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कविताएं: मैं वही हूं, घर से निकल कर और बोझ

मैं वही हूं जो कल था, मंद गति से चलता हुआ, कुछ सोचता-विचारता हुआ, वही है घर-गृहस्थी का छोटा-मोटा जंजाल, वही है मौसम का सर्द मिजाज

Author January 13, 2019 1:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारत यायावर

मैं वही हूं

मैं वही हूं जो कल था
मंद गति से चलता हुआ
कुछ सोचता-विचारता हुआ
वही है घर-गृहस्थी का छोटा-मोटा जंजाल
वही है मौसम का सर्द मिजाज
ठिठुरता सब कुछ
वही हैं मित्र और रिश्तेदार और जलनेवाले
वही हैं दिशाएं, आसमान वही
और शहर की रेलमपेल सड़क
वही हैं नजारे
और परेशानियों से छटपटाती जिंदगी
वही भाव-बोध
वही विचारों और भावों का उठना-गिरना
कुछ नया नहीं है
सब कुछ वही है जो था
वही कोशिश कि कुछ नया रचा जाए
अपनी मौलिकता को कुछ और संवारा जाए
अपनी पहचान बनाने की कोशिश निरंतर

सब कुछ वही है
बदलते रहने की कोशिश भी वही है
लेकिन हर साल बदल जाता है कैलेंडर
बदलती रहती है तारीख पर तारीख
मैं नया कुछ भी नहीं कर पाता
एक उम्मीद-सी फिर भी लगी रहती है
एक चाहत लिए आगे ही बढ़ा जाता हूं

घर से निकल कर

यहां आकर मैंने देखा
जितनी ऊंचाई पर
देखता था खुद को
उतनी निचाई पर पांव जमे हैं
और जहां खड़ा हूं
वहां घुप्प अंधेरा है
भूख से ऐंठती हैं अंतड़ियां
और लोग देख नहीं पाते

जिस आशा और विश्वास से
आया था यहां
वह कहां
पूरा हुआ
सिर्फ छाया रहा
चारों ओर धुआं
मुझे यह शहर
न जाने कितनी बार
नगाड़ा बजा कर
मेरी परेशानियों पर हंसता हुआ लगा
किसी तरह
गिरते-पड़ते-संभलते
मैं हुआ वह
जो होना था अंतत:
फिर लौट आया

बोझ

मैंने अपना दे दिया तुम्हें
सब कुछ
और मुक्त हो गया
तुमने उसे दे दिया अपना
सब कुछ
और मुक्त हो गए
उसने किसी और को दे दिया अपना
सब कुछ
और मुक्त हो गया

सबने अपनी मुक्ति के लिए ऐसा किया
सबने बोझ उतारा
अपना अपना
सबने खुद को मुक्त किया
पर यह सिर्फ कोशिश थी
अगले रोज फिर लद गए
उतने ही बोझ से
इतना कि माथे से पसीना बहा

पर एक आदमी ऐसा भी था
उफ तक नहीं की
अपना बोझ उठाए
सुबह से शाम तक चला
अपना बोझ उठाए घर आया
खाना खाया
चैन से सोया
बोझ उठाए ही हंसा
देर तक
दोस्तों-परिजनों के बीच
वह मुक्त रहा
बिना मुक्ति की चाह किए

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