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बच्चों की बदलती दुनिया

बच्चों में आ रहे बदलावों के समाज पर कई प्रतिकूल प्रभाव देखे जाने लगे हैं। बच्चों की बदलती दुनिया के बारे में विमर्शपरक विश्लेषण कर रहे हैं राजकुमार।

Author Published on: November 10, 2019 4:55 AM
कम्प्यूटर और मोबाइल आदि ने उनकी दुनिया ही बदल दी है।

बाजार, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे प्रयोगों ने बच्चों की दुनिया काफी कुछ बदल दी है। इस तरह बच्चे भी काफी कुछ बदल गए हैं। न तो अब परंपरागत खेल रहे, न खिलौने। लालन-पालन के तरीके भी बदले हैं। पढ़ाई-लिखाई के तरीके बदले हैं, तो बच्चों की गतिविधियां भी बदल गई हैं। इस बदलाव में बहुत कुछ सकारात्मक है, तो नकारात्मक भी बहुत कुछ है। बच्चों में आ रहे इन बदलावों के समाज पर कई प्रतिकूल प्रभाव देखे जाने लगे हैं। बच्चों की बदलती दुनिया के बारे में विमर्शपरक विश्लेषण कर रहे हैं राजकुमार।

सवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पूंजी, बाजार, इंटरनेट और तकनीक के अप्रत्याशित तीव्र विकास और एक-दूसरे के परस्पर गठजोड़ ने दुनिया और समाज के बाहरी और भीतरी संरचनाओं, रिश्तों, संबंधों के ताने-बाने और ढांचे को काफी बदल दिया है। पिछले दो-तीन दशकों में मानवीय संबंधों में भी तेज बदलाव महसूस किया गया है। बच्चों का जीवन भी इससे अछूता नहीं रहा। इसका असर उनकी जिंदगी पर भी पड़ा है। टीवी, इंटरनेट, कम्प्यूटर और मोबाइल, आईपैड आदि ने उनकी दुनिया ही बदल दी है।

बच्चों की दुनिया में शामिल सोशल मीडिया, नए तरह के वीडियो गेम और तरह-तरह के गेम्स ऐप्प और कार्टून नेटवर्क उन्हें बदल रहे हैं। अब दादी-नानी की कहानियां या लोरियां बीते जमाने की बात हो गई हैं। खासकर महानगरीय जीवन में। एकल परिवार की अवधारणा में वे छिटक चुके हैं। दादा-दादी या नाना-नानी की कहानियां भी बच्चों तक वर्चुअल दुनिया के रास्ते ही पहुंच रही है। आज से तीन दशक पूर्व बच्चों की दुनिया में शिक्षा, ज्ञान, सूचना और मनोरंजन के साधन कम थे। परिवार, समाज, स्कूलों में परंपरागत मनोरंजन के साधन ही उपलब्ध थे। उनमें ‘इनडोर’ मनोरंजन की उपलब्धता कम थी। तितलियों के पीछे भागने, छुपम-छुपाई से लेकर पकड़म-पकड़ाई और कबड्डी, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन तथा क्रिकेट जैसे खेलों की भूमिका बड़ी थी।

उन सभी की मौजूदगी अब भी बनी हुई है और कुछ में बहुत विस्तार हुआ है। पिछले दशकों में इनडोर मनोरंजन के साधनों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। या यों कहें कि ज्ञान और मनोरंजन की दुनिया बच्चों की मुट्ठी में समा गए हैं। इसमें डिजिटल माध्यमों और मोबाइल की बड़ी भूमिका है। मोबाइल में पूरी दुनिया की गतिविधियां समा रही हैं। आभासी मनोरंजन के सारे रूप उसमें मौजूद हैं। स्क्रीन टच के साथ ही वे उभर आते हैं। अब हालात यह हैं कि वे बच्चों की सोच और जिंदगी पर हावी हो गए हैं। आजकल बच्चे एक बार मोबाइल या टीवी कार्टून या आॅनलाइन वीडियो गेम्स के साथ चिपक जाते हैं, तो उससे अलग होना मुश्किल होता है।

 

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