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विश्व बाजार में अनुवाद

जिस गति से व्यावसायिक-वाणिज्यिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है, मनोरंजन और सूचना के साधन बढ़ रहे हैं, उसी हिसाब से अनुवाद का बाजार भी बढ़ रहा है। इस बार की चर्चा बाजार में अनुवाद और अनुवाद के बाजार पर। - संपादक

Author Published on: November 10, 2019 2:26 AM
बाजार और सियासत की जुगलबंदी का प्रभाव आज के समाज में साफ दिख रहा है।

देवशंकर नवीन

अनुवाद की परंपरा तभी से शुरू मानी जाती है, जब मनुष्य कीे एक भाषाभाषी क्षेत्र से दूसरे भाषाभाषी क्षेत्रों में आवाजाही शुरू हुई होगी। फिर कारोबारी, कार्यालयी और राजनयिक जरूरतों के चलते अनुवाद की आवश्यकता बढ़ी, जिससे अनुवाद कर्म ने एक पेशे का रूप ले लिया। अब यह केवल व्यक्तिगत रुचि का क्षेत्र न रह कर पेशागत कौशल बन चुका है। जिस गति से व्यावसायिक-वाणिज्यिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है, मनोरंजन और सूचना के साधन बढ़ रहे हैं, उसी हिसाब से अनुवाद का बाजार भी बढ़ रहा है। इस बार की चर्चा बाजार में अनुवाद और अनुवाद के बाजार पर। – संपादक

नुवाद की उपादेयता जन-संवाद के आरंभिक काल में ही सिद्ध हो गई थी। जनजीवन में भाषिक-प्रतीक के आगमन काल से ही। पर उस दौर में इसका उपयोग जनजीवन की समझ बनाने तथा ज्ञान-फलक का विस्तार करने में होता था। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संबंधों की मुखर शृंखला चली; तो यह राजनीतिक-संवाद के लिए महत्त्वपूर्ण हो गया। भारत की बहुभाषिकता, अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों की अनिवार्यता, सीमावर्ती स्वायत्तता के मद्देनजर इसकी पहले से ही व्यवस्थित उपादेयता सुनिश्चित हो गई। आगे के दिनों में भारतीय उपमहाद्वीप में संचालित ब्रिटिश शासन की कुटिलता ने इसे दूषित कर दिया।

भारतीय ग्रंथों के अंग्रेज संपोषित अनुवाद के कारण दुनिया भर के बौद्धिकों का सामना पहली बार दूषित अनुवाद से हुआ। यहां से अग्रसर अनुवाद-कर्म की परख राजनीतिक उद्यम/ तिकड़म के हिस्से के रूप में होने लगी। अब अनुवाद ज्ञान-विस्तार का साधन भर नहीं रह गया। साम्राज्य-विस्तार के आखेटकों ने मूल-पाठ के भाव को जुगाड़ तकनीक से लक्ष्य-भाषा के पाठ में तोड़ना-मरोड़ना शुरू किया। अब वाक्यों, पदों, शब्दों, वर्णों, विराम चिह्नों के बीच छिपी हुई अर्थ-ध्वनियों की तलाश और व्याख्या होने लगी। अनुवाद-कर्म और अनुवादकों को इस व्याख्या की चतुराई का घातक परिणाम भोगना पड़ा। पर भारतीय नवजागरण और हिंदी नवजागरण के अग्रदूतों ने पाठ चयन के अपने कौशल से प्रदूषित अनुवाद से प्रसारित इन ‘विचित्र धारणाओं’ को ध्वस्त कर दिया।

राजा राममोहन राय से शुरू हुई भारतीय ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद की परंपरा आरसी दत्त, दीनबंधु मित्र, श्रीअरविंद, रवींद्रनाथ ठाकुर और आगे के अनुवादकों तक आई। इसी तरह राष्ट्रीय भावना, देशदशा, आधुनिक चिंतन और ज्ञान-विज्ञान से भारतीय समाज को परिचित कराने के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल से शुरू हुई अंग्रेजी ग्रंथों के हिंदी अनुवाद की परंपरा आगे बढ़ी। मर्चेंट आॅफ वेनिस (शेक्सपियर), एजुकेशन (हर्बर्ट स्पेंसर), आॅन लिबर्टी (जान स्टुअर्ट मिल), रिडिल आॅफ यूनीवर्स (जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट हैकल), स्वदेशी भावना और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाली पुस्तक ‘देशेर कथा’ के हिंदी अनुवाद ने भारत के स्वाधीनता सेनानियों को आत्मगौरव से पुष्ट किया। फिर तो यूरोपीय और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद की लहर-सी चल पड़ी। भारतीय भाषाओं में अनेक पारस्परिक अनुवाद भी शुरू हुए।

राजनीतिक हित-साधन में अनुवाद की उक्त कुटिल प्रयुक्ति का दुष्परिणाम हुआ कि स्वातंत्र्योत्तरकालीन भारत में अनुवाद-कर्म एक जोखिम भरा काम हो गया। इस वृत्ति पर अनाहूत आशंकाओं का इतना बोझ लाद दिया गया कि सुदक्ष अनुवादकों के लिए भी यह काम संवेदनशील हो गया। इसके साथ-साथ एक अच्छी बात यह भी हुई कि शासनाध्यक्षों और व्यवसायियों की नजर में अनुवादकों का महत्त्व बहुत बढ़ गया। स्वाधीनता-पूर्व के दिनों में भारतीय बौद्धिक समुदाय जो अनुवाद स्वांत:सुखाय और राष्ट्रहित में अनासक्त रूप से कर रहे थे, स्वातंत्र्योत्तरकाल में वह सत्ता-संचालन का आनुषंगिक कार्य हो गया। शासन-व्यवस्था में संलिप्त लोगों को अनुवाद-कर्म की जरूरत समझ में आने लगी।

राजभाषा के रूप में हिंदी की स्वीकृति और त्रिभाषा-सूत्र लागू होने से अनुवाद की महत्ता और ऊंची हुई। आगे चल कर सरकारी/ गैरसरकारी कार्यालयों में राजभाषा प्रकोष्ठ भी बने। इन शासकीय प्रयासों से अनुवाद-कर्म से रोजगार और उपार्जन के अवसर सामने आए। जन-संचार और प्रकाशन व्यवसाय के विकास के कारण भी अनुवाद के अवसर बढ़े। पर्यटन के विकास से अनुवादकों/ दुभाषियों की मांग बढ़ी। सरकारी कामकाज में हिंदी की अनिवार्यता के कारण अनुवाद-कार्य लाभदायी दिखने लगा। व्यवस्था संचालन और सभ्यता संचरण के लिए अनुवाद अनिवार्य साधन बन गया। आधुनिक समय के सूचना-संपन्न नागरिक होने के लिए इसकी महत्ता तो पहले ही प्रमाणित हो चुकी थी।

उल्लेखनीय है कि बाजार के विस्तार में इस बौद्धिक पहल की बड़ी भूमिका सिद्ध हुई। स्वयं में तो इसका बाजार मूल्य ऊर्जस्वित था ही; जीवन-व्यवस्था के सारे क्षेत्रों में इसकी उपादेयता स्वत: प्रमाणित थी; अनुवाद कौशल हासिल कर आज बहुत सारे लोग रोजगार पा रहे हैं। स्वच्छंद काम करते हुए भरण-पोषण के संसाधन आराम से जुटा रहे हैं। अनुवाद-एजेंसियों की बेशुमार निर्मितियां देख कर यकीन करना सहज है कि इस समय भारत और दुनिया के अन्य देशों में भी अनुवाद एक उपयोगी कौशल है। इस कौशल को हासिल कर लेने वाला व्यक्ति अपने समय का आत्मनिर्भर नागरिक होगा, और भव्य कुलीन सफल जीवन बिताने वालों के बीच गर्व से गरदन ताने जीवन बसर करता रहेगा।

यह सुखद है कि विगत पांच-छह दशकों में निजी उपादेयता के तौर पर अनुवाद की पहचान शासन-व्यवस्था, राष्ट्रनिर्माण के संदेश, मानवीय सौहार्द के संवर्द्धन, वाणिज्य, औद्योगिक विकास, प्रबंधन पद्धति, विचार विनिमय, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, कला-साहित्य-संस्कृति के विकास के अनिवार्य घटक के रूप में बनी है। ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में बेहतर उच्च शिक्षा और पेशेगत ज्ञान में दक्षता हासिल करने में अनुवाद के सूक्ष्मतर उपयोग हो रहे हैं। शुद्ध अनुवाद के अलावा अध्यापन, प्रशिक्षण, प्रशासन, राजनीति, अंतरराज्यीय संस्कृतिक जनसंपर्क, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संबंध, संचार माध्यम, व्यापार, पारंपरिक व्यवसायों के प्रोन्नयन, कृषि, स्थापत्य, साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आदान-प्रदान, प्रकाशन, सिनेमा सब टाइटलिंग, रूपांतरण, दूरदर्शन, विज्ञापन, पर्यटन, खेल-कूद सभी क्षेत्रों में इस कौशल की उपादेयता प्रमुख हो गई है। यकीनन इस कारण सुदक्ष अनुवादकों के लिए रोजगार के मार्ग प्रशस्त हुए हैं। इसके साथ-साथ यह बड़ा सच है कि कोई मनुष्य अपने समय के वैश्विक परिदृश्य का सूचना संपन्न जागृत नागरिक अनुवाद के सहयोग के बिना हो ही नहीं सकता। लिहाजा, अनुवाद का अपना बाजार-मूल्य तो वर्चस्व में है ही, बाजार की परिपुष्टि में भी यह जबर्दस्त योगदान दे रहा है।

वैश्विक व्यवसाय के क्षेत्र-विस्तार में अनुवाद की अनिवार्य भूमिका है। अनुवाद का सहारा लिए बगैर आज के व्यवसायी आम जनता तक पहुंच ही नहीं सकता। अनुवाद के बिना इस समय उत्पादक-उपभोक्ता के बीच संवाद-संबंध स्थापित होना असंभव है। बाजार और सियासत की इस विचित्र गांजामिलानी से कम लोग परिचित होंगे कि भाषाई फूट से एक पक्ष जन-जन में द्रोह फैलाता है, तो दूसरा अपने उत्पाद के विज्ञापनों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद कर उनके कानों में सम्मोहन का जादू भरता है। जन-जन तक अपने उत्पाद की सूचना पहुंचाने का हर संभव प्रयास आज के व्यवसायी कर रहे हैं। विज्ञापन के पाठ की वस्तुनिष्ठता को भली-भांति समझ कर उसके अनुवाद की चेष्टा करने, लक्षित उपभोक्ता समूह को सम्मोहित करने की तरकीब रचने में आज के अनुवादक कुशल हो रहे हैं। विज्ञापनों के अनुवाद का भरा-पूरा बाजार व्यवस्थित हो रहा है। व्यवसाय की संपुष्टि एवं संवर्द्धन में अनुवाद का चमत्कार व्यावहारिक तौर पर स्पष्ट दिख रहा है, बाजार और सियासत की जुगलबंदी का प्रभाव आज के समाज में साफ दिख रहा है।

दुनिया भर के बड़े-बड़े व्यवसायी अनुवाद की इस उपादेयता से सम्मोहित होकर इस ओर आकर्षित हुए हैं। उपभोक्ता समूह तक उत्पाद की पहुंच और गुणगान उसके विक्रय का मूल आधार है। इन दोनों कामों के लिए उपभोक्ता समूह की भाषा में लुभावने पदों के साथ उत्पाद का विवरण अनिवार्य है। लुभावने नारों से लक्षित के्रता-समाज में उत्पाद के लिए सम्मोहन पैदा करने को ही विज्ञापन कहते हैं। विज्ञापन जितना लुभावना होगा, जन-मन पर उसका असर जितना सम्मोहक होगा, उत्पादन की बिक्री उतनी ही अधिक होगी। बाजार की इस लोलुप वृत्ति के कारण सम्भवत: पहली बार पूंजीपतियों को जनभाषा का महत्त्व समझ में आया। उन्हें लगा कि खरीदार की भाषा में उत्पाद का विज्ञापन सर्वाधिक लाभप्रद है। अंतर्भाषिक क्षेत्रों के व्यवसायियों के बीच पारस्परिक संबंधों की निरंतरता के लिए अनुवाद की यह महत्ता तो पहले से थी; किंतु बाजार के भौतिक क्षेत्र में भी अनुवाद का महत्त्व वैश्विक व्यवसाय पद्धति से जगजाहिर हुआ। लुभावने विज्ञापन के सहारे दुनिया के कोने-कोने के उपभोक्तओं तक उत्पाद का सम्मोहन पहुंचाने के लिए हर व्यवसाय में अनुवाद की महत्ता इसी तरह काबिज हुई।

 

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