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कहानी: चुलबुली

सुधा गुप्ता ‘अमृता’ चिंटू के घर के सामने एक गुलमोहर का पेड़ था। उसमें लाल-नारंगी से बहुत खूबसूरत फूल खिलते, जो सबका मन मोह लेते। चिंटू को गुलमोहर और भी सुंदर तब लगने लगता, जब उस पर सुंदर पक्षी सुबह-शाम चहचहाते। प्रात:काल सूरज की लालिमा युक्त किरणें जब उस पर पड़तीं, तो लगता स्वर्ग ही […]

Author Published on: December 15, 2019 5:53 AM
कहानी: चुलबुली

सुधा गुप्ता ‘अमृता’

चिंटू के घर के सामने एक गुलमोहर का पेड़ था। उसमें लाल-नारंगी से बहुत खूबसूरत फूल खिलते, जो सबका मन मोह लेते। चिंटू को गुलमोहर और भी सुंदर तब लगने लगता, जब उस पर सुंदर पक्षी सुबह-शाम चहचहाते। प्रात:काल सूरज की लालिमा युक्त किरणें जब उस पर पड़तीं, तो लगता स्वर्ग ही धरा पर उतर आया हो। सारे पक्षी तो सुबह-शाम ही वृक्ष पर बने घोंसले पर चहचहाते, पर इन पक्षियों में एक थी चुलबुली चिड़िया, जो दिन भर पेड़ पर ही रह कर इधर-उधर फुदकती रहती।

चिंटू के घर कालबेल थी, जो चिड़िया की आवाज में चहचहाती थी। जब भी कोई आता, कालबेल बजाता। चिड़िया की सुरीली चहचहाती आवाज निकलती और कोई न कोई दरवाजा खोल देता।
एक दिन चुलबुली इधर-उधर फुदक रही थी। तभी उसने देखा, चिंटू के घर की कालबेल बजी और दरवाजा खुल गया। कालबेल की आवाज हूबहू चुलबुली की आवाज से मिलती थी। बस फिर क्या था, शरारती चुलबुली को शरारत सूझी। चिंटू के मम्मी-पापा अपने दफ्तर चले जाते और चिंटू स्कूल। घर पर रह जाती दादी अकेली। चुलबुली ने सोचा- चलो, अपनी आवाज को आज आजमा लिया जाए।

दादी पलंग पर लेटी थीं। चुलबुली ने दरवाजे की चौखट पर बैठ कर आवाज लगाई- चुल्बुल्चुल्बुल।… दादी ने सोचा कि कालबेल बजी है। उन्होंने बिस्तर से उठ कर दरवाजा खोल दिया, पर वहां कोई नहीं था। दादी मन ही मन गुस्सा करतीं। फिर बिस्तर पर लेट गर्इं। अब तो चुलबुली को अपनी शरारत पर बड़ा मजा आया। चुलबुली प्रतिदिन अपनी सुरीली आवाज का फायदा उठा कर दादी को परेशान करने लगी। एक दिन तो हद हो गई। चुलबुली ने कई बार दादी को परेशान किया।

दादी भी कम नहीं थीं। उन्होंने ठान लिया कि आज तो इसका पता लगा कर ही रहेंगीं। दादी बालकनी में छिप कर बैठ गर्इं। मम्मी-पापा, चिंटू जा चुके थे। चुलबुली अपनी आदत के अनुसार दरवाजे की चौखट पर बैठ कर चहचहाने लगी- चुल्बुल्चुल्बुल…, उसने सोचा अब दरवाजा खुलेगा। वह थोड़ी देर पेड़ पर बैठ कर देखती रही। पर उसकी मंशा के अनुसार दरवाजा नहीं खुला। दादी ने चुलबुली को देखा। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोलीं, अच्छा तो तू है, जो मुझे रोज परेशान करती है। अब तुझे मैं मजा चिखाती हूं।
दादी को मालूम था कि चुलबुली अपनी आदत के अनुसार फिर आएगी। दादी अंदर गर्इं और मच्छरदानी का जाल लेकर छुप कर बैठ गर्इं।
दादी के इरादों से अनभिज्ञ चुलबुली थोड़ी ही देर में फिर आई और उसने जैसे ही आवाज लगाई- चुल्बुल्चुल्बुल… वैसे ही दादी ने मच्छरदानी वाला जाल उस पर फेंक कर उसे पकड़ लिया और एक पिंजड़े में बंद कर दिया। चुलबुली दिन भर पिंजड़े में बंद फड़फड़ाती रही। दादी बिस्तर पर जाकर सो गर्इं। चुलबुली की सारी आजादी छिन गई।
शाम होने लगी थी। चिंटू स्कूल से घर आ गया और उसके मम्मी-पापा दफ्तर से। चिंटू ने आते ही पूछा- अरे दादी, यह चिड़िया कहां से पकड़ लार्इं, क्या खरीदी है? दादी ने सारा हाल सुनाया। चिंटू को बड़ा मजा आया। पर, जैसे ही वह पिंजड़े के पास गया, उसने देखा कि चुलबुली उदास बैठी है। फुदक भी नहीं रही। चिंटू ने उसे दाना-पानी दिया, पर चुलबुली ने न कुछ खाया, न पिया। चिंटू को चुलबुली पर दया आ रही थी। चुलबुली चिंटू को क्षमा याचना भरी निगाहों से देख रही थी। चिंटू ने दादी से कहा- .‘दादी प्लीज, चुलबुली को छोड़ दीजिए। वह अब व्यर्थ परेशान करने का मतलब समझ गई है।’
दादी ने फिर बड़बड़ाते हुए कहा- ‘चल तू कहता है तो, मैं इसे छोड़ देती हूं।’ चुलबुली की आंखों से पश्चात्ताप के आंसू बह निकले। दादी ने पिंजड़ा खोल दिया। वह चिंटू और दादी को धन्यवाद देती पुन: गुलमोहर पर जाकर चहचहाने लगी। उसकी आवाज को सुन कर सब हैरान होकर हंसने लगे। मम्मी-पापा ने चिंटू का पक्षियों के प्रति स्नेह देख कर उसे बहुत प्यार किया और शाबाशी दी। चुलबुली समझ गई कि उसकी कर्णप्रिय सुरीली आवाज सबका मन मोहने के लिए है, व्यर्थ परेशान करने के लिए नहीं।
दादी ने चिंटू को समझाया- ‘बेटा, कुदरत के दिए किसी गुण या ताकत का उपयोग अच्छे काम में करना चाहिए, किसी को परेशान करने में नहीं।’

 

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