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कानून के कई फायदे

पंजाब सरकार ने 2011 में अनिवासी भारतीयों के लिए बने राज्य आयोग के लिए एक कानून पंजाब एनआरआई एक्ट बनाया था। मकसद था अनिवासी भारतीयों के लिए बने राज्य आयोग के लिए संवैधानिक व्यवस्था हो, ताकि वह राज्य के लोगों के हितों की ठीक से हिफाजत कर सके।

सबसे ज्यादा अड़चन पंजाब में इस कानून पर सख्ती से अमल की है।

सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से कराने के सुप्रीम कोर्ट के 2006 में दिए गए निर्देश पर कानून बनने में भले ही सात साल लग गए, लेकिन इस कानून पर अगर सही तरीके से अमल हो पाए, तो कई तरह की पारिवारिक विषमताओं से बचा जा सकता है। विविधताओं वाले देश में विभिन्न समुदायों के बीच विवाह की अलग-अलग परंपराएं हैं। इसीलिए राज्य सरकारें अपने हिसाब से अलग-अलग नियम लागू कराती रही हैं। विवाह का समान कानूनी दस्तावेज बनने से खासतौर पर अंतर धार्मिक विवाह करने वालों को वैधानिक सुरक्षा मिल सकती है। कानून से विवाह के बाद महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने, बाल विवाह से मुक्ति दिलाने, किसी पक्ष को अंधेरे में रख कर होने वाली शादियों और बहु विवाहों पर रोक लगने की उम्मीद की गई थी। पर ऐसा हो नहीं पा रहा है।

सबसे ज्यादा अड़चन पंजाब में इस कानून पर सख्ती से अमल की है। सालों से वैवाहिक रिश्तों में धोखे या अधिकारों के हनन की सबसे ज्यादा शिकायतें पंजाब से मिलती रही हैं। यह मूल रूप से कमाऊ दूल्हा ढूंढ़ने की मानसिकता से जुड़ी सामाजिक समस्या है। इसमें विदेश में बसे वर की असलियत जानने की कोई कोशिश नहीं होती। यह आसान भी नहीं होता। कानून में यह साफ व्यवस्था है कि पंजाब से बाहर शादी करने वाले अगर राज्य के निवासी हैं, तो उन्हें राज्य में शादी का पंजीकरण कराना होगा। अगर शादी अन्य किसी राज्य में पंजीकृत हो गई है या दोनों पक्षों पर लागू होने वाले कानून के तहत हुई है, तब पंजाब में उस शादी का पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है। विवाह का अनिवार्य पंजीकरण कराने का कानून इस विवाह का पंजीकरण करने से मना भी कर सकता है, जो विवाह कानून के तहत न हुआ हो। इससे आनंद विवाह कानून से भी कोई टकराव नहीं है। दोनों पक्ष चुन सकते हैं कि वे विवाह का पंजीकरण कहां कराएं।

पंजाब सरकार ने 2011 में अनिवासी भारतीयों के लिए बने राज्य आयोग के लिए एक कानून पंजाब एनआरआई एक्ट बनाया था। मकसद था अनिवासी भारतीयों के लिए बने राज्य आयोग के लिए संवैधानिक व्यवस्था हो, ताकि वह राज्य के लोगों के हितों की ठीक से हिफाजत कर सके। साथ ही उनके कल्याण के लिए उपयुक्त सुधारात्मक कदम सुझा सके। लेकिन आयोग ज्यादा असरदार इसलिए नहीं हो पाया कि जल्दबाजी में उसका गठन करते समय जरूरी विशेष अधिकार उसे नहीं दिए गए। आयोग को यह अधिकार तो मिला कि अनिवासी भारतीयों के मामले में वह जांच का आदेश तो दे सकता है या खुद भी जांच या छानबीन कर सकता है, लेकिन पंजाब एनआरआई एक्ट उसे कोई फैसला करने या सुनाने का अधिकार नहीं देता। आयोग के पास ताकत न होने से उसकी उपयोगिता घटी है। इसीलिए सिफारिश की गई है कि पंजाब एनआरआई एक्ट में संशोधन कर आयोग को जांच या छानबीन के बाद कुछ अधिकार दिए जाएं। मसलन अगर जांच से पता चले कि संबंधित व्यक्ति ने कोई कानून तोड़ा है, तो आयोग सरकार को या उपयुक्त एजंसी से मामले की जांच करने और दोषी पाए जाने पर सजा देने के लिए कह सके, दीवानी और फौजदारी अदालतों के साथ-साथ हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सकें और पीड़ित, पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों को अंतरिम राहत देने की सरकार से सिफारिश कर सकें।

जाहिर है कि जब तक एनआरआई आयोग को किसी मामले को अंतिम नतीजे तक पहुंचाने के लिए जांच या छानबीन के उसके अधिकार बढ़ाए नहीं जाते, तब तक आयोग की कवायद कारगर नहीं हो पाएगी। विशेष अधिकारों से आयोग को अपने आदेश पर अमल कराने की वैधानिक ताकत मिलेगी। इससे लोगों में न्याय पाने की उम्मीद बढ़ेगी। अनिवासी भारतीयों के पारिवारिक विवादों का भी इससे समाधान हो सकेगा। अनिवासी भारतीयों के लिए बने पंजाब राज्य आयोग ने 11 जुलाई, 2012 के अपने एक फैसले में कहा था- ‘अनिवासी भारतीय वरों का अपनी वधुओं को छोड़ देने का चलन नया नहीं है। पहले भी इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। विदेशों में बसे भारतीयों की शादी के नाम पर की जाने वाली धोखाधड़ी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। समस्या सिर्फ यही नहीं है कि महिलाओं को भारत में छोड़ दिया जाता है। इसमें वर पक्ष की तरफ से दहेज की मांग, अत्याचार और उत्पीड़न भी शामिल है। अपनी बेटी की इस तरह की तथाकथित शादी के लिए अपनी सारी जमा पूंजी लगा देने वाले माता-पिता की जब तक नींद खुलती है और वे अधिकारियों के पास शिकायत लेकर जाते हैं तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यह एक खतरनाक बीमारी है और इसका मुकाबला कड़ाई से किया जाना चाहिए।’

कानून तो बन गया है लेकिन पारिवारिक समस्याओं के उपयुक्त समाधान के लिए व्यवस्थित कानूनी ढांचा होना जरूरी है। वैवाहिक समस्याओं के सार्थक समाधान के लिए बिना देर किए फैसला होने की व्यवस्था की जानी चाहिए। फिलहाल हिंदू विवाह कानून है, जो 1955 में बना था। यह कानून हिंदुओं के वैवाहिक मसलों से जुड़ा है। इसमें व्यवस्था है कि मामले की दैनिक सुनवाई की जाए और इस कानून के तहत दायर याचिका की सुनवाई जल्दी से जल्दी पूरी कर छह महीने के भीतर पूरी कर ली जाए। अनिवासी भारतीयों के मामले में कानून में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि एनआरआई विदेशी कानूनों की आड़ लेकर देश के कानून के उद्देश्य को धता न बता सके। इसके लिए कानून में व्यापक संशोधन की जरूरत है। 1984 में बने पारिवारिक अदालत कानून में विवाह से जुड़े विवाद और पारिवारिक मसले जल्दी सुलझाने के लिए पारिवारिक अदालतें गठित करने का प्रावधान किया गया था।

यह एक ऐसा उपयुक्त मंच है जिसमें वैवाहिक मसलों का समाधान किया जा सकता है। इस कानून में राज्य सरकारों को यह फैसला करने का अधिकार दिया गया है कि वे चाहें तो ऐसी पारिवारिक अदालतें गठित करें। पंजाब में ऐसी अदालतों की ज्यादा जरूरत है, ताकि छोड़े गए पति या पत्नी, उपेक्षित बच्चों या वैवाहिक संबंधों की किसी भी तरह की समस्या का जल्दी, कारगर और सार्थक समाधान होने के साथ-साथ पीड़ित या पीड़िता को राहत मिल सके। इस कानून की धारा 3 में कहा गया है कि हाई कोर्ट से सलाह कर राज्य पारिवारिक अदालतें गठित कर सकते हैं। पारिवारिक अदालतें हर राज्य में हर जिले में गठित की जानी चाहिए ताकि हर तरह के वैवाहिक और पारिवारिक विवादों का खासतौर से अनिवासी भारतीयों से जुड़े मामलों का जल्दी और कारगर निपटारा हो सके।

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