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योग दर्शन: दांपत्य जीवन और योग

दांपत्य जीवन सुखी तभी हो सकता है जब संस्कारों को महत्त्व दिया जाए। मनुष्य जीवन का एक लक्ष्य मानव निर्माण करना भी है।

Author Published on: December 15, 2019 4:41 AM
धैर्य ही दांपत्य जीवन को सुखी बना सकता है।

डॉ. वरुण वीर

भारतीय संस्कृति में दांपत्य जीवन को चार आश्रमों का आधार बताया गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास जीवन को चार भागों में बांट देते हैं, ताकि जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की सिद्धि हो सके। वास्तव में चारों आश्रमों में सुख, आनंद तथा तपस्या है। पर गृहस्थ आश्रम सबसे प्रमुख इसलिए है कि पूरा समाज उसी पर आश्रित होकर चलता है। आज इस आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति के चारों आश्रम बिखर चुके हैं और सबसे अधिक हानि गृहस्थ आश्रम की हुई है। आज दांपत्य जीवन पूरी तरह चरमराता दिखाई देता है। आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले तक भी भारतीय परिवार सुख पूर्वक संगठित होकर रहते थे, लेकिन कुछ ही समय में भारत में इतना तेजी से परिवर्तन हुआ कि परिवार टूटते जा रहे हैं। इसके कई कारण हैं। अर्थ और काम की अंधी दौड़ में आज का युवा बहुत तेजी से भाग रहा है और ‘एक्सपेरिमेंट’ के नाम पर वह बड़े से बड़ा जोखिम उठाने लगा है। यहां तक कि परिवर्तन तथा ‘एक्सपेरिमेंट’ के नाम पर एक ही समय में अनेक स्त्रियों या फिर पुरुषों से संबंध बनाने में भी नहीं हिचकिचाता है, जो कि दांपत्य जीवन को तोड़ने का बड़ा कारण है। अत्यधिक कामवासना या फिर बिल्कुल ही काम रहित होना, दोनों ही बड़ी समस्याएं हैं। कई लोग मुझसे सलाह लेने आते हैं कि योग किस प्रकार से दांपत्य जीवन में आने वाली समस्याओं को दूर कर सकता है।

मैं हमेशा यही कहता हूं कि संतुलन तथा धैर्य ही दांपत्य जीवन को सुखी बना सकता है। व्यवहार, आचरण, भोजन, निद्रा, व्यायाम तथा रतिक्रिया में संतुलन की बहुत आवश्यकता है। आपका व्यवहार आपकी पत्नी के प्रति विनम्र तथा सम्मानजनक होना चाहिए, पत्नी के शारीरिक तथा मानसिक कष्ट को दूर करने वाला हो न कि कष्टकारी। आचरण में सत्य तथा घर के काम में सहयोगी हो, भोजन पौष्टिक तथा कम मात्रा वाला तथा नींद में कमी नहीं होनी चाहिए। प्रतिदिन व्यायाम और योग, आसन, प्राणायाम और ध्यान करना जरूरी है और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण रति क्रिया यानी सेक्स में संतुलन होना जरूरी है। अत्यधिक काम वासना या अत्यधिक काम में नीरस व्यक्ति स्त्री के लिए अत्यधिक दुखदाई होता है। आज के समय में इंटरनेट पर होने से सेक्स के भी अलग-अलग तरीके के एक्सपेरिमेंट करना एक फैशन हो गया है, जिसमें सबसे खतरनाक अप्राकृतिक मैथुन है, जिसे एनालसेक्स कहा जाता है। विशेष रूप से मानसिक रूप से परेशान या डिस्टर्ब व्यक्ति इसे अपनाता है, जो कि स्त्री के लिए अत्यधिक कष्टकारी ही नहीं अनेक रोगों को देने वाला भी होता है। इस समस्या के कारण आज अनेक घर टूट रहे हैं। जिस पुरुष को इसकी आदत हो जाती है वह सामान्य सेक्स करने में रुचि नहीं रखता और बहुत ही कम स्त्रियां ऐसी होती हैं जो इस कष्ट को सहन करने के लिए तैयार हो जाती हैं। इसके बिल्कुल विपरीत सेक्स में नीरस पुरुष स्त्री को संतुष्ट न कर पाने के कारण उसको छोड़ देती है। दोनों ही स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए सेक्स में भी धैर्य और संतुलन की आवश्यकता है। ठीक प्रकार से योग, आसन, प्राणायाम करने से हम दोनों समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं तथा गृहस्थ जीवन को प्रेम पूर्वक चला सकते हैं।

आज जो स्त्री पुरूष अपना कैरियर बनाने के कारण देर से शादी करते हैं उन पर अनेक नकारात्मक प्रभाव विशेष रूप से स्त्री पर पड़ते हैं। देर से शादी, फिर देर से गर्भधारण करना और बच्चों को पालना-पोसना यह सभी काम युवावस्था में आसानी से हो जाते हैं, अन्यथा तीस वर्ष से ऊपर की उम्र में बच्चे को जन्म देना, पालना अधिक तपस्या का काम हो जाता है। मुख्य रूप से दांपत्य जीवन सुखी तभी हो सकता है जब संस्कारों को महत्त्व दिया जाए। मनुष्य जीवन का एक लक्ष्य मानव निर्माण करना भी है। पुरुष का वीर्य और स्त्री के रज के मिलन से ही संतान का निर्माण होता है। जैसे संस्कार माता-पिता के होंगे, वैसी ही संतान उत्पन्न होगी।

यहां पर दो धारणाएं हैं एक वंशानुगत, दूसरी पर्यावरणवादी। वंशानुगत सिद्धांत को मानने वाले विद्वान संस्कारों में परिवर्तन को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है जैसे संस्कार माता-पिता के होते हैं वैसी ही संतान पैदा होती है। मगर पर्यावरणवादी मानते हैं पर्यावरण द्वारा संस्कारों को बदला जा सकता है। पर भारतीय संस्कार प्रणाली इस बात से इनकार नहीं करती है कि माता-पिता के रज-वीर्य से ही संतान का निर्माण होता है और इस बात से भी इनकार नहीं करती है कि पर्यावरण का संतान निर्माण में भारी योगदान है। यही कारण है कि भारतीय ऋषियों ने इसे दो भागों में बांटा है। प्रथम कोटि के वे संस्कार हैं, जो संतान के निर्माण में तब किए जाते हैं जब वह माता के पेट में होता है। इन्हें गर्भस्थ संस्कार कहा जाता है। दूसरी कोटि के संस्कार हैं जिन्हें जन्मस्थ संस्कार कहा जाता है। गर्भाधान, पुंसवन तथा सीमंतोनयन गर्भावस्था के संस्कार हैं। उपनयन, ब्रह्मचर्य आदि जन्म लेने के बाद के संस्कार हैं।

गाल्टन (1822-1911) का मत है कि माता-पिता के वीर्य में एक ऐसा तत्व, जो शरीर तथा मन के गुणों को लेकर संतान में पहुंचता है, जिससे कि संतान में माता-पिता के गुण पहुंच जाते हैं। इसे उसने उत्पादक कोष्ठों का तत्व नाम दिया है। गाल्टन का कहना है कि यह तत्व ज्यों का त्यों बना रहता है, तभी तो यह संभव है कि कभी-कभी अपने माता-पिता से इतना नहीं मिलता, जितना कि अपने दादा से मिलता है।

डॉक्टर नेफाख, जो सोवियत अकादमी आॅफ साइंस विभाग के अध्यक्ष रह चुके हैं, ाका कहना है कि जीव विज्ञान संबंधी अनुसंधानों द्वारा मानवीय निर्माण कला की आधारशिला रखी जा चुकी है, जिसके आधार पर उच्च कोटि के मानव का निर्माण क्रियात्मकता के क्षेत्र में आ गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्पादक कोष्ठ में से उत्पादक तत्व निकाल कर उसने दूसरे ‘न्यूक्लियस’ में डाला जा सकता है।

हमारा संस्कार विधान दोनों विचारों का समावेश है। एक ही माता-पिता के दो बच्चों का जीवन अलग तरीके का होता है और दोनों बच्चों का स्वभाव तथा संस्कार भी अलग-अलग तरह के होते हैं। यह पिछले जन्म के संस्कार के कारण होता है। माता-पिता के संस्कार ही नहीं, बल्कि पूर्व जन्म के संस्कार भी पीछा नहीं छोड़ते हैं। इसलिए योग संस्कार पद्धति का उद्देश्य पिछले जन्म तथा वर्तमान जन्म के कुसंस्कारों तथा इस जन्म में मिले माता-पिता द्वारा कुसंस्कारों तथा सामाजिक परिस्थिति और पर्यावरण से प्राप्त होने वाले कुसंस्कारों को नष्ट कर स्वस्थ और चरित्रवान मानव का निर्माण किया जा सके। योग के सिद्धांत का पालन उत्तम संतान की प्राप्ति करने के लिए बड़ा ही लाभकारी है।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष तप, स्वाध्याय, तथा ईश्वर प्राणीधान सभी प्रकार के कुसंस्कारों को नष्ट कर ईश्वर की अनुभूति करवाते हैं। योग को जीवन में अपना कर जीवन को सुखी, स्वस्थ बनाया जा सकता है, अन्यथा आज वर्तमान युग में हिंसा, कलह, अहंकार, प्रतिस्पर्धा पति और पत्नी के बीच में इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि तलाक का प्रतिशत दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। जीवन में पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे के सुख, स्वास्थ्य तथा प्रसन्नता का ध्यान रखना चाहिए। दोनों को आसन, प्राणायाम तथा ध्यान प्रतिदिन ईश्वर भक्ति के साथ करना चाहिए, तभी दांपत्य जीवन का सुख तथा संस्कार उत्तम संतान का निर्माण कर सकेंगे।

 

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