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शख्सियत: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

उनके उपन्यास चरित्रहीन पर आधारित 1974 में इसी नाम से फिल्म बनी थी। उसके बाद ‘देवदास’ को आधार बनाकर देवदास फिल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार और लघुकथाकार शरतचंद्र चट््टोपाध्याय भारत के सार्वकालिक, सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक हैं। उनका जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ था। उनका बचपन देवानंदपुर में तथा कैशोर्य भागलपुर में बीता। भागलपुर में शरतचंद्र का ननिहाल था। गरीबी और अभाव में पलने के बावजूद शरत दिल के बादशाह और स्वभाव से नटखट थे। उनके प्रसिद्ध पात्र देवदास, श्रीकांत, सत्यसाची, दुर्दांत राम आदि के चरित्र को देखें तो उनके बचपन की शरारतें सहज दिख जाएंगी।

सन 1883 में शरतचंद्र का दाखिला भागलपुर के दुर्गाचरण एमई स्कूल में कराया गया। छात्रवृत्ति पाकर शरत ने टीएन जुबिली कालेजिएट स्कूल में प्रवेश किया। उनकी प्रतिभा उत्तरोत्तर विकसित होती गई। 1893 में हुगली स्कूल के समय उनकी रुचि साहित्य की तरफ हुई। इसी समय उन्होंने भागलपुर की साहित्य सभा की स्थापना की। सभा का मुखपत्र हस्तलिखित मासिक पत्र ‘छाया’ था। इन्हीं दिनों उन्होंने ‘बासा’ (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। उनकी कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही रह गई।

कॉलेज छोड़ कर 1896 से लेकर 1899 तक शरतचंद्र भागलपुर के आदमपुर क्लब के सदस्ययों के साथ खेलकूद और अभिनय करके समय काटते रहे। इसी समय बिभूतिभूषण भट््ट के घर से उन्होंने एक साहित्यसभा का संचालन किया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने ‘बड़ी दीदी’, ‘देवदास’, ‘चंद्रनाथ’, ‘शुभदा’ आदि उपन्यास और ‘अनुपमार प्रेम’, ‘आलो ओ छाया’, ‘बोझा’, ‘हरिचरण’ आदि कहानियां लिखीं।

शरतचंद्र 1903 में रंगून चले गए। वहां उन्होंने रेलवे के आॅडिट आफिस में अस्थायी नौकरी की। उन्हीं दिनों उनका संपर्क बंगचंद्र नामक एक व्यक्ति से हुआ जो था, तो बड़ा विद्वान, पर शराबी और उछृंखल था। यहीं से ‘चरित्रहीन’ का बीज पड़ा, जिसमें मेस जीवन के वर्णन के साथ मेस की नौकरानी (सावित्री) से प्रेम की कहानी है। बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘श्रीकांत’ लिखना शुरू किया, जो 1917 में प्रकाशित हुआ।

1921 में उन्होंने कांग्रेस के आंदोलन में हिस्सा लिया। 1922 में आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘श्रीकान्त’ (प्रथम पर्व) का अंग्रेजी रूपांतर प्रकाशित हुआ। उसके बाद से शरत् के यश में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। 1936 में ढाका विश्वविद्यालय ने उन्हें आनरेरी डी. लिट्. की उपाधि प्रदान की।

प्रमुख कृतियां
शरतचंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे, जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, चरित्रहीन, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, शुभदा, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर ‘पथेर दावी’ उपन्यास लिखा। इसके अलावा षोडशी, रमा, बिराज बहू, विजया आदि नाटकों और रामेर सुमति, बिंदुर छेले, पथ-निर्देश, आंधारे आलो, दर्पचूर्ण, काशीनाथ, छबि, बिलासी, मामलार फल, अभागीर स्वर्ग, अनुराधा, सती आदि कहानियां लिखीं। इसके अलावा कई निबंध भी लिखे।

प्रसिद्धि और विरोध
शरतचंद्र चट््टोपाध्याय ने समाज के निचले तबके को पहचान दिलाई। पर, उन्हें उनके दुस्साहस के लिए समाज के रोष का पात्र भी बनना पड़ा। ‘चरित्रहीन’ को लेकर उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा था, क्योंकि उसमें उस समय की मान्यताओं और परंपराओं को चुनौती दी गई थी। उन्होंने सुंदरता की जगह कुरूपता को प्रमुखता दी।

रचनाओं पर फिल्में
उनके कुछ उपन्यासों पर आधारित हिंदी फिल्में भी बनी हैं। उनके उपन्यास चरित्रहीन पर आधारित 1974 में इसी नाम से फिल्म बनी थी। उसके बाद ‘देवदास’ को आधार बनाकर देवदास फिल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है। पहली देवदास कुंदन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी दिलीप कुमार, वैजयंती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत। इसके अलावा ‘परिणीता’ और ‘बड़ी दीदी’ तथा ‘मंझली बहन’ आदि फिल्में बनी हैं।

निधन : 16 जनवरी, 1938 को कलकत्ता पार्क नर्सिंग होम में अवस्था में उनका निधन हो गया।

 

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