हिंदी के नाम पर अंग्रेजी में ही खूब परिपत्र जारी होंगे, विचार विमर्श होगा और काफी कुछ लिखा और बोला जाता रहेगा, जिसके नतीजे भी पहले से मालूम होते हैं। फिर भी हिंदी के लिए हिंदी में ईमानदारी से कुछ कहा और किया जाए यही उस हिंदी के लिए बड़ी बात होगी, जो बिना ईमानदार कोशिशों के बोलने और समझने के लिहाज से दुनिया की तीसरी और चौथी भाषा के बीच डटी हुई है। लगता नहीं कि थोड़ी-सी ईमानदार कोशिश इससे अव्वल मुकाम पर भी पहुंचा सकती है। शायद हिंदी को भी इसी दिन का इंतजार है!

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