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प्रसंग: सशस्त्र क्रांतियों के युग का अंत

भौतिक विकास के पूंजीवादी मॉडल के अंतर्विरोधों और दुष्परिणामों को देखते हुए महात्मा गांधी उसे भारत के लिए अहितकर मानते थे। वे उसे प्रकृति-विरोधी और मनुष्य की आध्यात्मिक मुक्ति की संभावना को नष्ट करने वाला मानते थे।

विनोद शाही

आधुनिक काल में प्रकट हुए क्रांतिकारी दर्शन, अपने जमीनी अनुभवों के आधार पर, इस बात की ताकीद करते प्रतीत होते हैं कि सत्ता परिवर्तन, सामाजिक यथार्थ को बदलने की दिशा में पहला पायदान भर होते हैं। इसलिए सत्ता परिवर्तन और इन्कलाब अब एक-दूसरे के पर्याय नहीं रह गए हैं। सत्ता परिवर्तन को इन्कलाबी अर्थ कौन देता है? वह इतिहास की दिशा को बदलने वाला कब होता है? ऐसा तब होता है, जब वह मानव समाज की चेतना को बदलने के अपने भविष्योन्मुख दूरगामी सरोकारों को स्पष्ट रूप में पहचान पाता है। ऐसा करने का मतलब है कि वह परंपरागत संस्कृति के नए पाठ करता हुआ बद्धमूल जड़ता को तोड़ने का साहस दिखाता है। बदले हालात में हम क्रांतिकारी उसे ही मान सकते हैं, जो केवल हालात को बदलने के लिए संघर्ष नहीं करता, बल्कि अधिक विकसित चेतना वाले समाज का निर्माण करने के लिए भी बौद्धिक मोर्चे पर खुद को तैनात करता है।

हमारे समय में क्रांतिकारी वही हो सकता है, जो भौतिक तब्दीली को आध्यात्मिक तब्दीली से जुदा करके नहीं देखता। बल्कि इन दोनों के बीच जो कृत्रिम खाई आधुनिक और उत्तराधुनिक समयों में खोद दी गई है, उसे भरने के लिए आगे आता है। वह समझता है कि सत्ता परिवर्तन को गैर-क्रांतिकारी शक्ति वर्चस्व के लिए इस्तेमाल करने वाले ही, भौतिक और आध्यात्मिक यथार्थ को एक-दूसरे से अलहदा किया करते हैं। उत्तराधुनिक काल में गैर-क्रांतिकारी शक्ति वर्चस्व का लक्ष्य यह हो गया है कि कैसे पूंजी को आवारा पूंजी में बदल कर उस पर आसानी से एकाधिकार किया जा सके? गैर-क्रांतिकारी सत्ता-व्यवस्था शक्ति वर्चस्व को ही अपना मुख्य सरोकार बनाने लगती है। इसीलिए ऐसे आत्मध्रुव-वादी सत्ता परिवर्तनों ने बीसवीं शती में हुई समाजवादी और प्रजातांत्रिक क्रांतियों को आखिरकार असफल बना कर, प्रति-क्रांतियों में बदल दिया।

इक्कीसवीं सदी को दुनिया भर तक फैल जाने वाली जनतांत्रिक क्रांतियों के दौर की तरह देखा और दिखाया जा रहा है। इस नए राजनीति दर्शन की ऐतिहासिक जमीन उत्तर-रूसी परिदृश्य में है, जिसे विश्व में समाजवादी क्रांतियों के अंत की शुरुआत के रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है। हमारे समय के समाजवादी चिंतक मानते हैं कि भूमंडलवाद के गर्भ से भूमंडलीय यथार्थवाद का जन्म अवश्य होगा, इसलिए वे इस दौर को संक्रमणकालीन संकट का दौर कहना अधिक पसंद करते हैं। तथापि वे अभी इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि भविष्य के इन्कलाब परंपरागत समाजवादी क्रांतियों से बहुत अलग तरह के होंगे। खासकर इस लिहाज से अलग कि उनके केंद्र में सत्ता परिवर्तन से ज्यादा अहम होगा, सांस्कृतिक चेतनामूलक रूपांतर। इसकी वजह यह है कि अब सत्ता परिवर्तन का प्रजातांत्रिक तरीके से संभव होना पहले के मुकाबले कहीं अधिक आसान हो गया है।

प्रजातांत्रिक सत्ता संरचनाओं के अधिकांश दुनिया में होने वाले व्यापक स्वीकार ने सत्ता परिवर्तन को पहले के मुकाबले आसान जरूर बनाया है, पर उससे यह प्रक्रिया दूषित भी हुई है। इसने सत्ता परिवर्तन का, चार या पांच वर्ष की अवधि वाला क्रमिक कर्मकांड निर्मित कर दिया है। इससे सत्ता परिवर्तन सामाजिक यथार्थ को गहराई में बदलने के लिए पर्याप्त नहीं रह गए हैं। हथियारबंद क्रांतियों के दौर के अपने आखिरी चरण में दाखिल होने के संकेत मिलने लगे हैं, जिसके बाद इनका बहुत हद तक अप्रासंगिक होना तय लग रहा है। इसकी मुख्य वजह है कि हमारे समय तक आते-आते हथियारबंद क्रांतियां विविध राष्ट्रों के बीच होने वाले परंपरागत युद्धों को छद्म वेश में लड़ने के अस्त्र में तब्दील होती जा रही हैं। उनके सरोकार वैकल्पिक विकास से जुड़े मानवीय सरोकार न होकर, आतंकवाद, मूलवाद और फिदाइनवाद से गुत्थमगुत्था होकर रह गए हैं। हथियारबंद क्रांति करने की आड़ में मानवविरोधी सत्ता संरचनाओं की उनमें बड़े पैमाने पर घुसपैठ होने लगी है। इस तरह प्रतिगामी शक्तियों ने हथियारबंद इन्कलाबों को अपना बंधक बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है और उनके जनधर्मी रूप की विजय की संभावनाओं को नष्ट कर दिया है।

अब प्रजातांत्रिक तरीके से समाज में व्यापक परिवर्तन लाने के नए तौर-तरीकों पर विचार करना जरूरी हो गया है। इससे यह बात साबित होती है कि हमारा समय अब सामाजिक विकास के उस दौर में पहुंच गया है, जहां सांस्कृतिक क्रांति सत्ता मूलक क्रांति से भी बड़ी जरूरत बन गई है। पूरी दुनिया के विविध समाजों की चेतना में रूपांतर के लिए प्रयास किए बिना अब दुनिया को बदलना मुमकिन नहीं रह गया है। दुनिया को बदलने का मतलब यह है कि दुनिया अधिक न्याय पूर्ण और मानवीय सरोकारों वाली हो। इसके लिए जिस सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत होगी, उस पर सोचते हुए हम इस विचार तक पहुंच सकते हैं कि हमारे मौजूदा वैश्विक दौर में संस्कृति का स्वरूप बहुलता मूलक हो गया है। विविध संस्कृतियों की आपससदारी द्वारा ही वैश्विक संस्कृति के स्वरूप को तय करने की बात सामने आ गई है।

धार्मिक समुदायों के आधार पर दुनिया की संस्कृति के व्यापक परिदृश्य की व्याख्या अब मुमकिन नहीं रह गई है। पूरी दुनिया को अपनी निगाह में रखेंगे तो पाएंगे कि ज्यादातर देश बहु-धार्मिक हो गए हैं। यही नहीं, अधिकांश देशों के विविध धार्मिक जनसमूहों या समाजों के बीच वैज्ञानिक चेतना वाले तथा गैर-धार्मिक चेतना वाले लोगों की तादाद भी काफी बढ़ रही है। ऐसे में हमें क्या करना होगा, इस पर विचार करने का समय आ गया है।

हम अपने देश के सांस्कृतिक परिदृश्य का सरसरी तौर पर जायजा लेना चाहें, तो कह सकते हैं कि औपनिवेशिक दौर में प्रचारित यह विचार हमारे दिलोदिमाग पर आज भी छाया हुआ है कि भारत अतीत में महानता से युक्त रहा है। इस महानता की सम्यक व्याख्या के अभाव में आधुनिक पुनर्जागरण के दौर में यह विचार पुनरुत्थानवादी होने की वजह से अप्रासंगिक हो गया। उसके सामने मौजूद था, पश्चिम में घटित होने वाला पुनर्जागरण और उसके गर्भ से प्रकट होने वाली प्रजातांत्रिक और समाजवादी क्रांतियां, जो मुकाबलतन अधिक प्रासंगिक लगने लगी थीं। इनका आधार जिस वैज्ञानिक विकास में था, उसके मुकाबले हम न सिर्फ पिछड़ गए अनुभव कर रहे थे, बल्कि अपने भावी विकास के लिए पश्चिम के ऋणी होने की स्थिति में आ चुके थे। औपनिवेशिक गुलामी के दौर में हमने अपने संसाधनों की नृशंस लूट-खसूट के बावजूद भौतिक विकास के नए रूपों को न सिर्फ स्वीकार किया, आजाद होने के बाद भी उन्हें एक विवशता भरी सुविधा की तरह ओढ़ लिया और इस पश्चिमपरस्ती को अपना विकास-धर्म ही बना लिया। पूंजीवादी विकास के समाजवादी मॉडल को हमने रूस की मदद से अपने सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगीकरण के लिए अपने तरीके से अपनाया।

भौतिक विकास के पूंजीवादी मॉडल के अंतर्विरोधों और दुष्परिणामों को देखते हुए महात्मा गांधी उसे भारत के लिए अहितकर मानते थे। वे उसे प्रकृति-विरोधी और मनुष्य की आध्यात्मिक मुक्ति की संभावना को नष्ट करने वाला मानते थे। तथापि ग्रामकेंद्रित अर्थतंत्र में वापसी को कुदरती विकास का हेतु बना सकने की उनकी दृष्टि को अव्यावहारिक मान कर खारिज कर दिया गया। व्यावहारिक रूप में गांधीवाद, पश्चिमी पूंजीवाद और मार्क्सवाद के मुकाबले इसलिए पिछड़ गया, क्योंकि वह ग्राम, प्रकृति और मनुष्य के प्रति समर्पित होने के बावजूद, इनसे ताल्लुक रखने वाली सामंतवादी जकड़बंदियों से निजात दिलाने के लिए कोई स्पष्ट और ठोस विचार हमारे सामने प्रस्तुत नहीं कर पाया। गांवों के अर्थतंत्र और समाज-सांस्कृतिक तानेबाने में सामंती संरचनाएं गहरी जड़ें जमा कर बैठ गई हैं। यह वह क्षेत्र है, जिसकी चुनौतियों के सामने बेबस होकर हमारा ‘स्वदेशी चिंतन और विकास मॉडल’ अधिक मानवीय प्रतीत होने के बावजूद परंपरा पोषक और आदर्शवादी ही नहीं, पुनरुत्थानवादी भी लगने लगता है।

महात्मा गांधी ही नहीं, हमारे आधुनिक पुनर्जागरण के अन्य महान लोग भी इसमें बराबर के हिस्सेदार और जवाबदेह लगते हैं। दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, ज्योतिबा फुले, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विवेकानंद और अरविंद घोष जैसे महान चिंतक, मुख्यत: समाज सुधारक की भूमिका निभाते हैं। वे मानवमुक्ति के अपने महान आदर्शों का जोर-शोर से प्रचार भी करते हैं, पर उनके गैर-सामंती समाज-सांस्कृतिक पुनर्गठन के लिए अपनी परंपरा के पुनर्पाठ को स्थगित बनाए रखते हैं। ऐसा करने के बजाय वे तात्कालिक दबावों के बरक्स अधिक जरूरी प्रतीत होने वाले सामाजिक सुधार करते हुए अपना काम चलाते हैं।

अब हमारे सामने उत्तराधुनिक दौर की नई तरह की चुनौतियां प्रस्तुत हैं। गांधी इस लिहाज से एक भविष्यद्रष्टा जैसे मालूम पड़ते हैं। ऐसे में हम अब एक और विकसित चेतना वाले नवजागरण की जरूरत महसूस कर रहे हैं। पर यह तभी घटित होगा, जब हम पश्चिम में घटित और अपने यहां प्रकट आधुनिक पुनर्जागरण के अधूरे रह गए कार्यों को पूरा करने के लिए अपने आप को पूरी ताकत और सामर्थ्य से झोंक देने के लिए सामने आएंगे।

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