ताज़ा खबर
 

सुरक्षित मातृत्व का हक

मां के रूप में महिलाएं न केवल पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों और रिश्तों की पोषक होती हैं बल्कि देश के भावी नागरिक भी गढ़ती हैं। ऐसे में देश के हर हिस्से, हर तबके की महिलाओं के लिए सुरक्षित मातृत्व पाना एक बुनियादी अधिकार है।

महिलाओं से मातृत्व की खुशी को जीने के सुखद पल को छिन रही है।

मोनिका शर्मा

सेहतमंद और सुरक्षित मातृत्व के लिए गर्भावस्था के दौरान सही संभाल और प्रसव उपरांत देखभाल से जुड़ी बातों के प्रति सजगता, मां और बच्चे दोनों के लिए जरूरी है। हमारे यहां आज भी ऐसी स्थितियां नहीं बन पाई हैं, जो मां बनने के जज्बाती सफर को जागरुकता से जोड़ सकें। चिंतनीय है कि मां को पूजनीय दर्जा देने वाले हमारे देश में आज भी महिलाओं के लिए मातृत्व का यह सफर बेहद पीड़ादायी बना हुआ है। ‘जच्चा-बच्चा’ सर्वेक्षण- 2019 की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली लगभग आधी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान जरूरी पोषण नहीं मिल पाता है। मां बनने वाली महिला को जरूरत से कम खाना नसीब होता है। गौरतलब है कि गर्भावस्था और मां बनने वाली महिलाओं की समस्याओं को समझने के लिए देश के छह राज्यों (छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश) में यह सर्वेक्षण किया गया था। सही पोषण नहीं मिलने के कारण गर्भावस्था के दौरान उनका वजन तय मानक के अनुरूप नहीं बढ़ता। यह सर्वेक्षण बताता है कि महिलाओं को गर्भावस्था और उसके बाद की सावधानियों के बारे में भी बहुत कम जानकारी है। उत्तर प्रदेश में 48 फीसद गर्भवती महिलाओं को पता ही नहीं था कि गर्भावस्था के दौरान उनका वजन बढ़ना भी जरूरी है। चिंतनीय है सर्वेक्षण में सिर्फ 31 फीसद महिलाएं ही ऐसी पाई गईं, जो गर्भावस्था में पौष्टिक भोजन कर रही थीं। कुछ महिलाएं शारीरिक रूप से इतनी कमजोर थीं कि प्रसव के समय तक उनका वजन 40 किलो से कम था। सामने आए आंकड़ों के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद महिलाओं को अतिरिक्त आराम नहीं मिलता है। घरेलू जिम्मेदारियों के चलते वे उसी तरह नियमित काम करती रहती थीं। वहीं 63 फीसद महिलाएं तो ऐसी थीं, जिन्होंने प्रसव के दिन तक काम किया था, जिसका सीधा सा अर्थ है कि अधिकतर घरों में मां बनने जा रही महिला के भोजन, आराम, स्वास्थ्य की संभाल और विशेष जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। इन छह प्रांतों के 10-12 आंगनवाड़ी केंद्रों में गर्भवती महिलाओं और छह महीने पहले ही शिशु को जन्म देने वाली मांओं से बातचीत पर आधारित इस अध्ययन में झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की हालत बेहद निराशाजनक पाई गई है। हिमाचल प्रदेश को सार्वजनिक सुविधाओं में अग्रणी पाया गया।

मां के रूप में महिलाएं न केवल पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों और रिश्तों की पोषक होती हैं बल्कि देश के भावी नागरिक भी गढ़ती हैं। ऐसे में देश के हर हिस्से, हर तबके की महिलाओं के लिए सुरक्षित मातृत्व पाना एक बुनियादी अधिकार है। इतना ही नहीं यह सीधे-सीधे उनकी सेहत से जुड़ा मसला भी है, जो महिलाओं के सबलीकरण से जुड़ा सबसे अहम पक्ष है। बावजूद इसके सामाजिक-पारिवारिक हालातों के अधिकतर पहलुओं पर आए बदलावों के बावजूद मां बनने जा रही महिला आज भी उचित पोषण और देखभाल से वंचित है। परिवार के सदस्य हों या खुद महिला में भी यह सजगता नहीं है कि भावी मांओं को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। सबसे चिंतनीय स्थिति तो देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की है। यहां सर्वेक्षण में शामिल शारीरिक रूप से कमजोर महिलाओं का वजन सिर्फ गर्भावस्था के दौरान सात किलोग्राम ही बढ़ा है। जबकि बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के मुताबिक किसी महिला का वजन गर्भावस्था के दौरान 13 से 18 किलोग्राम तक बढ़ना चाहिए। ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि इसकी वजह सही पोषण और आराम की कमी ही है। इतना ही नहीं घरेलू कामकाज का दबाव गर्भवती महिलाओं में तनाव भी पैदा करता है, जिसके चलते उसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। विचारणीय है कि गर्भवती महिलाओं के खान-पान और सेहत की खैरियत से जुड़े ऐसे सभी कारक मां ही नहीं बच्चे की सेहत पर भी असर डालते हैं। बीते दिनों समग्र राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण में भी मां और बच्चे दोनों की पोषण की चिंतनीय तस्वीर आई है। इस सर्वे के मुताबिक पांच वर्ष तक के 35 फीसद बच्चे नाटे कद के हैं, 17 फीसद कमजोर, 33 फीसद कम वजन वाले और 11 फीसद भयंकर कुपोषित। राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण का सर्वे बताता है कि बच्चे की पोषणता की स्थिति का मां की पोषणता और शैक्षणिक स्तर के बीच गहरा संबंध है। साक्षरता और घर की संपत्ति मां और बच्चों के सेहत पर प्रभाव डालती है। निस्संदेह, आर्थिक समानता, शिक्षा और सजगता बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व से जुड़े अहम कारक हैं। अफसोस कि बड़ी संख्या में महिलाएं आज भी इन कारकों के मोर्चे पर पीछे ही हैं।

दरअसल, सेहतमंद मातृत्व और सुरक्षित प्रसव बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और सही पोषण से सुनिश्चित किए जा सकते हैं। हमारे यहां तो प्रसव से जुड़ी परेशानियां इतनी हैं कि केवल बच्चे को जन्म देते समय ही महिलाएं काल कवलित नहीं होतीं। गर्भधारण के बाद सही पोषण, स्वास्थ्य देखभाल की उचित सलाह और टीकाकरण के अभाव में भी महिलाएं अपनी जान गंवाती हैं। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मातृत्व मृत्यु दर का एक बड़ा कारण कुपोषण ही है। हमारे देश में एनीमिया और आयोडीन की कमी मां बनने वाले महिलाओं में बहुत आम है। कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को संतुलित आहार भी नहीं मिल पाता है, न ही उनके पास प्र्रसव के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सकुशल पहुंचने की परिवहन सुविधा ही होती है। इन महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व से सम्बंधित सरकारी योजनाओं की जानकारियों का अभाव भी होता है। महिलाओं की सेहत के प्रति जागरुकता की कमी और पारिवारिक अनदेखी आज भी सुरक्षित प्रसव और सेहतमंद मातृत्व के लिए चुनौती बने हुए हैं। दूर-दराज के गांवों में आज भी संस्थागत प्रसव के प्रति जागरुकता नहीं है। 2001 से 2011 के बीच हुई जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से भारत में हर वर्ष करीब 1.9 करोड़ प्रसव होते हैं , ऐसे में हर साल लगभग 34 हजार महिलाएं प्रसव से संबंधित कारणों से अपना जीवन खो देती हैं। विचारणीय है कि ये आंकड़े केवल संख्या भर नहीं हैं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आधी आबादी की उस तस्वीर को दिखाते हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण है। मातृत्व को जीने के पहले ही महिलाओं का यूं काल कवलित हो जाना सरकार और समाज दोनों के लिए चिंतनीय है। इन पर न केवल विमर्श होना जरूरी है बल्कि इन आंकड़ों को कम करने हेतु गंभीर कवायदों की भी दरकार है।

दुखद है कि आज भी चिकित्सा सुविधाओं की कमी, कुपोषण, सामाजिक-आर्थिक असमानता, पारिवारिक सहयोग की कमी और जागरुकता का अभाव जैसे कारण महिलाओं से मातृत्व की खुशी को जीने के सुखद पल को छीन रहे हैं। गर्भावस्था के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं संक्रमण, बाधित प्रसव और मानसिक तनाव जैसी अन्य पेंचिदगियों का भी शिकार होती हैं। अशिक्षा, परिवारजनों के सहयोग और समझ की कमी इन हालातों को और भी पेंचीदा बना देती हैं। यही वजह है कि मातृत्व सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और सुधार के साथ ही सामाजिक सोच में बदलाव लाने की भी दरकार है। साथ ही जननी सुरक्षा के लिए चल रही सरकारी योजनाओं का उचित क्रियान्वन किया जाना भी आवश्यक है। हैरत नहीं होनी चाहिए कि मातृत्व से संबंधित नीतियों का सही पालन न होने के चलते भी जरूरतमंद महिलाओं तक समुचित लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। आधी आबादी के बड़े हिस्से को आज भी जीवन की इस सबसे सुखद भूमिका को जीने के लिए उचित सरकारी नीतियों, स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं, सही पोषण और पारिवारिक स्तर पर संवेदनशील देखभाल की जरूरत है।

Next Stories
1 प्रसंग: सशस्त्र क्रांतियों के युग का अंत
2 कहानी: सहयात्री
3 कानून के कई फायदे
यह पढ़ा क्या?
X