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शख्सियत: श्रीनिवास रामानुजन

1909 में रामानुजन की शादी हो गई। नौकरी ढूंढ़ने के दौरान वे कई प्रभावशाली व्यक्तियों के संपर्क में आए। नेल्लोर के कलेक्टर और ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसाइटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उनमें से एक थे।

Author Updated: December 15, 2019 6:18 AM
1903 में रामानुजन ने दसवीं की परीक्षा पास की।

श्रीनिवास रामानुजन महान भारतीय गणितज्ञ थे। उन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। उनका जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी के इरोड में तमिल परिवार में हुआ था। 1 अक्तूबर, 1892 को रामानुजन का दाखिला कांचीपुरम के स्थानीय स्कूल में करा दिया गया था। पर नाना के नौकरी छोड़ने के कारण रामानुजन अपनी मां के साथ कुंभकोणम चले आए और उनका दाखिला कंगायन प्राइमरी स्कूल में कराया गया। 1897 में रामानुजन ने प्राथमिक परीक्षा में जिले में अव्वल स्थान हासिल किया। ग्यारह साल की उम्र में उन्हें कॉलेज स्तर के गणित का ज्ञान हो गया था। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें मेरिट सर्टिफिकेट और अकादमिक पुरस्कार मिल गए थे। 1902 में रामानुजन ने बताया कि क्यूबिक समीकरणों को कैसे हल किया जाता है और उन्होंने चतुर्घात समीकरण हल करने का सूत्र खोज निकाला।

1903 में रामानुजन ने दसवीं की परीक्षा पास की। बारहवीं की परीक्षा में वे गणित को छोड़ कर अन्य सभी विषयों में फेल हो गए। दिसंबर, 1906 में रामानुजन ने स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में बारहवीं की परीक्षा दी, लेकिन वे असफल रहे। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।

शोधपत्र ने दिलाई शोहरत
1909 में रामानुजन की शादी हो गई। नौकरी ढूंढ़ने के दौरान वे कई प्रभावशाली व्यक्तियों के संपर्क में आए। नेल्लोर के कलेक्टर और ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसाइटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उनमें से एक थे। राव के साथ उन्होंने एक साल काम किया। इसके लिए उन्हें पचीस रुपए महीना मिलता था। इस दौरान उन्होंने ‘इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी’ के जर्नल के लिए प्रश्न और उनके हल तैयार करने का काम किया। 1911 में बनोर्ली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें शोहरत मिली। 1912 में उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई।

कैंब्रिज का न्योता
मद्रास के इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर सीएलओ ग्रिफिक्स ने रामानुजन के शोध पत्र गणित विद्वानों को भिजवाए। प्रोफेसर हार्डी इस पत्र से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज आने का न्योता भेज दिया। मार्च, 1914 में जब रामानुजन लंदन पहुंचे, तो उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में प्रवेश मिला। इंग्लैंड में रह कर बहुत थोड़े ही समय में उन्होंने अपनी धाक जमा ली। 1916 में रामानुजन ने कैंब्रिज से बीएससी की डिग्री ली। इसी दौरान रामानुजन और हार्डी का काम गणित की दुनिया में सुर्खियां बनने लगा था। रामानुजन के लेख मशहूर पत्रिकाओं में छपने लगे थे। 1918 में रामानुजन को कैंब्रिज फिलोसॉफिकल सोसाइटी, रॉयल सोसाइटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, तीनों का फेलो चुना गया। रामानुजन के शोध प्रबंध का सार जर्नल आॅफ लंदन मैथेमेटिकल सोसाइटी में पचास पृष्ठों में विस्तार से छापा गया।

कार्य और उपलब्धियां
रामानुजन ने खुद से गणित सीखा था। उन्होंने अपने जीवन में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया था। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध हो चुके हैं। उन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारंपरिक परिणाम निकाले, जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहे हैं। भारत सरकार ने श्रीनिवास रामानुजन के जन्म दिवस यानी 22 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ घोषित किया।

निधन : रामानुजन को लंदन में क्षय रोग ने घेर लिया। उस समय क्षय रोग का कारगर इलाज उपलब्ध नहीं था, जिसके चलते इनका स्वास्थ्य दिन-ब-दिन गिरने लगा और 27 फरवरी, 1919 को उन्हें भारत लौटना पड़ा। अंतत: तैंतीस वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया।

 

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