विवाह, धोखा और कानून

छह साल पहले संसद के मानसून सत्र में तमाम हंगामे और उठापटक के बीच सबसे अच्छी बात यह हुई कि विवाह के अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था करने वाले विधेयक को हरी झंडी मिल गई।

दांपत्य जीवन में विश्वास खत्म हो रहा है।

विवाह के रिश्ते अब काफी कमजोर हो गए लगते हैं। मामूली बातों पर शादियां टूट जाती हैं। मगर सबसे पीड़ादायी तब होता है, जब कोई धोखे से विवाह करे और अपनी पत्नी या पति को छोड़ जाए। ऐसे में आश्रितों के सामने कई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। पहले पंजाब में ऐसे अनेक मामले सामने आए, जब विदेश में बसे लड़के अपने गांव या शहर आकर शादी करते थे और फिर पत्नी को छोड़ कर गायब हो जाते थे। अब यह प्रवृत्ति देश भर में देखी जा रही है। इसी के मद्देनजर विवाह पंजीकरण कानून लागू किया गया। मगर यह कानून कितना कारगर साबित हो पाया है और इसमें कहां खामियां रह गई हैं, बता रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

छह साल पहले संसद के मानसून सत्र में तमाम हंगामे और उठापटक के बीच सबसे अच्छी बात यह हुई कि विवाह के अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था करने वाले विधेयक को हरी झंडी मिल गई। इससे वैवाहिक संबंधों से जुड़ी कई पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान का रास्ता साफ होने की उम्मीद बंधी। हालांकि सहजीवन की कानूनी व्याख्या ने इस व्यवस्था की व्यावहारिकता पर सवाल भी खड़े कर दिए। अदालतों में जितने भी पारिवारिक विवाद पहुंचते हैं, उनमें संपत्ति विवाद के बाद सबसे ज्यादा संख्या वैवाहिक संबंधों से जुड़े विवादों की होती रही है। कानूनी प्रक्रिया की जटिलता या उपयुक्त कागजात की जानकारी न होने की वजह से अक्सर किसी न किसी पक्ष को न्याय नहीं मिल पाता। खासकर महिलाओं को यह साबित करने में कई तरह की मुश्किलें आती रही हैं कि वे सचमुच प्रताड़ित हुई हैं। ऐसे में विवाह के अनिवार्य पंजीकरण का कानून लागू होने से कई तरह की पारिवारिक समस्याओं का समाधान होने का रास्ता खुल सकता था। मगर पिछले छह सालों में स्थितियां सुधरने की बजाय और बिगड़ी हैं। वैवाहिक रिश्तों में तनाव बढ़ा है।

पारिवारिक प्रताड़ना की खबरें ज्यादा आ रही हैं। दांपत्य जीवन में विश्वास खत्म हो रहा है। अब सहजीवन संबंध (लिव इन रिलेशन) को शादी की तरह के रिश्ते में लाने के सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश से कुछ पेचीदगियां पनप सकती हैं। विवाह का अनिवार्य पंजीकरण करने की मांग विभिन्न स्तरों पर काफी समय से उठती रही है। सामुदायिक, धार्मिक और सामाजिक बाध्यताओं, मान्यताओं और जटिलताओं की वजह से एक अनिवार्य व्यवस्था के रूप में इसे लागू करने में अड़चन आ रही थी। कानून बनाना इसीलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि बदलती सामाजिक व्यवस्था और बिगड़ते मानवीय मूल्यों ने विवाह जैसी रस्म की परिभाषा को बदल दिया है।

वैवाहिक संबंधों में तनाव बढ़ रहा है और इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, व्यभिचार जैसी आपराधिक प्रवृत्तियां पनपने लगी है। खासकर अनिवासी भारतीयों से शादी के कैसे त्रासद नतीजे हो सकते हैं, इसे शादी के नाम पर ठगे गए पंजाब के हजारों परिवारों से बेहतर और कौन समझ सकता है। वैवाहिक संबंधों में कितना धोखा हुआ है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में हजारों महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें उनके प्रवासी पतियों ने छोड़ दिया है। ऐसे में हर शादी का पंजीकरण होना अनिवार्य हो गया था, ताकि रिश्ते की डोर में बंधे वर-वधू को कानूनी प्रामाणिकता मिल सके। वैवाहिक संबंधों का टूटना न सिर्फ इससे जुड़े लोगों के लिए दर्दनाक अनुभव है, बल्कि समाज को भी उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। खासकर कानूनी प्रक्रिया और परित्यक्त होने वाली महिलाओं पर पड़ने वाले जिम्मेदारी के बोझ ने इसे और पीड़ाजनक बना दिया है। पारिवारिक कानूनों में इस समस्या का कोई कारगर समाधान नहीं हो पाने की वजह से एक सख्त कानून बनाना जरूरी हो गया था। अनिवासी भारतीय वर से शादी में तो समस्याएं और बढ़ जाती है। शादी भारत में होती है और उस पर लागू होते हैं आयातित कानून। ऐसे में यह जरूरी था कि विवाह को मजबूत कानूनी जामा पहनाया जाए।

विवाह का पंजीकरण कराने का कानून पहले ऐच्छिक था। इसी को देखते हुए सीमा बनाम अश्विनी कुमार मामले में स्थानांतरित याचिका (सी) नंबर 291 में 14 फरवरी 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किया कि केंद्र और राज्य सरकारें सभी धर्मों के नागरिकों के विवाह का अनिवार्य पंजीकरण कराएं और तीन महीने में सभी राज्य पंजीकरण की प्रक्रिया अधिसूचित कर दें। लेकिन इस निर्देश पर कोई अमल होता न देख 25 अक्टूबर 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना यह निर्देश दोहराया। यह राज्यों पर छोड़ा गया कि वे अपने यहां होने वाले सभी धर्मों के सभी नागरिकों के विवाह का पंजीकरण कराने की व्यवस्था करें। अनिवासी भारतीयों से शादी के बढ़ते हुए मामले देखते हुए यह और जरूरी हो गया था। ऐसे विवाह में विवाह का प्रमाण-पत्र जारी करना और अनिवासी भारतीय वर या वधू का सामाजिक सुरक्षा नंबर दर्ज करना अनिवार्य था। दुर्भाग्य की बात है कि अनिवासी भारतीयों की सबसे ज्यादा शादी पंजाब में होती रहीं हैं और वही शादी का अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने का कानून बनाने में टाल-मटोल हुई। अनिवासी भारतीयों से शादी का पंजीकरण अनिवार्य रूप से कराना इसलिए जरूरी था ताकि वर-वधू के पास विवाह का प्रमाण और सबूत रहे और शादी के नाम पर हो रही धोखाधड़ी को रोका जा सके। पंजाब में करीब तीस हजार ऐसी परित्यक्त वधुएं हैं, जिन्हें आज भी कोई राहत और कानूनी मदद उपलब्ध नहीं है। अनिवासी भारतीयों के राज्य आयोग ने समय-समय पर विदेशों में रह रहे भारतीयों के साथ विवाह में धोखाधड़ी और उस विवाह की परिणति कू्ररता और उत्पीड़न में होने के मामलों की पहचान की और सिफारिश की कि इस प्रवृत्ति के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएं। लेकिन समस्या की भयावहता को देखते हुए यह पहल नाकाफी रही।

सबसे संभव समाधान तो यही माना गया कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने का कानून बनाया जाए। ऐसे मामलों में किसी भी तरह के विवाद का निपटारा करने के लिए पारिवारिक अदालतें गठित की जाएं और 2011 में बने अनिवासी भारतीय कानून को सख्ती से लागू करने के लिए राज्य आयोग को अधिकार दिए जाएं। पंजाब के लिए खासतौर से ऐसे कानून की जरूरत महसूस की गई, जिसमें हर विवाह का पंजीकरण अनिवार्य हो, भले ही विवाह किसी धर्म, जाति, वर्ण या राष्ट्रीयता में हुआ हो। यह पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया कि भारतीय नागरिक हो, अनिवासी भारतीय हो या विदेशी नागरिक, अगर उनकी शादी पंजाब में होती है तो व्यक्ति की हैसियत या स्तर कुछ भी क्यों न हो, उसकी शादी पंजीकृत हो। साथ ही दोनों पक्षों में से दोनों या कोई एक अनिवासी भारतीय या विदेशी नागरिक हो, तो उसके लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि वह अपने पासपोर्ट का ब्योरा, विदेशी आवास का पता, सामाजिक सुरक्षा नंबर या संबंधित देश द्वारा उसकी पहचान से संबंधित किसी भी तरह के दस्तावेज की जानकारी दे।

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