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रोशनी की मीनारें

समुद्री किनारे का सही अनुमान न होने की स्थिति में उसे अनेक जटिल और खतरनाक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। बचपन में सिंदबाद की समुद्री यात्राओं के बारे में हम पढ़ा करते थे। उन रोचक और रोमांचकारी यात्राओं में दिशा और समुद्री किनारे की समझ गड़बड़ा जाने पर सिंदबाद और उसके साथी यात्रियों को नाना प्रकार के कष्ट झेलने पड़े थे।

Author Published on: November 3, 2019 5:24 AM
अरब के व्यापारी समुद्री रास्ते की जानकारी छिपा कर रखते थे।

समुद्री सफर में सबसे महत्त्वपूर्ण होता है जहाजी बेड़े को गंतव्य का सही दिशा ज्ञान। दिशा ज्ञान गड़बड़ा जाने से अक्सर जहाज अपना रास्ता भटक जाते हैं। जब तक दिशा-सूचक यंत्र का विकास नहीं हुआ था, जहाज अक्सर रास्ता भटक जाया करते थे। कोलंबस की समुद्री यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। मगर धीरे-धीरे दिशा-सूचक यंत्र का विकास हुआ और फिर समुद्री किनारों का निर्माण कराया गया। लाइट हाउस बने। इस तरह समुद्री यात्राएं सुगम हो गर्इं। लाइट हाउसों के बनने और उनके संचालन की कहानी बहुत दिलचस्प है। प्रकाश-स्तंभों और लाइट हाउसों के बारे में जानकारी दे रहे हैं मिथिलेश श्रीवास्तव।

समुद्री यात्राओं में दो चीजें हमेशा महत्त्वपूर्ण रही हैं- दिशा और समुद्री किनारा। एक नाविक समुद्र में बेड़ा उतारने से पहले अपने गंतव्य स्थान की दिशा का निर्धारण कर लेता था और उम्मीद की जाती थी कि वह समुद्री किनारे की भौगोलिकता को समझ रहा होगा। दिशाहीन होने पर वह कहीं के लिए निकल कर कहीं और पहुंच जाया करता था। समुद्री किनारे का सही अनुमान न होने की स्थिति में उसे अनेक जटिल और खतरनाक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। बचपन में सिंदबाद की समुद्री यात्राओं के बारे में हम पढ़ा करते थे। उन रोचक और रोमांचकारी यात्राओं में दिशा और समुद्री किनारे की समझ गड़बड़ा जाने पर सिंदबाद और उसके साथी यात्रियों को नाना प्रकार के कष्ट झेलने पड़े थे।

कोलंबस की कहानी भी रोमांचक थी। वह इंडिया की खोज में निकला और दिशा भटक जाने के कारण अमेरिका चला गया। उसके दिशा भटकने से एक फायदा यह हुआ कि दुनिया को अमेरिका का पता चल गया। कोलंबस इतालियन समुद्री यात्री था, जिसने अपने जीवन काल में अटलांटिक महासागर में चार समुद्री यात्राएं पूरी की थी। उसे भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान और इतिहास की काफी अच्छी जानकारी थी। उसकी योजना सुदूर पूर्वी देशों से समुद्र के रास्ते मसालों का व्यापार करके मुनाफा कमाने की थी, लेकिन दिशाभ्रम के चलते वह अमेरिका महादेश की और चला गया।

मध्यकाल में भारत आने वाले समुद्री यात्रियों में जिसका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है वह है पुर्तगाली समुद्री यात्री वास्को डी-गामा, जो यूरोप और हिंदुस्तान के बीच समुद्री रास्ता खोजने के मकसद से 8 जुलाई,1497 को पुर्तगाल से अपने जहाजी बेड़े के साथ समुद्र में उतरा। उसकी यह यात्रा तत्कालीन पुर्तगाली सम्राट और चर्च के समर्थन से हुई थी। दरअसल, उन दिनों भारत के मसालों, खासकर काली मिर्च, की यूरोप में काफी चर्चा थी और मांग भी। भारत से मसालों का निर्यात अरब देशों के व्यापारियों के माध्यम से हो रहा था और इस व्यवसाय पर अरबों का आधिपत्य था। यूरोप में इस व्यापार पर अरबों के एकछत्र आधिपत्य को लेकर रोष था। यूरोप और पूर्व एशिया को जोड़ने वाले समुद्री रास्ते खोजने की आवश्यकता यूरोपीय देशों में महसूस की गई।

अरब के व्यापारी समुद्री रास्ते की जानकारी छिपा कर रखते थे। काली मिर्च को उन दिनों काला सोना भी कहा जाता था। मालाबार तटीय क्षेत्र में दुनिया की सबसे बेहतरीन काली मिर्च की पैदवार होती थी। लिस्बन बंदरगाह से चार जहाजी बेड़े में एक सौ सत्तर नाविकों और मजदूरों के साथ वास्को डी-गामा निकला था। मोजांबिक, मालिंदी और केप आॅफ गुड होप होते हुए कई महीनों की समुद्री यात्रा के बाद वह 17 मई, 1498 को कालीकट बंदरगाह पर पहुंचा, लेकिन वहां के शासक ने उसे व्यापार की इजाजत नहीं दी, तो उसे उत्तर की ओर बढ़ना पड़ा। कालीकट से वह कन्ननुर पहुंचा, जहां कन्ननुर के राजा ने वास्को का दिल से स्वागत किया। मसाले और काली मिर्च अपने जहाज में लादकर वह पुर्तगाल लौट गया। कन्ननुर में विकसित बंदरगाह उन दिनों भी था और अरब और यूरोप से समुद्री रास्ते से व्यवसाय चल रहा था।

दिशा-सूचक की खोज
समुद्री यात्राओं के लिए कंपास की वैज्ञानिक खोज एक तरह से नाविकों के लिए वरदान साबित हुई, जिससे दिशाभ्रम की समस्या का कुछ हद तक हल मिला। प्राचीन काल में समुद्री यात्री आकाश में दिख रहे तारों के सहारे समुद्री यात्राएं करते थे, क्योंकि तारे ही दिशा का ज्ञान करा सकते थे। लेकिन दिन या बदली वाली रात में तारे दिखते नहीं थे, इसलिए किनारे से दूर गहरे समुद्र में उतरना असुरक्षित और जोखिम भरा रहता होगा। इत्तेफाकन लोडस्टोन नामक एक पत्थर की खोज लगभग नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच चीनियों ने की। लोडस्टोन की खासियत यह थी कि उसमें प्राकृतिक रूप से चुंबकीय गुण उपलब्ध थे। लोडस्टोन के इसी गुण का उपयोग करके चीनियों ने कंपास का अविष्कार किया और इसकी वजह से दिशा-ज्ञान के लिए तारों पर निर्भरता कुछ कम हुई होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। कंपास बनाने की यह प्रौद्योगिकी यूरोप और अरब देशों में पहुंची। कंपास की वजह से समुद्री यात्राएं कुछ सुरक्षित हुर्इं और समुद्री बेड़े सुदूर समुद्र में जाने का साहस करने लगे।

कंपास के इजाद से समुद्री रास्ते से व्यापार बढ़ा और समुद्री यात्राओं की वजह से आविष्कारों के एक नए युग का प्रारंभ हुआ। कंपास का अविष्कार लगभग दो हजार साल पहले हुआ था। पहले कंपास का आविष्कार चीन के ह्यूयान वंश के शासन के दौरान 202 ईसापूर्व और 220 ईसवी के बीच हुआ, जो कि प्राकृतिक रूप से चुंबक आवेशित लौह पत्थर का बनता था। चीन के ही सुंग राजवंश के समय से इस कंपास का इस्तेमाल समुद्री यात्राओं के दौरान दिशाबोध के लिए होने लगा। धीरे-धीरे कंपास के संरचनात्मक स्वरूप में काफी बदलाव आया। इसके आविष्कार से पहले नाविक दिशा ज्ञान, भौगोलिक स्थितियों और समुद्र में दिशाबोध के लिए लैंडमार्क याद रखते थे और ग्रहों और नक्षत्रों की अवस्थिति का ज्ञान रखा जाता। समुद्र तट के संज्ञान के लिए इंसान ने प्रकाश का उपयोग करना शुरू किया। समुद्री तटों पर जगह-जगह प्रकाश-स्तंभों की व्यवस्था की गई, जहां से प्रकाश की किरणें समुद्र के ऊपर रात में फैलतीं और उन्हीं प्रकाश किरणों को देख कर गहरे समुद्र में जहाजी बेड़ों को किनारे का पता चलता। जैसा कि हर व्यवस्था का एक क्रमिक वैज्ञानिक विकास होता है, इन प्रकाश-स्तंभों की प्रौद्योगिकी का भी विकास हुआ है और इसका इतिहास भी काफी दिलचस्प है।

प्रकाश-स्तंभ
आज इन प्रकाश-स्तंभों को ‘लाइट हाउस’ कहते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडीशा, पश्चिम बंगाल के समुद्री तटों पर भारत सरकार की ओर से करीब दो सौ लाइट हॉउसों का निर्माण हुआ है। भारतीय समुद्री तट पश्चिम बंगाल से शुरू होकर गुजरात तक फैला हुआ है, जिसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी है, दूसरी तरफ अरब सागर है और इन दोनों के बीच हिंद महासागर है। लाइट हाउसों की व्यवस्था, निर्माण, प्रशासन भारत सरकार के जहाजरानी मंत्रालय के अधीन कार्यरत लाइट हाउस महानिदेशालय करता है। लाइट हाउसों में जलने वाले दीपों का प्रारंभिक रूप हमारे घरों में जलने वाली लालटेन से समझा जा सकता है, जिसके बत्ती, तेल और कांच मुख्य अंग हैं। लाइट हाउस का मूल सिद्धांत इतना है कि लालटेन जला कर उसे किसी ऊंची जगह पर रख दिया जाता, ताकि प्रकाश समुद्र में दूर-दूर तक दिखाई दे सके और जहाजी बेड़े के कप्तान को किनारे का आभास हो सके। ऊंची जगहों की जगह आज मीनारों ने ले ली है, बत्ती और तेल की जगह बिजली चालित और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने ली है और लालटेन हाउस का भी आधुनिकीकरण हो गया है।

मीनार, भवन या इमारत का निर्माण ऐसे किया गया कि जहां से लैंप और लेंस से बनी डिवाइस से प्रकाश किरणें निकलती हैं और दूर-दूर तक देखी जा सकती हैं। लाइट हाउस से निकली रोशनी बताती है कि आसपास कोई समुद्री किनारा है, कोई द्वीप है, कोई पहाड़ी है आदि। जितनी ऊंचाई पर प्रकाश स्रोत रखा जाएगा उतनी ही दूर तक प्रकाश किरणें दिखाई देंगी। लाइट हाउस की ऊंचाई इसीलिए काफी रखी जाती है, ताकि प्रकाश समुद्र में दूर तक दिखाई दे। समय के साथ लाइट हाउस की बनावट की प्रविधि, प्रकाश स्रोतों का आधुनिकीकरण किया गया है। एक लालटेन से शुरू होकर आज प्रकाश स्रोतों के रूप में लेंस और लेजर तक का इस्तेमाल होने लगा है। ऐसी प्रकाश किरणें जहाजियों और स्थानीय मछुआरों को समुद्र में समुद्री तटों का बोध कराती हैं। लाइट हाउस की मदद से खतरनाक समुद्री किनारों, खतरनाक समुद्री इलाकों की पहचान और निशानदेही कराई जा सकती है। लाइट हाउस की मदद से जहाजों को सुरक्षित तरीके से बंदरगाह में प्रवेश कराया जा सकता है। भारतीय समुद्री सीमा के भीतर अवस्थित भारतीय द्विपों और समुद्र तटों पर अब तक महानिदेशालय ने 194 लाइट हाउसों का निर्माण किया है। इनमें से अनेक के निर्माण के सौ साल से अधिक हो चुके हैं। इनके निर्माण की अद्भुत कहनियां हैं।

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