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कहानी: मिसाल

इस छप्पन साल की उमर में भी उनकी आंखों में विशेष चमक थी, जैसे जता रही हो हमसे, ‘इंसान पैसे से नहीं, अपने व्यवहार से बड़ा होता है। अपने साथ-साथ अपनों और समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठा से बड़ा होता है, वही तो मैं कर रहीं हूं, तभी आज भी मैं सुंदर हूं, अन्य महिलाओं से विशेष हूं और प्रसन्न हूं।’

Author Updated: November 10, 2019 5:36 AM

कुलीना कुमारी

करुणा। यही नाम है उनका। अपने नाम के अनुसार ही उनका काम भी है। उम्र छप्पन साल, मगर ऊर्जावान इतनी कि चालीस से अधिक की नहीं दिखतीं। वे न केवल अपना ध्यान रखती हैं, हर तरह से, शारीरिक, मानसिक और अपने स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी, बल्कि इसी के साथ ध्यान रखती हैं वे अपने परिवार, संस्कृति और समाज का भी। करुणा पारंपरिकता और आधुनिकता की समिश्रण हैं। पारंपरिकता की ऐसी मिसाल कि वर्षों तक बड़े परिवार के बीच सबके साथ मिलकर रहीं। उनके पति चार भाई। जेठानी, देवरानी सहित सबके बच्चे मिला कर बहुत बड़ा परिवार बनता था और ऊपर से आने-जाने वालों का तांता भी लगा रहता था। हालांकि इनके पीतिया ससुर केंद्रीय मंत्री रहे, उन्होंने शादी नहीं की थी और संयुक्त परिवार की वजह से सबके साथ रहते थे। इसलिए ठाठ-बाट ससुराल में भी कम नहीं थी, बावजूद उनके ससुर जी नियमों के पक्के थे और नौकर-चाकर के होने के बावजूद घर की महिलाओं के हाथ का ही बना भोजन करना पसंद करते थे। इसलिए बहुओं को ढेर सारे लोगों के लिए खाना बनाना और इससे जुड़ी चीजें खुद तैयार करनी पड़ती थीं। फिर बच्चे प्राय: महिला के ही हिस्से थे, तो उनकी देखभाल की भी अलग से जिम्मेदारी थी।

मगर सयुंक्त परिवार की अधिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने सबके साथ रहने का संकल्प लिया, जबकि करुणा खुद बड़े घर की बेटी थी। पिता उनके कमिश्नर रहे और विशेष योगदान के लिए उन्हें मिथिला भूषण पुरस्कार का भी सम्मान मिला था। भाई उनके आईएस हैं और उनकी बहनें भी आईएस की पत्नियां हैं। मगर इसे नसीब का खेल समझें या संयोग, मगर जब इनकी शादी हुई, उस वक्त अपने भाई-बहन की तुलना में इनके पति हाई कोर्ट के एक साधारण वकील थे। घर में चाहे कितनी भी ठाठ-बाट हो, मगर उस दौरान पति की कमाई अच्छी नहीं थी, इसलिए इनका जीवन अपने भाई-बहनों की तुलना में कठिन था, बावजूद वे उसी माहौल में अपने लिए खुशी की किरण ढूंढ़ती रहीं।

समय अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था और इसी के साथ वह महसूस करने लगीं थी कि बेटी के पैदा होने के बाद पैसे की जरूरतें बढ़ रही हैं, इसीलिए पति के अलावा खुद को भी आर्थिक रूप से सक्षम करना जरूरी था, मगर क्या करें, यह मुख्य समस्या थी। उस वक्त इनको अपने पिता का संस्कार याद आने लगा कि कैसे कई बेटियां होने के बावजूद पिता ने बोझ नहीं समझा और अपने मुश्किलों पर रोने के बजाय रास्ता निकालने की बात किया करते थे।

बताया था उन्होंने, ‘जब मैं कुछ घंटों की ही थी, तो मां गुजर गई और पिता ने ही उसके बाद से हम सभी भाई-बहनों को संभाला। हम बच्चों की अच्छी परवरिश और हम सबकी खुशी को ही उन्होंने लक्ष्य बनाया। इसीलिए उन्होंने मेरे पिता ने दूसरी शादी नहीं की और हम सभी भाई-बहन को अच्छा इंसान बनाने के लिए उन्होंने पूरा प्रयास किया। अनुशासन, सदाचार, बड़ों की इज्जत करना, खुद को उचित तरीके से व्यक्त करना और आपस में मिल कर चलना, उन्हीं की परवरिश की देन थी।

पिता का ही यह प्रभाव था कि हम सभी भाई-बहनों में काफी लगाव था और एक-दूसरे का खयाल रखते थे। यद्यपि मेरी शादी होने से पहले पिता भी गुजर गए, मगर उनका प्यार, विश्वास और परवरिश हमारे जीवन के लिए मजबूत नींव बन कर काम करते रहे। उनके परवरिश का प्रभाव कि शादी के बाद भी हम भाई-बहनों में काफी प्यार था और तब मुझे अपने भाई-बहन से अपने मन की बात रखने का खयाल आया। जैसे ही मेरे भाई-बहनों ने सुना कि मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, तो वे लोग खुश हो गए और इस कार्य में हर संभव मदद करने का आश्वासन दिया।’

मगर इस काम में सबसे बड़ी मदद इनकी बड़ी बहन ने की। उस वक्त वे पटना में अपने परिवार के साथ रह रही थीं। उन्होंने उन्हें दिल्ली में अपने पास आने और यहां आकर प्रतियोगिता की तैयारी के लिए आमंत्रित किया। उनके पति और घरवालों ने उनकी रुचि को देखते हुए जाने की अनुमति दे दी। संयुक्त परिवार के लाभ स्वरूप उनकी जेठानी ने उनकी बेटी का ध्यान रखने की जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली। उनके भाई-बहनों के साथ-साथ ससुराल वालों का सहयोग और उनकी मेहनत के फलस्वरूप उन्हें दिल्ली की एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका के बतौर नियुक्ति हो गई। नौकरी मिल जाने के बाद वे पति और बेटी के साथ दिल्ली में शिफ्ट हुई।

यह करीब अट्ठाईस साल पहले की बात है। इसके बाद ही उनका सफर पटना से दूर दिल्ली हो पाया, जबकि उनकी शादी उनतालीस साल पहले हुई थी। वे करीब दस साल संयुक्त परिवार के बीच सबके साथ रहीं। मगर इससे क्या, दिल्ली में भी रहीं, तो सिर्फ अपना-अपना नहीं सोचा। सालों अपनी जेठानी के लड़कों को अपने घर में जगह दिया, ताकि उन्हें खाने-पीने और समय पर आॅफिस जाने में दिक्कत न हो। साथ ही जरूरतमंद और आने-जाने वालों के लिए अपना दरवाजा खुला रखा।

आधुनिकता और मानसिक रूप से उनकी सोच इतनी ऊंची थी कि पहली संतान बेटी होने के बाद भी दूसरा बच्चा नहीं पैदा किया। अपनी बेटी को किसी बेटे से कम नहीं समझा और उसकी शिक्षा-दीक्षा पर ही अपने आप को केंद्रित किए रहीं। कम बजट के बावजूद उन्होंने बेटी को बेहतर प्रदर्शन करके दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया। बेटी ने भी मां की सोच और संघर्ष को समझा और मन लगा कर पढ़ाई करती रही। इसे संयोग कहा जाए या उनकी परवरिश के सिद्धांत का असर ‘कि सब बराबर हैं’, बेटी ने बालिग होने पर अपनी जाति से भिन्न एक लड़के को पसंद किया और आकर यह बात आपने मां-बाप से बताई। बिना किसी विरोध के उस लड़के से दोनों परिवार के सहमति द्वारा शादी करा दी गई।

बेटी भी बहुत बुद्धिमान, तेज और शादी के बाद भी अपने मां-बाप के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ। वह दूसरे शहर में अपना आशियाना बनाने के बजाय दिल्ली चुनना अधिक ठीक समझी, ताकि वह सास-ससुर और पति के साथ-साथ अपने मां-बाप के प्रति भी फर्ज निभा सके। प्रेमविवाह के बावजूद उनके दामाद ने उनकी बेटी की मंशा को समझा और अपना बिजनेस दिल्ली में स्थापित कर लिया। इधर उनकी बेटी की शिक्षा और लगन से की गई मेहनत भी रंग लाई और वह दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षिका के रूप में चुन ली गई। जिसकी लायक और कर्तव्यनिष्ठ बेटी हो, तो मां-बाप क्यों न खुश हों? उनकी बेटी अपने पति, सास-ससुर के साथ-साथ मां-बाप के लिए भी फर्ज निभा रही है।

परसों करुणा दी से फिर मिली थी। दरअसल, उनकी जेठानी मेरी परिचित तो पहले भी उनसे मिलना होता रहा है। सरकारी स्कूल के शिक्षक के बतौर उन्हें केंद्रीय दिल्ली में फ्लैट मिला हुआ है। उनके पति पटना हाईकोर्ट से प्रैक्टिस शुरू करके अब दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट में अपनी प्रैक्टिस करते हैं। घर में ऐसी सहित सारी सुविधाएं अब मगर जानने वाले जानते हैं कि इन्हें जुटाने में उनकी इच्छा शक्ति और मेहनत का बहुत योगदान रहा है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की है और अब भी दोहरी जिम्मेदारी निभा रही है। मगर इस बात की उन्हें खुशी है, मलिनता नहीं। वह न केवल अपने स्कूल में शिक्षिका के बतौर पूरा फर्ज निभा रही है, बल्कि सशक्त महिला और शिक्षिका होने के नाते आसपास में जिन्हें भी अशिक्षित देखती है, उन्हें भी प्रोत्साहित कर अपने स्कूल में दाखिला करा देती है, ताकि वह भी पढ़ जाए और शिक्षा की रोशनी में उसका जीवन भी संवर जाए। अपनी कामवाली के बच्चे और ऐसे ही आसपास के जरूरतमंद लोगों की वह मदद करती रहती है। इस सबके अलावा अपनी घरेलू जिम्मेदारी और रसोई में खाना करुणा दी खुद खाना बनाती हैं।

वे बता रही थीं मुझे, ‘सुविधाओं का अत्यधिक उपयोग बीमारियों का घर। इसीलिए मैं सुविधाओं का उपयोग आवश्यकता से अधिक नहीं करती।’ और हां, यह भी उन्होंने जोर देकर कहा, ‘जब हमारे ससुर कहते थे कि खाना अपने घर की औरत के हाथों का बना ही खाएंगे, उसका अब मतलब समझ में आ रहा है। उस दौरान प्राय: महिला घर में होती थी, बाहरी काम करती नहीं थी, तो घर का काम यानी खाना भी नहीं बनाती, तो बीमार नहीं हो जाती क्या? यद्यपि उस वक्त लगता था कि घर की औरतों के प्रति वे अच्छा भाव नहीं रखते, जो नौकर-चाकर होने के बाद भी घर की महिलाओं को खटाते हैं। मगर अब यह समझ चुकी हूं कि घर का काम करना, खाना बनाना एक महत्त्वपूर्ण व्यायाम है और यह स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी।’

पूराना संदर्भ याद करते हुए और उसे वर्तमान से जोड़ते हुए उन्होंने कहा, ‘तबसे यह जीवन प्रक्रिया और आदतों में इस प्रकार शामिल हो गया कि मैं भी कामवाली से बेशक थोड़ा-बहुत मदद ले लूं, मगर खाना खुद बनाती हूं। यह बहुत बड़ी मूवमेंट है, इससे हमारा शरीर सक्रिय रहता है। फिर पति और अपने स्वास्थ्य के हिसाब से तेल-मसाला का प्रयोग करती हूं और खुश रहती हूं। स्कूल आना-जाना भी पड़े, मगर मैं नारी होने का दायित्व और अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना नहीं भूलती। बहुत सरल हैं वे। मैंने ऐसे ही पूछ लिया, ‘आपके भाई आइएएस हैं, बहनोई बड़े पदों पर, उनके सामने खुद को कैसा पाती हैं?’
उन्होंने मेरे सवाल का सीधे तौर पर उत्तर दिया, ‘यह मेरे लिए खुशी की बात है, मगर मैं या मेरे पति जो हैं, उसी को मैं सबसे महत्त्वपूर्ण मानती हूं और अपनी परिस्थितियों में ही अपनी खुशियों के पल ढूंढ़ती हूं, साथ ही हमसे मिलने वालों को भी अपने आप पर भरोसा करने और आत्मनिर्भर रहने की सीख देती हूं।’

उनकी यह बात मुझे इस युग में सबसे आवश्यक और व्यावहारिक लगी। जहां प्रतियोगिता और दूसरों को अपनी तुलना में अधिक सफल देख कर जलने लगते हैं या खुद को कोसने लगते हैं, वहां करुणा दी संतोष के साथ और अपनी सीमाआें में जीने का सीख दे रहीं है। अपना जीवन उन्होंने उच्चतम जीवन मूल्यों के साथ बिताया और एक उपयुक्त मुकाम पाने के बाद भी इंसान होने का फर्ज नहीं भूलीं। इस छप्पन साल की उमर में भी उनकी आंखों में विशेष चमक थी, जैसे जता रही हो हमसे, ‘इंसान पैसे से नहीं, अपने व्यवहार से बड़ा होता है। अपने साथ-साथ अपनों और समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठा से बड़ा होता है, वही तो मैं कर रहीं हूं, तभी आज भी मैं सुंदर हूं, अन्य महिलाओं से विशेष हूं और प्रसन्न हूं।’

 

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