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पारंपरिक परिधानों में इतरा कर चलें

हम भारतीय हैं और हमें अपनी परंपराओं पर गुमान है। परंपरा में हम रचे-बसे हैं। केवल इतना कहने भर से काम नहीं चलेगा। भारत की धरोहर, संस्कृति, कला, भाषा आदि को संजोना, सहेजना, प्रसारित और प्रचारित करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ी अमीर विरासत से लबरेज हो।

Author Published on: November 3, 2019 6:12 AM
लाइमलाइट में रहना है तो ब्रोकेड के बने कपड़े या साड़ी पहनें।

आज फैशन के नाम पर हम कुछ भी पहन लेते हैं। नई पीढ़ी में तो नए चलन की नकल करने की होड़-सी लगी है। ऐसे में हम न सिर्फ अपने परिधानों से बल्कि अपने संस्कारों से भी दूर होते जा रहे हैं। कारण कि परिधान भी भारतीय संस्कारों का अभिन्न अंग हंै। भारतीय परिधानों को आज के फैशन के अनुसार ढाल कर कैसे नया फैशन बनाया जा सकता है इस टिप्स की जानकारी दे रही हैं दीप्ति अंगरीश।

हम भारतीय हैं और हमें अपनी परंपराओं पर गुमान है। परंपरा में हम रचे-बसे हैं। केवल इतना कहने भर से काम नहीं चलेगा। भारत की धरोहर, संस्कृति, कला, भाषा आदि को संजोना, सहेजना, प्रसारित और प्रचारित करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ी अमीर विरासत से लबरेज हो। साथ ही स्वयं को भी आत्मसात करना होगा। अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी मिट्टी की महक को भूल अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि के रंग में रंग जाएं। भले यह सुनने में अजीब लग रहा है, लेकिन वर्षों बाद हमें महसूस होगा कि हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि हमें अपनी परंपराओं और अच्छे रीति-रिवाजों को आत्मसात करना होगा। संजोना होगा।

इसका यह मतलब भी नहीं कि हम विदेश से मुंह मोड़ लें और सिर्फ भारत की डुगडुगी बजाएं। बस, जरूरत है बेहतर तालमेल की। यानी विदेश की सकरात्मकता को अपनाते हुए संस्कृति से लेकर पहनावे में जड़ें मजबूत रखें। इस क्रम में चर्चा करते हैं भारतीय पारंपरिक कलाकारी की, जो हर प्रांत की विशिष्टता है। यदि हम साड़ी की बात करें, तो साड़ी भारतीय मूल का एक ऐसा परिधान है जो सबकी पहली पसंद है। वहीं फिल्मी समारोहों में अभिनेत्रियों साड़़ी में ही नजर आती हैं। आप अपनी मां, नानी, दादी की पुरानी साडियों को आज के फैशन के अनुसार ढाल कर नया फैशन अपना सकती हैं।

बता दें कि भारत विविध कलाओं, हथकरघों व बुनकरों का घर है। हर कला की कहानी और इतिहास है, पर आधुनिकता और तकनीक इसे लील रही है। यही वजह है कि बहुतेरे समाज पर स्वस्थ पैनी नजर रखने वाले भारतीयों से अपील करते हैं कि नकली डिजाइन नहीं पहनें। यदि पारंपरिक पहनना है तो असली दिखने वाला नकली नहीं खालिस असली पहनें। कई बार पूरी दुनिया ने भारत के चर्चित चेहरों को कांस जैसे फिल्म समारोह में साड़ी में देखा और वाह कर उठे। यही तो है परंपरा और आधुनिकता का तड़का है। यह भले देखने में पारंपरिक कलाकारी का हूबहू नमूना हो पर यह कई बुनकरों भूख, लाचारी का कारण होता है। रूबरू होते हैं भारत के सबसे खूबसूरत पारंपरिक हथकरघा से, जिन्हें देश-विदेश में सराहा जाता है।

कांजीवरम
दक्षिण भारत में हर महिला की आलमारी में कांजीवरम साड़िया विशिष्ट स्थान रखती हैं। तमिलनाडु राज्य में छोटा-सा गांव है कांचीपुरम। यह कांजीवरम साड़ियों का प्रादुर्भाव स्थान है। टिकाऊ व मजबूत होने के कारण कांजीवरम सिल्क को दुनिया का बेहतरीन सिल्क माना जाता है। जितना इसमें जरी का प्रयोग होता है उतनी ही इसकी कीमत बढ़ती जाती है। कांजीवरम की बेहतरीन लुक्स के कारण दक्षिण भारतीय महिलाएं ही नहीं समस्त भारतीय महिलाएं शादी, पूजा, तीज-त्योहार जैसे विशेष मौके पर इसे पहनना पसंद करती है।

स्टाइलिंग टिप्स : नजाकत और नफासत दिखाने के लिए कांजीवरम साड़ी के साथ पुराने डिजाइन वाले सोने के गहने पहनें और बालों में चमेली के फूलों का गजरा लगाएं।

कलमकारी
कलमकारी का प्रादुर्भवाव आंध्र प्रदेश में हुआ है। यह एक कला है जिसे पेन की मदद से सूती कपड़े पर उकारा जाता है। सबसे खास है इसमें प्रयुक्त रंग। बता दें कि कला में रंगों को उकेरने के लिए प्राकृतिक रंग या फल-सब्जी के रंग का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल के कारण कलमकारी कला देश-विदेश में लोकप्रिय है। आजकल कई फैशन डिजाइनर की पहली पसंद है कलमकारी। कलमकारी कला आपको साड़ी, सूट के अलावा स्कार्फ, जैकेट, प्लाजो से लेकर रनिंग फैब्रिक में मिलती है।

स्टाइलिंग टिप्स : रंग-बिरंगी कलमकारी कला से बने कपड़ों के साथ धागे की कढ़ाई या ट्राइबल डिजाइन वाली एक्ससेरीज पहनें।

चिकनकारी
नवाबों का शहर लखनऊ सिर्फ कबाब के लिए ही नहीं बल्कि चिकनकारी के लिए भी मशहूर है। चिकन या चिकीन पुर्तगाली शब्द है। कुछ समय पहले तक चिकानकारी सफेद धागे से मलमल सूती या मोटी सूती कपड़े पर की जाती थी। समय के साथ चिकनकारी में फैशन के रंग घुले हैं। सफेद के अलाव रंग-बिरंगे रंगों के धागों के साथ कढ़ाई की जाती है।

स्टाइलिंग टिप्स : गर्मियों में सूती कपड़ों में हल्के रंगों से की गई कढ़ाई ठंडक का अहसास दिलाती है। कार्यालय, कॉलेज, लंच डेट या दोस्तों के साथ मिलने पर चिकनकारी वाला आउटफिट उम्दा दिखता है।

बंगाल टसर
बंगाल के टसर सिल्क को कोसा सिल्क भी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले में इसका प्रादुर्भाव व व्यापार होता है। महिलाएं टसर साड़ी को पहनना बहुत पसंद करती हैं। पारंपरिक रूप में टसर सिल्क बेज, कॉपर और हनी ब्राउन रंग में आता है। टसर सिल्क साड़ियों के अलावा रनिंग फैब्रिक से आप मनचाहे कुर्ती, कुर्ते, सलवार, जैकेट आदि कस्टमाइज करवा सकते हैं।

स्टाइलिंग टिप्स : खास मौकों के लिए लाइटवेट व नाजुक टसर सिल्क साड़ी से लेकर कोई भी आउटफिट की मध्यम चमक आपको दमकाएगी।
इकट
रोजमर्रा में आप क्लासी दिखना चाहती हैं, जिसमें लुक्स भी हों और आराम भी, तो जान लें कि इकट से बेहतर कुछ नहीं है। उड़ीसा के इकट में धागों को बांधकर डाई में डुबाकर फिर कपड़े को बुना जाता है। इकट बेहद लोकप्रिय है। रैम्प पर मॉडल्स भी इसे पहन कर इतराती हैं।
स्टाइलिंग टिप्स :पारंपरिक इकट वाली साड़ियों, प्लाजो, दुपट्टा, शर्ट, कुर्ता, कुर्ती, ब्लाउज आदि का आलमारी में जरूर जगह दें।

बांधनी
हथकरघा की सबसे सुंदर कला है गुजरात की बांधनी। बांधनी आर्ट कपड़े पर टाई एंड डाई की बेहतरीन कला है जिसमें डिजाइन को पूरे कपड़े पर मटर के दाने के बराबर कपड़े को धागों से बांधा जाता है और एक रंग या दो रंग या अधिक रंगों में रंगा जाता है। बांधनी कला गुजरात के अलावा राजस्थान और पंजाब के कुछ क्षेत्रों में की जाती है। तमिलनाडू में भी बांधनी की जाती हैै। वहां इसे सुनगुडी कहा जाता है। यह कला साड़ी, सूट, कुर्ती और दुपट्टे में लोकप्रिय है।

स्टाइलिंग टिप्स :डेली वियर में बांधनी आर्ट के कपड़े पहने जा सकते हैं। सफेद सूट के साथ लाल व नीला बांधनी दुपट्टा ऐलीगेंट लुक देता है।

मांगलगिरी फैब्रिक
मांगलगिरी फैब्रिक आंध प्रदेश का है। यह फैब्रिक हाथों से बना होता है। बुनकर इस फैब्रिक को बनते हैं और फिर डाई करते हैं। डाई करने से पहले अनेकों बार फैब्रिक को शुद्ध किया जाता है। इस कारण इसे मनचाहे रंग में रंगना आसान होता है। यहां तक कि इसे कॉटन की सबसे बेहतरीन किस्म माना जाता है।

स्टाइलिंग टिप्स :मांगलगिरी फैब्रिक में गहरे रंग और मोटे टिफ वाले छापे के डिजाइन से बनी साड़ियां को आलमारी में रखें। यह आरामदायक होने के साथ ऐलीगेंट लुक देता है।

पटन पटोला
गुजरात की मशहूर हैं पटन पटोला साड़ियां। गुजरात के पटन जिले में कारीगर सदियों से पटोला साड़ियां बुन रहे हैं। बता दें कि पटोला इकट से काफी मिलता-जुलता है। इसमें डबल इकट पैटर्न को विविध डिजाइन में बुना जाता है। एक पटोला साड़ी को बुनने में पांच महीने लगते है।

स्टाइलिंग टिप्स : खास मौकों पर सोने के गहनों, फ्रेंच जूड़ा के साथ पटोला साड़ी पहनें।

बनारसी
भारत की सबसे अनमोल टेक्सटाइल आर्ट है ब्रोकेड। ब्रोकेड यानी बनारसी फैब्रिक पहनकर लगता है मानो कोई कलात्मक चीज पहनी हो। इसमें सोने, चांदी के धागों या रेशमी धागों से कपड़े को बुना जाता है।
स्टाइलिंग टिप्स :लाइमलाइट में रहना है तो ब्रोकेड के बने कपड़े या साड़ी पहनें। आपकी चमचमाती ब्यूटी लशकारे मारेगी।

 

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