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महिला सुरक्षा का सवाल

बलात्कार के मामलों में पुलिस जांच और अदालती सुनवाइ में सुस्ती की वजह से पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है। इसका सीधा फायदा आरोपियों को मिल जाता है।

महिलाओं की असुरक्षा लगातार बढ़ रही है।

प्रभुनाथ शुक्ल

महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनजर कई कड़े कानून हैं। इसके लिए निगरानी तंत्र को पुख्ता बनाने के दावे भी किए जाते हैं, पर हकीकत यह है कि घर के भीतर और बाहर महिलाओं का उत्पीड़न, शोषण, बलात्कार और फिर हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। स्वाभाविक ही इसे लेकर पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर अंगुलियां उठती हैं, कठोर सजा के प्रावधान की मांग उठती है। पर इस मामले में समाज का भेदभावपूर्ण और संकीर्ण नजरिया भी कम दोषी नहीं है। इस प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए समाज की क्या भूमिका हो, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

महिलाओं की असुरक्षा लगातार बढ़ रही है, लेकिन देश, संविधान और हमारा कानून उन्हें निर्भय वातावरण उपलब्ध कराने में अक्षम साबित हुआ है। इस पर हमें सोचना और समाज का नजरिया बदलना होगा। आधुनिक हो चले समय में भी महिलाओं को लेकर घर, परिवार और समाज का नजरिया बेहद घटिया है। इसलिए सुबह घर से अकेली निकली बेटी जब तक शाम को सुरक्षित घर नहीं लौट आती, माता-पिता चिंताएं शाम ढलने के साथ बढ़ती जाती हैं। जबकि वहीं, बेटा घर चाहे जब आए और बाहर जाए, किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यही हमारी सोच का अंतर है। अगर हम बेटियों की परवरिश बेटों की तरह करते, तो घर से लेकर सड़क तक भेदभाव रहित महौल दे पाने में सक्षम होते। हमने बेटियों पर शालीनता, संस्कार, इज्जत, मान-मर्यादा की खोल चढ़ा रखी है, जिसकी वजह से उनका आत्मबल कमजोर पड़ गया। उनके भीतर लड़ने की क्षमता खत्म हो गई है। बेटियां एक मां, बहन, पत्नी के रूप में केवल समर्पण की पोटली बन कर रह गई हैं। जिस दिन समाज इस तरह की पाबंदियां हटा लेगा, उन्हें खुला आसमान मिलेगा, उस दिन से हमें निर्भया, कठुवा और हैदराबाद जैसी घटनाएं देखने को नहीं मिलेंगी। सड़क पर बारह साल की बेटी सिर झुकाए अदब से गुजरती है। उसकी इस शालीनता को हजारों आंखें घूरती हैं। जबकि उसी उम्र का बेटा सड़क पर बिंदास गुजरता है। खुलेआम कार ड्राइविंग और बाइक रेस करता है। आखिर ऐसा क्यों। सड़क पर गुजरते अकेले मर्द पर महिलाएं नहीं टूटती हैं, लेकिन एक अकेली गुजरती बेटी पर भूखे भेड़ियों का झुंड क्यों टूट पड़ता है! यह अपने आप में बड़ा सवाल है। जिस प्रकृति ने पुरुष का निर्माण किया है, उसी ने उस औरत का भी किया है। फिर सड़क पर या अकेली औरत देख कर हमारे संस्कार क्यों बदल जाते हैं। इसका जवाब हमें खोजना होगा।

संविधान और कानून की किताबों में महिला सुरक्षा की बातें दम तोड़ती दिखती हैं। इस मामले में उपलब्ध आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 2014 में पुलिस ने बलात्कार के 51,623 मामले पंजीकृत किए, जबकि 1,25,431 मामले अदालतों में लंबित थे। इसमें सिर्फ 4,944 लोगों को सजा मिल पाई। इसी तरह 2015 में बलात्कार के 50,509 अपराध पुलिस तक पहुंचे। अदालतों में इस साल कुल 1,37,458 पर सुनवाई होनी थी, जबकि सजा केवल 5,514 अपराधियों को मिल पाई। 2016 में भी कुछ बेहतर परिणाम देखने को नहीं मिला। इस साल 55,071 अपराध पुलिस थानों में पंजीकृत हुए। 1,52,165 बलात्कार के अपराध अदालतों में सुनवाई के लिए लंबित रहे, जबकि सजा केवल 4,739 अरोपियों को मिल पाई। बलात्कार से संबंधित मामलों में जितनी त्वरित गति से पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए, नहीं मिल पा रहा है। कानूनी अड़चनों की वजह से पुलिस जांच और अदालतों में सुनवाई समय पर नहीं हो पाती। इस दिक्कत को हमें खत्म करना होगा। संसद में महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर रोज नया कानून बनता है, लेकिन आम जीवन में उसका असर शून्य दिखता है।

बलात्कार के मामलों में पुलिस जांच और अदालती सुनवाइ में सुस्ती की वजह से पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है। इसका सीधा फायदा आरोपियों को मिल जाता है। एक आंकड़े के अनुसार 2017 में पुलिस को बलात्कार से जुड़ी 46,965 घटनाओं की जांच करनी थी, जिसमें 14,406 मामले पहले से लंबित थे। जबकि 32,559 नए मामले पंजीकृत हुए थे। पुलिस जांच में साक्ष्य के अभाव में 4,364 मामलों को बंद कर दिया गया, जबकि 28,750 मामलों में केवल अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई। इसमें 7,447 मामले पहले के शामिल थे। इसके अलावा 13,7,65 मामले अगले साल के लिए लंबित छोड़ दिए गए। इससे यह साफ जाहिर होता है कि बलात्कार की घटनाओं को लेकर हमारा तंत्र कितना सजग और सक्रिय है। 2016 के आंकड़े और चौंकाने वाले हैं। देश भर में बलात्कार के बाद हत्या की एक सौ आठ घटनाएं लंबित थीं। 2017 में दो सौ तेईस नए मामले पंजीकृत हुए। पुलिस जांच में ग्यारह मामलों की फाइल बंद कर दी गई। सिर्फ दो सौ ग्यारह मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद भी एक सौ नौ मामले लंबित रह गए। इस दौरान पूरे मामलों में 43,197 आरोपी गिरफ्तार किए गए। जबकि 38,534 के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो पाए। इसके अलावा केवल 6,957 लोगों को दोषी करार दिया गया। हत्या और दुष्कर्म के मामले में तीन सौ चौहत्तर आरोपी गिरफ्तार किए गए, लेकिन सजा केवल अड़तालीस को मिली।

अदालतों में न्यायाधीशों की कमी और बढ़ते मुकदमों के बोझ की वजह से भी स्थिति अच्छी नहीं है। पॉक्सो कानून के तहत 1,60,989 मामले अदालतों में लंबित हैं। 2017 में देश की अदालतों में 1,46,201 मामले लंबित थे, जिनमें 1,17,451 पुराने मामले थे। लेकिन अदालतों में सिफ 18,099 मामलों की सुनवाई हो सकी। 5,822 यानी सिर्फ 32.2 फीसद आरोपियों के खिलाफ सजा हो पाई, जबकि 11,453 अरोपियों को रिहा कर दिया गया। सतासी फीसद से अधिक यानी 1,27,868 मामलों को अगले साल के लिए टाल दिया गया। सबसे अधिक चिंता की बात रही कि दुष्कर्म के बाद हत्या के मामलों में भी देश की अदालतों का रवैया बेहद सुस्त रहा। 2017 में इस तरह के कुल 574 मामले पंजीकृत हुए, जिनमें 363 मामले पुराने थे। इसमें केवल सत्तावन घटनाओं में सुनवाई हो सकी और केवल तैंतीस को सजा मिली। चौबीस अरोपी बरी कर दिए गए। इसके अलावा पांच सौ सत्रह मामले अगले साल की सुनवाई के लिए टाल दिए गए।

भारत में बढ़ती बलात्कार की घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र भी चिंता जता चुका है। निर्भया कांड पर भी उसने चिंता जताई थी, लेकिन इसके बाद भी हमारे सामाजिक संस्कार में कोई बदलाव नहीं दिखा। निर्भया कांड के सात सालों में तकरीबन चालीस फीसद बलात्कार के मामले बढ़े हैं। निर्भया के साथ हुए अमानवीय कृत्य के बाद पूरा देश सड़कों पर था। ऐसा लगा था अब कोई बलात्कार की घटना नहीं होगी, लेकिन यह सब कल्पना साबित हुआ। भारत में हर पंद्रह मिनट में एक बलात्कार की घटना होती है। हर साल 35,320 बलात्कार की घटनाएं पंजीकृत होती हैं, लेकिन सिर्फ तीस फीसद मामलों में पीड़िता को न्याय मिल पाता है। अब तक ढाई लाख लाख मामले बलात्कार से संबंधित हैं। तकरीबन नौ फीसद मामलों की सुनवाई में दस साल से अधिक का वक्त लग गया। बलात्कार के पचहत्तर फीसद मामलों में आरोपी संदेह या दूसरी कानूनी तकनीक का फायदा उठा कर छूट जाते हैं।

देश भर में बलात्कार पीड़ित बेटियों, कामकाजी महिलाओं को राहत पहुंचाने के लिए कानूनों में संशोधन किया गया। मगर अपराधों में कमी नहीं आई। बलात्कार पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए 390.90 करोड़ का निर्भया फंड स्थापित किया गया, जिसमें राज्यों की भागीदारी भी सुनिश्चत की गई। मगर इस फंड का उपयोग करने में ग्यारह राज्य एकदम फीसड््डी साबित हुए। संबंधित राज्यों ने फंड का एक भी रुपया इस्तेमाल नहीं किया। इसमें महाराष्ट्र, मणिपुर, त्रिपुरा जैसे कइ राज्य शामिल हैं। उस स्थिति में हम सरकारों और उसके तंत्र से क्या उम्मीद कर सकते हैं। हमें बलात्कार की घटनाओं पर त्वरित न्याय को और गतिशील बनाना होगा। अधिकतम तीन माह के भीतर पीड़िता को न्याय दिलाना होगा। ऐसे मामलों के निपटान के लिए अलग अदालतें, मेडिकल और पुलिस की व्यवस्था करनी होगी। लोगों में नैतिकता जगानी होगी। स्कूली पाठ्यक्रमों में बदलाव करना होगा। आरोप सिद्ध होने पर दोषियों कड़ी सजा का प्रावधान करना होगा। हम लचीले कानून से बलात्कार की घटनाओं को नहीं रोक पाएंगे।

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