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योग दर्शन: धन चाहे तो दान कर

कंजूस व्यक्ति धरती पर भार है। उस धन के संचय करने का क्या लाभ, जो मनुष्य मात्र के काम ही न आ सके। अगर शरीर में रक्त का संचार ठीक से न हो तो कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

Author Updated: September 8, 2019 5:38 AM
धन कमा कर उसका उपयोग तथा उचित उपभोग भी करना चाहिए।

डॉ. वरुण वीर

दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥

धन की तीन गति होती है- दान भोग और नाश। इसमें से सबसे उत्तम गति दान की है। धन का दान, धन द्वारा अन्य वस्तु, दवाई, वस्त्र आदि का दान अच्छा माना जाता है। दूसरी गति भोग है। जो भी धन आपके पास है, उसका उचित भोग करना, अपने घर का निर्माण, बच्चों की शिक्षा, विवाह, प्रतिदिन जीवन में वस्तुओं का संग्रह तथा जीवन को सुख पूर्वक बिताने के लिए अपने धन का उपयोग करना श्रेष्ठ है।

पर जो व्यक्ति न दान देता है और न ही उसका उपभोग करता है वह धन उसके लिए किसी काम का नहीं होता। वह धन नाश को प्राप्त हो जाता है। हमारी संस्कृति में दान देने की परंपरा आरंभ से ही रही है। आमदनी का कम से कम दो प्रतिशत और अधिक से अधिक दस प्रतिशत तक दान सभी मनुष्यों को करना चाहिए और जितना हो सके उतना दान करें। राजा हरिश्चंद्र के जीवन में दान के महत्त्व को हम सभी ने सुना है। दानवीर कर्ण, राजा भोज आदि अनेक दानी महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर दान देने के संस्कारों को हमारे जीवन में सदैव पिरो कर रखा है। यह नितांत सत्य है कि दान देने वाला व्यक्ति कभी गरीब नहीं होता, बल्कि मांगने वाला व्यक्ति हल्का हो जाता है।

वेद की आज्ञा है कि हजारों हाथ से दान करो। दान देने वाले का खजाना कभी खाली नहीं होता, लेकिन ध्यान रहे, दान देने की भावना के साथ विनम्रता होनी चाहिए। गीता में श्रीकृष्ण ने दान तीन प्रकार का बताया है। सात्त्विक, राजस तथा तामस।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विक स्मृतम॥

जब व्यक्ति यह सोच कर दान देता है कि यह उसका धर्म है कि प्यासे को पानी, भूखों को भोजन, बीमार को दवाई की जरूरत है। इस परोपकार की भावना का मुख्य महत्त्व है। बिना स्वार्थ, महत्त्वाकांक्षा के और विनम्रता पूर्वक, अहंकार रहित दिए गए दान का फल हजारों गुना बढ़ कर मिलता है। दान देने में सात्विकता बनी रहनी चाहिए।

यतु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुन:।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥

जो दान किसी के उपकार का बदला चुकाने तथा यह मान कर कि अमुक व्यक्ति ने मुझ पर उपकार किया था तब मन मार कर उसका एहसान उतारने की भावना से दिया या दिलाया गया दान राजस कहलाता है। जिसमें स्वार्थ की भावना हो, अपना स्वार्थ सिद्ध करवाने के लिए दिए गए उपहार, वस्तु या समय सभी राजस श्रेणी में आते हैं तथा जबर्दस्ती और इच्छा न होते हुए दिया गया दान भी इसी श्रेणी में आता है।

अदेशकाले तद्दान मपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाह्तम्॥

जो दान अस्थान, असमय में पात्रों को दिया जाए तथा अपमानपूर्वक दिया जाए वह दान तामस श्रेणी में आता है। जिस कार्य के लिए दान दिया गया है वह कार्य सधना चाहिए। दान लेने वाला व्यक्ति अगर उस दान का उपयोग ठीक से नहीं करता है तब वह तो पाप का भागी बनता ही है, वह दान भी तामस श्रेणी में आ जाता है। इसलिए विचार पूर्वक दिया गया दान ही शुभ फल कारक होता है। दानी को दान देते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे कि दिए गए दान का सदुपयोग हो। जैसे दान लेने वाला व्यक्ति या संस्था ईमानदार, परिश्रमी और धन का व्यय ठीक प्रकार से करने वाली हो।

दान की परंपरा विश्व के सभी देशों में है। आज विश्व में अमेरिकी सबसे अधिक संख्या में दान देते हैं। कई दान-दाताओं ने अपने जीवन में जितना धन कमाया था, उससे अधिक दान कर दिया। जैसे मूल एक अरब डॉलर था और उसने जीवन में चार अरब डॉलर कमाया तो तीन अरब डॉलर दान कर दिया। चार्ल्स फ्रांसिस फेनी को दान का जेम्स बांड कहा जाता है। उनकी कुल संपत्ति डेढ़ अरब अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन पूरे जीवन में उन्होंने 6.3 अरब अमेरिकी डॉलर दान दे दिया। ऐसे ही बिल गेट और अन्य कई अमेरिकी हैं, जो दान देने में सदैव अग्रणी रहते हैं।

विश्व के बीस बड़े दानदाताओं में अधिकतर अमेरिकी हैं। तीन मुसलिम हैं, जिनमें से एक भारतीय अजीम प्रेमजी हैं। ली का शिंग हांगकांग से है। भारत जो कि विश्व की चौथी-पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उससे केवल एक नहीं, कई नाम आने चाहिए, जिससे देश का गौरव ही नहीं बढ़े, बल्कि देश में दान देने का संस्कार दृढ़ हो। व्यक्ति अपने शरीर, परिवार, मित्र सभी को एक किनारे रख कर धन की दौड़ में भागता रहता है और जब शरीर तथा परिवार साथ नहीं देता तब वह धन भी साथ नहीं दे पाता है। धन से केवल इलाज संभव है, सेवा नहीं। धन भी इतना क्यों कमाया जाए, जिससे कि शरीर ही नष्ट हो जाए। जीवन का आनंद ही चला जाए।

इस प्रकार के संस्कार सरकार को शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को सिखाने चाहिए। दान केवल धन का नहीं, बल्कि समय, विद्या, वस्त्र, भोजन तथा विचार का भी हो सकता है। अपने शरीर से किसी की सेवा करना भी दान है। मूल रूप से परोपकार की भावना रखना आवश्यक है। दिया गया दान कई गुना बढ़ कर दाता को मिलता है। ध्यान रहे, बाएं हाथ से दिए गए दान का दाएं हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए। बिना किसी को पता चले दिया गया दान श्रेष्ठदान है। निर्धन व्यक्ति भी दान देने से समाज में सम्मान को प्राप्त होता है। दान की महिमा ही कुछ ऐसी है कि दान देने वाला और लेने वाला दोनों ही प्रसन्न होते हैं। एक समय की बात है, रहीम अपने दरबार में दान दे रहे थे और नजरें झुकी हुई थीं। एक दान लेने वाले व्यक्ति ने पूछा, आप बड़े दानी हैं फिर भी दान देते समय आपकी नजरें झुकी हुई हैं। रहीम कहते हैं-

देनहार कोऊ और है, देत रहत दिन रैन।
लोग भरम मो पर करैं, ताते नीचे नैन॥

यह जीवन केवल धन कमाने के लिए नहीं, बल्कि धन कमा कर उसका उपयोग तथा उचित उपभोग भी करना चाहिए। कंजूस व्यक्ति धरती पर भार है। उस धन के संचय करने का क्या लाभ, जो मनुष्य मात्र के काम ही न आ सके। अगर शरीर में रक्त का संचार ठीक से न हो तो कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार अगर धन तिजोरी में ही पड़ा रहे, तो समाज तथा राष्ट्र के लिए ठीक नहीं है। धन का संचय उतनी ही मात्रा में करें, जिससे कि जीवन ठीक से चलता रहे और भविष्य में आने वाले किसी भी संकट से बचा जा सके। धन कमाना अच्छा है, लेकिन उसे दबा कर रखना अच्छा नहीं। ‘पूत सपूत तो क्यों धन संचै, पूत कपूत तो क्यों धन संचै’- अगर बेटा योग्य है, तो अपने आप अपने जीवन में इतना धन कमा लेगा कि उसे कुछ देने की जरूरत ही नहीं और अगर बेटा नालायक है, तो उसे कितना भी धन क्यों न कमा कर दे दिया जाए, वह सब का नाश कर देगा। इसलिए जो कमाया है उसमें से अधिक से अधिक मानव कल्याण के लिए उपयोग करें। योग दर्शन में अपरिग्रह का सिद्धांत दान के महत्त्व को और अधिक बढ़ा देता है अपरिग्रह अर्थात जितनी आवश्यकता है जीवन यापन करने के लिए उतने का ही संचय करें और उससे अधिक का दान कर देना ही सर्वोत्तम कर्म है।

 

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