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जरूरी है समाज की भागीदारी

समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराधियों के बच निकलने के रास्ते बंद करना और कड़े दंड का प्राधान जरूरी है, पर यह अपराध को खत्म होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि उन स्थितियों को खत्म किया जाए, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं।

महिलाओं से विभेदीकरण की नीति क्यों अपनाई जाती है!

लालजी जायसवाल

भारतीय समाज प्राचीन काल से लेकर उत्तर-आधुनिक काल तक अपनी सभ्यताओं और संस्कृतियों के कारण समूचे विश्व में आदर्श रहा है। यह सदा से अपनी मानवीय भावनाओं और नैतिकता का परिचय देता रहा है। इसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी अपना कीर्तिमान स्थापित किए हुए है। भारत की अतुलनीय संस्कृति और सामाजिक विरासत सदा से श्रेष्ठता को प्रदर्शित करती रही है, लेकिन इसके नकारात्मक पक्ष भी विद्यमान हैं। आज समाज में महिलाओं का हर स्वरूप शोषित हो रहा है, चाहे मां के रूप में हो या बेटी के रूप में या बहन या बच्ची के रूप में। आज समाज में दिन-प्रतिदिन मूल्यों और संवेदनाओं का ह्रास होता जा रहा है। सो, आज यह प्रश्न उठना आवश्यक है कि क्या समाज में महिलाओं की सुरक्षा संदिग्ध हो गई है? आखिर पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं सुरक्षा की मोहताज क्यों हो गई हैं? जबकि भारतीय संविधान में महिलाओं और पुरुषों के साथ कोई भेदभाव न करते हुए समानता का अधिकार दिया गया है। फिर महिलाओं से विभेदीकरण की नीति क्यों अपनाई जाती है!

पितृसत्तात्मक समाज की हामी भरने वालों को विचार करना चाहिए कि उसकी प्रधानता में महिलाएं स्वयं को सुरक्षित क्यों महसूस नहीं कर पा रही है? क्या जेंडर विभेदीकरण को खत्म करने का दायित्व समाज का नहीं है? निश्चित ही यह कार्य समाज का है और उसे खत्म कर महिलाओं को समानता का अधिकार देना पड़ेगा। आज जरूरत है समाज को अपने अतीत पर विचार करने की। भारतीय मानस का अतीत सिद्धांत, स्वीकार्यता और मान्यता तीनों दृष्टियों से स्त्री को श्रेष्ठ और सम्माननीय स्थान देता आया है। यहां स्त्रियों को अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए किसी संघर्ष, आंदोलन की जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल, समस्या व्यवहार की है। आज भावनाएं, संवेदनाएं, मानवीय मूल्य, सहानुभूति, समानुभूति, समानता आदि सभी तिरोहित हो चुके हैं। इसी कारण समाज अपनी मुख्यधारा से विचलित होकर विनाश की राह पर जा रहा है।

आज संचार नेटवर्क के कारण दुनिया मुठ्ठी में सिमटती जा रही है, तो दूसरी ओर हमारे सामाजिक मूल्य भी सिमटते नजर आ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि व्यक्ति फिल्म जगत और इंटरनेट से कामोत्तेजक सामग्री प्राप्त करता है, पर आपराधिक घटनाएं अपने समाज में ही मासूमों से करता है। समाज में बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में एक घंटे में चार बलात्कार होते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 2011 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में दो सौ सतहत्तर फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। निर्भया कांड के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के दर्ज मामलों में एक सौ बत्तीस फीसद की बढ़ोतरी हुई। 2017 में अकेले जनवरी महीने में दुष्कर्म के एक सौ चालीस मामले दर्ज किए गए थे। मई, 2017 तक दिल्ली में दुष्कर्म के कुल आठ सौ छत्तीस मामले दर्ज किए गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 फीसद बढ़े हैं। आज मध्यप्रदेश इनमें अव्वल है, क्योंकि बलात्कार के सबसे ज्यादा 4,882 मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश आता है, जहां 4,816 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। बलात्कार के 4,189 दर्ज मामलों के साथ महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर रहा। मगर सबसे चिंताजनक रिपोर्ट मध्यप्रदेश की है, जहां पोक्सो अधिनियम होने के बाद भी जो कि यह प्रावधान करता है कि ‘अगर बारह वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ दुष्कर्म की घटना होती है, तो मृत्युदंड की सजा दी जाएगी।’ मगर फिर भी मध्यप्रदेश में ऐसी आपराधिक घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। इसके पीछे आखिर क्या कारण है?

अपराधों के न रुकने का प्रमुख कारण नियम और कानून का ठीक से पालन न कराया जा पाना है। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उसका ठीक से पालन नहीं होता, तब तक कानून किसी काम का नहीं हो सकता। अगर पालन की बात की जाए, तो मध्यप्रदेश में यह नगण्य है। समूचे देश का भी यही हाल है। अब सोचने की बात यह है कि भ्रष्ट प्रशासन में महिलाओं की सुरक्षा कैसे की जा सकेगी? क्या आपराधिक घटनाएं अपना पैर पसारती ही जाएंगी? नहीं। इसके लिए समाज को स्वयं आगे आना होगा और समाज में पनप रहे अपराधियों का बहिष्कार करना होगा। स्वयं ही उनको पकड़ कर प्रशासन को सौंपना होगा तथा अपने बच्चों के समाजीकरण पर विशेष ध्यान देना होगा।

आज प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि समाज से अपराधियों को निष्कासित करें। महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए तमाम बनाए गए कानून जैसे कि बाल विवाह अधिनियम 1929, विशेष विवाह अधिनियम 1954, हिंदू विवाह कानून 1955, हिंदू विधवा पुनर्विवाह कानून 1856, आईपीसी 1860, मेटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हरासमेंट आॅफ वुमन इन वर्किंग प्लेस 2013 (विशाखा बनाम राजस्थान राज्य) तथा पाक्सो अधिनियम आदि। मगर प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर तमाम अधिनियमों, कड़े कानूनों के बाद भी महिलाएं असुरक्षित क्यों हैं? इसका उत्तर भी यही होगा कि भारत में कानून तो बहुत कठोर है, लेकिन पालन कराने में लचरता के कारण सभी नियम-कानून जर्जर अवस्था में पहुंच गए हैं। तभी अपराधी अपराध कर समाज में निडर होकर विचरता रहता है।

इस ओर भी ध्यान देना आवश्यक है कि आज महिलाओं के साथ घरेलू अपराध अधिक संख्या में होते हैं, पर इसका बहुत कम उल्लेख मिलता है। महिलाएं बाहर तो असुरक्षित हैं ही, चारदीवारी में भी उनकी सुरक्षा संदेह के घेरे में है। इसलिए घरेलू हिंसा की ओर भी ध्यान आकर्षित करना अत्यावश्यक है। घरेलू हिंसा में महिलाओं के साथ मारपीट, उत्पीड़न, तानेबाजी और गाली-गलौज, अपमान करना, उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाना, जबरन शादी करना आदि शामिल हैं। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे मामले कानून तक क्यों नहीं जा पाते? इसका प्रमुख कारण है कि सामाजिक दबाव, लोक-लाज, अशिक्षा तथा जागरूकता का न होना आदि समस्याएं जिम्मेदार हैं।

भारत में प्राय: सत्तर फीसद महिलाएं किसी न किसी तरह की घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराधियों के बच निकलने के रास्ते बंद करना और कड़े दंड का प्राधान जरूरी है, पर यह अपराध को खत्म होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि उन स्थितियों को खत्म किया जाए, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं। बलात्कार जैसे अपराध कुंठित मानसिकता के लोग करते हैं, लेकिन ऐसी कुंठा में कई बार महिलाओं के प्रति बनी सामाजिक धारणा के स्वर पर बराबरी का दर्जा देकर और उसकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ा कर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसे समाज को तैयार करेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों का बहिष्कार कर सकेगा, क्योंकि महिला सुरक्षा समाज में ही निहित है। सर्वप्रथम समाज में व्याप्त पुरुष प्रधानता का दंभ निकालना होगा और सभी महिलाओं को मनुष्य समझना होगा। उन्हें सम्मान के साथ बराबरी देना होगा। दोयम दर्जे की मानसिकता से ऊपर होना पड़ेगा।

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