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कहानी: जा घट प्रेम न संचरै

एक छोटे से सफर में प्रतिदिन कुछ किलोमीटर यात्रा में इस तरह भी प्रेम हो सकता है, यह हमने नहीं जाना। पर इतना सघन, सात्विक, अबोला और देहहीन प्रेम इस पृथ्वी पर कहीं हो सकता था, तो वह उनतीस किलोमीटर में फैला ही हो सकता था, जिस पर, जिसके के लिए, हम सफर करते और सफर में प्रेम, प्रेम और प्रेम करते।

Author Published on: November 3, 2019 5:36 AM
उसके गीतों के स्वर मेरे कानों में बिना किसी अवरोध के शहद घोल देते।

राजेश झरपुरे

(बस में सफर करते एक प्रेमी युगल को देखते हुए)
आज वह बहुत सुंदर लग रही थी।
सुंदर नहीं…
सुंदर कहना ठीक नहीं होगा।
वह सुंदर तो थी ही। गेहुंआ रंग, गोल मुख, तोते की तरह ढली हुई नाक, सुराही की तरह मढ़ी हुई गर्दन और सदैव आंखों से बात करती। होंठ सिले हुए, पर मुस्कराने पर खिल उठते और छोटे-छोटे दांतों की दो पंक्ति चमक उठती। सुंदर होने के लिए इतना पर्याप्त था। पर वह पर्याप्त से अधिक लग रही थी। इस तरह अधिक होना, अचानक उसके पहनावे में आए परिवर्तन के कारण हुआ था।
आज वह साड़ी पहन कर आई थी।
रोज वह सलवार-कुरता पहना करती।
सिर तक दुपट्टा ओढ़े। उसके पास तरह-तरह के रंगों में सूट थे। वह उस तरह भी और सब महिलाओं से सुंदर लगती, पर साड़ी में उसकी सुंदरता और अधिक खिल उठी। उसका खिल जाना मुझे रोमांचित कर गया। मैं अपने आप को रोक न पाया। और बिना किसी संकोच या भय के बोल पड़ा- ‘…आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं।’
मैंने बोला जरूर, पर शब्द होठों से बाहर नहीं आ पाए।
हवा में शब्द घुल नहीं पाए, पर उसने सुन लिया।
उसने पलकें उठाई और मुस्कराते हुए झपक दी। मुझे जव़ाब मिल गया।
इस तरह पूरी बस में कहने वाला मैं अकेला था और इस तरह सुनने वाली वह अकेली। उसके साथ उसकी सबसे नजदीकी सहयात्री सहेली बैठी थी। उसकी आंखों में अपनी सहेली की अतिरिक्त सुंदरता को लेकर ईर्ष्या जैसा कोई भाव था, जो वह पढ़ नहीं पाई। यह भाव स्वाभाविक भी था। दरअसल, जिन्हें हम अपना सबसे प्रिय और अभिन्न समझते हैं, चाहे वह दोस्त हो या रिश्तेदार, उसके बारे में हम जान सकें कि वह हमारे पीठ पीछे क्या बोलता है और बाजू में बैठ कर क्या सोचता है, तो हम दुनिया में बिल्कुल अकेले पड़ जाएंगे। न कोई हमारा होगा और न हम किसी के हो पाएंगे। पर हम अकेले नहीं होते। हमारा अकेले न होना यह बताता है कि हम भ्रम में हैं… रिश्तों के, मित्रता के होने के… और जो जितना अधिक भ्रमित होता है, वह उतना ही अधिक घनिष्ठ होता है।
उसके साथ, उसके बाजू में बैठी, उसकी सहेली की तरह दिखने वाली वह उम्रदराज महिला, उसकी घनिष्ठ होगी या नहीं, मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। वह भी नहीं। बस! सदैव उसे उसके बाजू में बैठे देखा था। उनकी निकटता का कारण, दोनों का एक ही स्कूल में पदस्थ होना हो सकता था। एक ही मुहल्ले में आस-पड़ोस में रहना हो। एक-दूसरे के विचारों में समानता होने जैसा कुछ हो। पर मुझे इसमें से एक भी तर्क उचित नहीं लगता।
मैं उसे व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता और जान सकूं, इस तरह सोचा भी नहीं था। वह मुझे अच्छी लगती थी बस!
बस में और दूसरे सहयात्री महिला-पुरुष भी अच्छे थे, पर वह मुझे सब अच्छे लोगों से ज्यादा अच्छी लगती। यही कारण था कि छीनवाड़ा से लेकर पलटवाड़ा तक के सफर में वह मेरी नजरों के घेरे में होती। वह जानती थी, वह उनतीस किलोमीटर तक अदृश्य बंधन में रहती है। यह बंधन उसे पराधीन नहीं करता, उन्मुक्त करता था। वह खुले आसमान में उड़ा करती। सुंदर चिड़िया की तरह पेड़ों की फुनगियों में चढ़ जाया करती और मन को तरंगित कर दे, ऐसे गीत गाया करती। वह जब खुले आसमान में उड़ती, उसके पंख नहीं फहराते। वह जब गाती, उसके होंठ नहीं हिलते, पर मैं उसका उड़ना पूरी निष्ठा से महसूस कर लेता। उसके गीतों के स्वर मेरे कानों में बिना किसी अवरोध के शहद घोल देते।
उसका नाम…?
मुझे नहीं मालूम।
उसका निवास?
मैं नहीं जानता।
वह कहां से आती और कहां चली जाती है?
मुझे इससे कभी कोई मतलब नहीं रहा।
क्या वह विवाहित है?
हां! यह सबकी तरह मैं भी जानता था।
और इस पूरी जानकारी के अतिरिक्त मेरे पास अन्य कोई जानकारी नहीं थी। और मैंने भी इस तरह अन्य के बारे में न कभी सोचा, न चिंतित हुआ या जानने के लिए व्यग्र रहा। किसी के अच्छे लगने के लिए जानकारी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। अतिरिक्त जानकारियां सदैव दुख पहुंचाती हैं। दुखी होना मेरा स्वभाव नहीं, इसीलिए अपनी उनतीस किलोमीटर की यात्रा में मैं सदैव प्यार और अपनत्व से भरा होता। हालांकि पलटवाड़ा उतर कर, वहां से और छब्बीस किलोमीटर दूर, दूसरी दिशा में, दूसरी बस, टैक्सी से मुझे जाना होता और उसे सीधे, उसी बस में कहीं और। मैं आगे के छब्बीस किलोमीटर में भी उनतीस किलोमीटर उसके साथ सहयात्री रहे पलों को ही जीता। वह भी कुछ किलोमीटर तक इसी तरह जीती होगी। मुझे शक या जबर्दस्ती किसी पर अविश्वास करने की बीमारी नहीं है, इसीलिए इस तरह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं… वह अपनी सहेली के बाजू में बैठी इसी तरह आगे का सफर करती होगी।
उसका यह एक सत्य मेरे साथ भी जुड़ा था। मैं भी विवाहित था और तीन बच्चों का पिता। वह भी विवाहित थी, पर उसकी सहेली का विवाह नहीं हुआ था। सुंदरता से विवाह का गहरा संबंध होता है। आपेक्षित उम्र के बाद अगर विवाह नहीं हो पाए तो सामाजिक ताने और स्वयं का अंतर्द्वंद्व उसे कीड़े की तरह डंसने लगता है। उसकी सहेली के साथ भी कुछ इसी तरह हुआ हो। उसे ढलती हुई उम्र बोझ लगने लगी हो और ढलता हुआ सौंदर्य कचोटता हो।
वह सुंदर तो थी ही, समझदार भी थी। वह उससे दयाभाव रखती हो। उसे धैर्य और ध्यान में बंधने की सलाह देती हो। बंधन की जीत और पराजय की खुशी से अभिभूत, वह उसे गृहस्थ जीवन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातें बताती हो, जिसे सुनना उसे अच्छा लगता हो। बस! इस एक अकेले कारण के अतिरिक्त उनमें घनिष्ठता का और कोई कारण, मेरी समझ से परे था।
वह जानती थी, मैं उसे सहयात्रियों की आंखों से बच कर निहारता रहता हूं। मैं भी जानता था, जब मैं उसे नहीं देख रहा होता, वह मुझे निहार रही होती। और कभी-कभार जब हमारी दृष्टि टकरा जाती, हम चोरों की तरह नजरें झुका लिया करते। चोरी पकड़ी जाना, चोर साबित हो जाना हमारे मन को सुकून देता।
कई बार मैंने चाहा, कई बार उसने भी चाहा और अगर सही कहा जाए तो रोज ही हमने चाहा कि कम से कम एक दिन हमारे जीवन में ऐसा आए कि हम दोनों एक ही सीट पर साथ-साथ, पास-पास बैठें। पर वह दिन हमसे रोज-रोज, दूर से दूर ही रहा। जब कभी हम कम फासले में रहे, बिल्कुल अगल-बगल या आगे-पीछे वाली सीट पर, तो हमारे बीच दूरी बढ़ी हुई रही। हमारे बीच के कम अंतर को किसी अन्य पर जाहिर न होने देने की सतर्कता बरतते हुए हम पूर्णरूप से सावधान होते। पर हमारे बीच एक अंतहीन वार्ता चलती रहती। बातों-बातों में वह कभी मुस्करा देती। कभी गंभीरता का चोला ओढ़ लेती। दोनों ही स्थिति में उसका मुझसे और मेरा उससे गहन जुड़ाव होता। मैं अपने गालों पर उसके हाथों की नरम-नरम उंगलियों के स्पर्श को पूरी गंभीरता से महसूस कर लेता। वह अपने बालों में घूमती हुई मेरी उंगलियों के स्पर्श को महसूसते हुए उत्तेजना में बार-बार अपने सिर पर हाथ फेरती और क्षणांश के लिए तीक्ष्ण दृष्टि मेरी तरफ डाल कर मुझे इस तरह शरारत करने से रोकती। मैं मुस्करा देता, वह भी। वह जब मुस्कराती तो मुस्कराती ही रह जाती। उसकी देह का पोर-पोर मुस्कराता। साथ बैठी सहेली को उसका मुस्कराना तीर की तरह चुभता। वह बस में चारों दिशाओं में नजर घुमा कर देखती। यह मुस्कराहट कहां से आई?… उस वक्त में उससे संपर्क तोड़ लेता और अन्य सहयात्रियों से जुड़ा हुआ प्रदर्शित करता, पर वह पास बैठी तितली का मुख सूंघ कर पता लगा लेती कि वह कहां थी। फिर उसकी दृष्टि मेरी ओर होती। मैं उसकी दृष्टि में उठे सारे प्रश्नों को सिरे से नकार देता। वह खुश होती। उसका अहंकार तृप्त होता। उसकी ईर्ष्या खुशी में बदल जाती।
इस तरह मैं उसे किसी भी तरह की उलाहना के तीर से बचा ले जाता।
वह भी मुझे सदैव बचाए रखती। जब वह मुझे निहारती, मेरी आंखें उच्छृंखल हो उठतीं। वह आंखें बंद कर ध्यान की मुद्रा में चली जाती। मैं निराश हो उठता। मेरी उच्छृंखलता मुझे कचोटने लगती। मैं अपने किए पर पछताता रह जाता और प्रायश्चित की स्थिति में उसी के सदृश्य विचारों के मौन में उतरने का प्रयास करता। पर मौन कहीं नहीं होता। न ध्यान में, न विचार में। मौन की भी एक भाषा होती है। मौन के भी स्वर होते हैं और मौन में भी आवाज होती है। मौन की भी एक चीख होती है और मौन में भी घना शोर होता है। हम इस तरह से बेचैन और व्यग्र कर देने वाले वातावरण से दूसरे अधीर कर देने वाले परिवेश में समा जाते, पर साथ-साथ… वह अपने ध्यान में, मैं अपने मौन में।
एक छोटे से सफर में प्रतिदिन कुछ किलोमीटर यात्रा में इस तरह भी प्रेम हो सकता है, यह हमने नहीं जाना। पर इतना सघन, सात्विक, अबोला और देहहीन प्रेम इस पृथ्वी पर कहीं हो सकता था, तो वह उनतीस किलोमीटर में फैला ही हो सकता था, जिस पर, जिसके के लिए, हम सफर करते और सफर में प्रेम, प्रेम और प्रेम करते।

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