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कहानी: सहयात्री

बस का ड्राइवर हो, गाईड हो, होटल के मैनेजर से लेकर रिसेपशनिस्ट तक से उनका संवाद चलता। इस सबके बावजूद वे दिखतीं एक बेचैन और भटकती आत्मा थीं।

सहयात्री

मीरा सीकरी

मैं देखता कि किरण जी इन स्मृतियों से अपने वर्तमान के अकेलेपन को ठेंगा दिखा रही हैं। तो कभी दोपहर और शाम के बीच के आराम के लिए मिले अंतराल में मुझसे यह कह कर कि मुझे शॉपिंग का बहुत शौक है, स्थानीय मार्केट में निकल जातीं। एक किरण जी ही थीं, जो ग्रुप के हर जन से बोलती-बतियाती थीं। बस का ड्राइवर हो, गाईड हो, होटल के मैनेजर से लेकर रिसेपशनिस्ट तक से उनका संवाद चलता। इस सबके बावजूद वे दिखतीं एक बेचैन और भटकती आत्मा थीं।

आपकी रूममेट हूं।’
उनके कहने पर मैं चौंक गया था। मेरे मुंह से निकला- ‘पर मैंने तो अकेले कमरे के लिए बोला था।’
‘मैंने भी तो अकेले कमरे की मांग की थी।’
हम दोनों ग्रुप मैनेजर के पास गए, जिसने मुझे समझाया- ‘अंकल, अकेला-अकेला कमरा लेने पर आपको तीस हजार रुपए और देने होंगे। वैसे अगर आप दो सिंगल जेंट्ज वाला कमरा शेयर कर लें तो आपके जमा पैंसठ हजार में से कुछ रुपए हम वापस करेंगे… आंटी को हम अकेला कमरा दे देंगे।’
‘मैं तीन वाला कमरा तो शेयर नहीं ही करूंगा… मैं कोई सजा काटने के लिए तो यहां आया नहीं। दो-तीन दिन पहले तुम्हारे चाचा से फोन पर बात करते हुए अचानक प्रोग्राम बन गया। उन्होंने तो मुझे सोचने का मौका दिए बिना आधे घंटे के अंदर लड़के को भेज कर पैंसठ हजार का चेक मंगवा लिया, यह कहते हुए कि आपका ‘यूएस’ का वीजा लगा हुआ है। दुबई पहुंच कर वहां का वीजा मिल जाएगा, ढाई हजार के करीब यहां बच जाएंगे, पांच-छह हजार और देकर अकेला कमरा दे देंगे।’
‘चाचा जी से आपकी क्या बात हुई, मैं नहीं जानता, यहां पेमेंट तो मुझे करनी है। आपको आॅपशंस मैंने बता दिए हैं, आपको जो सूट करे, मुझे बता दीजिए।’
ग्रुप के लगभग सारे लोग अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
‘डॉ कुमार, हम भी चलें।’ अपने हाथ में पकड़े कार्ड को मुझे दिखाती, वे मुझसे पूछ रही थीं या कह रही थी। अब मैंने गौर से उनको देखा, अपने कटे हुए बालों में से झांकते गंजे हिस्सों को ढंकने के लिए हाथ की उंगलियों से बालों को सहलाती-बैठाती, आत्मसजग महिला। मेरी ही उम्र की। एकाध साल बड़ी या एकाध साल छोटी। अपने को व्यवस्थित करने के लिए कमरे में पहुंचने के लिए बेचैन हो रही थीं। उनको हां या ना, कुछ भी कहने के बदले मैंने उनसे पूछा- ‘आपने मेरा नाम कैसे… मेरा मतलब, क्या आप मुझे जानती हैं?’
उन्होंने मेरे अटैची पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखे मेरे नाम-पते की तरफ देखा और मुझसे कहा- ‘आप जयंत कुमार के भाई है न! वे इंडस्ट्री में मेरे कलीग रहे… दोस्तनुमा… बहुत ही जोवियल। आपकी भी बहुत बात करते। आप तो कॉलेज में लेक्चरर हैं न?’
‘कॉलेज में पढ़ाता था, अब रिटायर हो चुका हूं।’ (कह तो दिया, फिर लगा कि इन्हें यह सब कहने की क्या जरूरत थी।) वे भाई, हमारे परिवार, हमारी कॉलोनी से संबंधित जानकारी देती जा रही थीं। उनको सुनने के साथ-साथ मेरे मन में चल रहा था कि अगर उन्हें मेरे साथ एक कमरे में रहने में कोई एतराज नहीं, तो मुझे आपत्ति क्योंं हो? वैसे भी इस उम्र में अपनी पहचान को देह से ऊपर उठा कर आत्मसत्य तक ले जाने में ही हित है।
‘आपका नाम? आपने शायद बताया तो था, पर मेरे दिमाग में नहीं रहा… हमें किस कमरे में चलना है, कार्ड में नंबर देखिए।’
‘मैं किरण हूं, किरण शर्मा। हमें थर्ड फ्लोर पर तीन सौ सोलह नंबर में जाना है।’
मैं ग्रुप मैनेजर से कुछ कहता, उससे पहले आदेश देते से स्वर में वे उसे सूचित कर रही थीं- ‘अमित, डॉ. कुमार हमारे परिवार के बहुत पुराने जानकार और मेरे छोटे भाई जैसे हैं। हमारे ये दो अटैची केस हमारे कमरे में भिजवा दीजिए।’
‘आंटी जी, डॉ साहेब, जल्दी से आप लोग डाइनिंग हॉल में आ जाइए, लंच लग चुका है… चार बजे बस आ जाएगी। शाम को हमें मिरेकल गार्डन जाना है। एक-डेढ़ घंटा तो वहां पहुंचने में लग जाएगा।’
मन हुआ कि सीधे डाइनिंग हॉल में चला जाऊं, सामान तो पहुंच ही रहा है, पर सभ्यता के तकाजे मैं उनके साथ कमरे में आ गया। कमरे को देख मन खुश हो गया। परदे को जरा-सा सरकाते ही कांच के स्लाइडिंग दरवाजे से खुली बालकनी में पहुंचा। खुली हवा में चैन की सांस आई। सुबह दिल्ली की सर्दी में जैकेट पहन कर आया था, उसकी इस वक्त यहां बिल्कुल जरूरत नहीं थी। जैकेट उतार, उसे अंदर रखने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अचानक सामने प्रकट हुर्इं किरण जी से टकरा जाता, अगर बीच में पारदर्शी कांच की दीवार न होती!
मैं वहीं ठिठक गया था। वे मुस्कुराते हुए बोलीं- ‘वीके, तुम्हें किस साइड का बेड लेना है, मुझे बता दो। मैं अपना बैग रख के रेस्तरां में जा रही हूं।’
मेरे मुंह से निकला- ‘आप जाइए, मैं सब कुछ देख लूंगा।’
निश्चित रूप से बॉल्कनी की तरफ के बेड को मेरा मन बन चुन चुका था। इकट््ठे बिछे ट्विन बेड मुझे चुभ रहे थे। तत्काल रिसेप्शन पर फोन किया, लड़कों को बुलवाया, बिस्तर को अलग करवाया और बीच में टेबल रखवा दी। सोचा, रात को अपने बेड के फालतू तकिए और कुशन इस टेबल पर रख दूंगा, ताकि वे न मेरा चेहरा देख सकें, न मैं उनका।
योंं अब मैं मुक्त मन से डाइनिंग हॉल की तरफ जा रहा था, पर मेरे मन में चल रहा था कि वैसे तो ‘सचदेवा ट्रैवल्ज’ के साथ ट्रैवल करने वाले सभी टूरिस्ट जानते हैं कि इनके साथ आने वाले अधिकतर सीनियर सिटीजन ही होते हैं। उनमें जोड़े भी होते हैं, पर एकल महिलाओं और पुरुषों की संख्या भी कम नहीं होती। इतने बड़े या कहूं, बुजुर्ग हो जाने पर भी ‘यह औरत है, यह आदमी है’ की मानसिकता से हम मुक्त नहीं हो पाते। दूसरों की क्या कहूं, किरण जी के मुंह से अपने लिए अनौपचारिक ‘वीके’ संबोधन सुनने और ‘अपना भाई’ कहे जाने के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं था।
खाने की खुशबुओं में पहुंच कर महसूस हुआ कि मुझे तो बहुत भूख लगी हुई है। चारों तरफ आंखें घुमाई कि कहां बैठा जाए। दो जन वाली टेबलों के कोने वाली टेबल पर किरण जी बैठी हुई दिख गर्इं। प्लेट को टेबल पर रख कर बैठ ही रहा था कि किरण जी की आत्मीयता शुरू हो गई- ‘बस यह खाओगे, तभी तो सीखची हो। कुमार साहेब तो अच्छे-खासे, खाने-पीने वाले तंदरुस्त, हैंडसम…’ वे और बोलती जातीं, पर उनको वहीं रोक देने के इरादे से मैंने कहा- ‘भाई अब नहीं हैं। उनको गए हुए भी चार साल से ज्यादा होने को आए।’ वे चुप हो गर्इं। उनकी चुप्पी में मुझे भाई के प्रति चाहत और लगाव नजर आ रहा था। उनको उबारने के लिए, उनके पूछने से पहले ही मैंने उन्हें बताया- ‘भाई को कैंसर हो गया था। तभी से पीने-खाने के बारे में बहुत सचेत हो गया हूं। नियमित प्राणायाम, मेडिटेशन करने की कोशिश रहती है। वैसे हम सब स्वस्थ और खुश रहें, यही कामना है। पतले या मोटे होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता।’
खाने के बाद किरण जी कमरे में चली गई थीं। मुझे लगा, कमरे में जाने से अच्छा है, नीचे लाऊंज में बैठना।
‘आप यहां क्यों बैठे हुए हैं? बाहर बस आ चुकी है, वहीं चलते हैं। अपनी पसंद की सीट मिल जाएगी।’
ग्रुप की उन भद्र महिला के साथ बस की आगे वाली सीट हमें मिल गई थी। वे बड़े सहज ढंग से मुझे बता रही थीं कि उनकी रूम पार्टनर, अपनी बहन-बहनोई के साथ आई है। चार सहेलियां जालंधर से हैं। अमृतसर से नौ-दस जनों का पूरा गुट है। भाटिया साहब हमेशा की तरह छोटे सचदेवा के साथ उसके कमरे में हैं। बाकी मियां-बीवी के जोड़े। रह गए हम तीन- कहीं की र्इंट कहीं के रोड़े। पर मैं अपने आप को अकेला नहीं कहती। पति के जाने के बाद मैंने अपनी बेटी से कह दिया, बेटा मुझे अपने साथ अपने घर पर रहने के लिए कहना भी नहीं। अब मैं न किसी के बंधन में रहना चाहती हूं, न किसी को बांधना चाहती हूं। सबके साथ पर अपने एकांत में।’
मैंने उनसे कहना चाहा था, ‘आप बिल्कुल ठीक कहती हैं।’ पर अचानक गायब और अचानक प्रकट हो जाने वाली किरण जी बस के अंदर प्रवेश करते हुए हमारी सीट के डंडे को पकड़ कर कह रही थीं, ‘वीके तुमने मेरे लिए सीट नहीं रखी?’ उनको कुछ भी जवाब देने के बजाय उठ कर उन्हें वहां बैठ जाने का इशारा करते हुए मैं पीछे चला गया था।
मिरेकल गार्डन में पहुंच कर लगा कि चलो शाम की सैर ही हो जाएगी। प्रवेश करते ही सामना हुआ ढेर सारी बिल्लियों से, जो अपनी चमकती-दमकती आंखों से हमारा स्वागत कर रही थीं! ये हाड़-मांस की बिल्लियां नहीं, हरियाली की बिल्लियां हैं। लाल, नीले, सफेद, पीले, गुलानारी रंगों के पिटूनिया की चमक और खिलाव को देख, उनके पास जाता हूं, यह देखने के लिए कि ये असली तो हैं! ढलती शाम के झुटपुटे में रंगीन बत्तियों की रोशनियों में पानी के फव्वारे हरियाली में जादुई जाल बुन देते हैं। इसे महसूस करने के लिए मैं परिधि के एक कुंज में, इक्कीस दिरहम (लगभग साढ़े चार सौ रुपए) की चाय लेकर आ बैठा। चाय के घूंट ने चेताया कि साढ़े सात तो बस के पास पहुंचना था! तेज-तेज कदम बढ़ा कर गेट के पास पहुंचा तो देखा कि किरण जी दूर से ही हाथ हिला कर ऊंचे स्वर में कह रही हैं- ‘सुशीला, वो आ रहे हैं जनाब!’
मिरेकल गार्डन से लौट कर डिनर के बाद ही कमरे में आए थे। तब साढ़े दस बज रहे थे। सुबह दस बजे ‘साईट सीर्इंग’ के लिए निकलना था। रात की दवाई अभी लेनी थी। एक सिगरेट तो पी लूं, अभी सोच ही रहा था कि किरण जी की आवाज कान में पड़ी- ‘मैं अपने लिए कॉफी बना रही हूं, तुम पियोगे?… देखो, ‘कुमार साहब’ के नाते मैं सुबह से तुमसे तू तड़ाक से बात कर रही हूं। दरअसल, फालतू की फॉरमैलिटी मेरे से निभती नहीं। तुम जरा प्राईवेट किस्म के आदमी लग रहे हो, इसलिए बुरा नहीं मानना।’
‘थैंक्स, मैं कॉफी नहीं पीता। बस आप मुझे यह बता दीजिए कि आप सुबह कब उठती हैं? सुबह जल्दी उठने वालों में मैं नहीं हूं। वैसे यहां थोड़ा जल्दी तो उठना ही पड़ेगा। नाता यहां साढ़े सात बजे शुरू हो जाता है। पेट की प्रॉबलम की वजह से, मुझको सुबह ज्यादा वक्त लगता है। सुबह साढ़े चार या पांच बजे का अलार्म लगाऊंगा। आपको थोड़ी डिस्टरबेंस तो होगी, पर मेरी कोशिश होगी कि अधिकतम सात नहीं, तो सवा सात बजे तक पूरा कमरा आपके डिसपोसल पर हो।’
यह तो अच्छा हुआ कि यहां के मौसम की ठीक-ठीक जानकारी न होने से बैग में एक दो पाजामे डाल लिए थे। सिगरेट को भूल, किरण के कॉफी पीने तक मैंने वॉशरूम में जाकर रात के लिए कपड़े पहन लिए थे।
दवाई लेकर, बालकनी की तरफ मुंह कर सोने की कोशिश कर रहा था। मन में चल रहा था, उनका ज्यादा बेतकल्लुफ व्यवहार भी तो शायद अपने को सहज रखने का प्रयास ही हो! बाद के दिनों में मैंने नोटिस किया कि सबके बीच में तो नहीं, अकेले पड़ने पर वे भाई का कोई संदर्भ उठा लेतीं। उस दिन हम अबूदबी की विख्यात मस्जिद देखने गए थे। महिलाओं के लिए निर्देश था कि वे सिर से पांव तक ढके हुए कपड़ों में हों। वैसे साढ़े सात सौ दिरहाम किराया देकर बुर्का मिल सकता था। जांच-पड़ताल के समय किरण और सुशीला जी को रोक लिया गया था। मुझे पूरी बांहों की जैकेट पहने देख वे दोनों मेरे पास आई थीं। ‘आप अपनी जैकेट किरण को दे दीजिए।’ सुशीला जी ने कहा था।
उसके बाद रात को सोने का वक्त हुआ तो मुझे सुनाने को उनका आत्मालाप शुरू हो गया- ‘धन्यवाद सुशीला जी, आपके त्याग और वीके की जैकेट की वजह से मस्जिद देखनी नसीब हो गई।… जयंत कुमार जी, आप जहां कहीं भी हों, मेरे मन की बात तो आप तक पहुंचेगी ही।… मैं आपके भाई की शिकायत नहीं कर रही, पर आप दोनों में कितना फर्क है। चालीस-पैंतालीस बरस पहले लगभग एक साथ मैंने अपने इकलौते छोटे भाई और मंगेतर को खोया था। मैं उन दिनों पागल-सी हो गई थी। यह तुम्ही थे, जो सच्चे मन से मुझसे कहते थे- ‘मैं हूं न तुम्हारा भाई!’ और आज के शाहरुख खान की तरह बांहें फैला ‘तू है मेरी किरण’ से मुझ रोती हुई को हंसा देते थे।’
मैं देखता कि किरण जी इन स्मृतियों से अपने वर्तमान के अकेलेपन को ठेंगा दिखा रही हैं। तो कभी दोपहर और शाम के बीच के आराम के लिए मिले अंतराल में मुझसे यह कह कर कि मुझे शॉपिंग का बहुत शौक है, स्थानीय मार्केट में निकल जातीं। एक किरण जी ही थीं, जो ग्रुप के हर जन से बोलती-बतियाती थीं। बस का ड्राइवर हो, गाईड हो, होटल के मैनेजर से लेकर रिसेपशनिस्ट तक से उनका संवाद चलता। इस सबके बावजूद वे दिखतीं एक बेचैन और भटकती आत्मा थीं। दूसरी तरफ सुशीला जी- जो सबके बीच होते हुए भी होतीं बस अपने साथ। अपनी स्थायी मुस्कुराहट लिए। सुबह-शाम कुछ न कुछ देखने और कहीं न कहीं जाने की वजह से, पांच रातें बीत गर्इं, पता ही नहीं चला और लौटने का दिन आ गया।
लौटने की वेला में चेक आउट कर चाभी रिसेप्शन पर देकर अमित से किरण जी के बारे में पूछा। उसने मुस्कुराते हुए कहा- ‘निश्चिंत रहिए, वे हमेशा आखिरी सवारी होती हैं।’
दुबई का पड़ाव खत्म हो रहा था, पर यात्रा अभी शेष नहीं हुई थी। जैसे ही बस ने एअरपोर्ट पर छोड़ा, सारा परिदृश्य ही बदल गया। सामूहिकता अपने छोटे निजी गुटों और अपने-अपने में सिमट रही थी। यात्राएं ऐसे ही संपृक्ति और असंपृक्ति, लगाव और अलगाव, ग्रहण और त्याग सिखा जाती हैं।
दिल्ली एअरपोर्ट पर उतरे, तो पता नहीं किधर से अपनी ट्रॉली लिए किरण जी मेरे सामने आ खड़ी हुर्इं- ‘तुम्हारा बेटा आ रहा है न! मुझे बस कहीं बाहर छोड़ देना, जहां टैक्सी मिल जाए।’
‘टैक्सी तो यहीं मिल जाएगी।’
‘मुझे बाहर छोड़ देना।’ और वे मेरे साथ-साथ चली आर्इं। मैं उन्हें क्या कहता! बाहर निकलते ही मैंने बेटे को देख लिया था। बेचैन मन से उन्हें बेटे से मिलवाया, ‘बेटा ये किरण शर्मा जी हैं, तुम्हारे ताया जी की कलीग थीं और दोस्त भी। दुबई में ये हमारे साथ थीं। इन्हें बाहर मेन रोड पर, जहां ये कहें, उतार देना।’
मैं जानता था बेटे को अच्छा नहीं लगेगा। खीज में उसने मेरी अटैची के हैंडल को इस बुरी तरह से खींचा कि वह टूट गया। चुप्पी लिए तनाव में हम गाड़ी में बैठ गए थे। ‘आंटी, मेन रोड पर आपको कुछ नहीं मिलेगा। आपको जाना कहां है?’ किरण के ‘छतरपुर’ कहने पर उसने उन्हें समझाने के अंदाज में कहा, ‘हम तो नोएडा जा रहे हैं। छतरपुर बिल्कुल दूसरी तरफ है। आपको कहां छोडूं?’
‘महिपालपुर के मेट्रो स्टेशन पर। वहां से मुझको टैक्सी मिल जाएगी।’
डेढ़-दो बजे वहां भी सन्नाटा था। टैक्सी-आॅटो का नामोनिशान नहीं। मुझे दोहरी टेंशन हो रही थी। किरण को वहां नहीं छोड़ा जा सकता था। बेटे से भी कहता, तो क्या कहता। ‘किरण जी आपको एअरपोर्ट से ही टैक्सी ले लेनी चाहिए थी। अब बताइए, आपको कहां उतारें।’ मेरे मन का सच बाहर आ गया था। बेटे ने ड्राईवर को छतरपुर की तरफ गाड़ी बढ़ाने का निर्देश दे दिया था। जैसे ही छतरपुर का चौक दिखा, उसके ‘आंटी’
बोलते ही हाथ ऊपर उठा कर किरण ने कहा, ‘बस यहीं, गाड़ी एक तरफ खड़ी कर लो।’ वे गाड़ी से उतर गई थीं।
‘किरण जी, आप सुबह जितने बजे भी उठें, अपने पहुंचने की सूचना जरूर दीजिएगा।’ मैंने कहा।

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